Friday, August 03, 2007

सुख-दु:ख के साधन

जो मिला है उसकी नाक़द्री करके,
जो नहीं मिला उसकी चाह करते हैं।
अपने दिलवर से चुराके आंखें,
अन्य के दिलवर को सराहते हैं।
अपनी दौलत नहीं है काफी,
कुछ और मिलने की आस रखते हैं।
हमारी इज्जत क्यों न उनकी जैसी,
सोच सोच करके आहें भरते हैं।
क्यों न उनकी जैसी है अपनी प्रतिभा,
निराश होकर के कोसते हैं।
हमारी सन्तति निकली न क़ाबिल,
सोचके मन दुखी करते हैं।
पैदा हुए हम क्यों ऐसे घर में,
ऐसे मन में मलाल भरते हैं।
हैं दु:ख पाने के ये सारे साधन,
जानके भी अनजान बनते हैं।

कुछ अमोघ साधन हैं, प्यारे सुख के,
अब हम उनका बयान करते हैं।

पर्याप्त मित्रो है अपनी प्रतिभा,
दौलत भी अपनी प्रचुर मानते हैं।
जो मिला है हमको है बहुत काफी,
यह पूरे मन से हम मानते हैं।
परमात्मा को हम परेशान करके,
धन, मान, संतति नहीं मांगते हैं।
बस कृतज्ञ होकर सिर को झुकाके,
कोई नहीं हम मांग करते हैं।

>>>लक्ष्मीनारायण गुप्त
>>>३ अगस्त २००७

7 comments:

mahashakti said...

आपने बहुत अच्‍छी सीख दिया है इस कविता के माध्‍यम से, व्‍यक्ति के पास जब कुछ नही होता तो भी रोता है जब आ जाता है तो उससे ज्‍यादा मिल इसलिये रोता है।

निश्चित रूप से आपके ये अन्तिम पक्तिं काफी अच्‍छी लगी

पर्याप्त मित्रो है अपनी प्रतिभा,
दौलत भी अपनी प्रचुर मानते हैं।
जो मिला है हमको है बहुत काफी,
यह पूरे मन से हम मानते हैं।
परमात्मा को हम परेशान करके,
धन, मान, संतति नहीं मांगते हैं।
बस कृतज्ञ होकर सिर को झुकाके,
कोई नहीं हम मांग करते हैं।

Udan Tashtari said...

बहुत खूब-बिल्कुल सही कह रहे हैं आप.

Laxmi N. Gupta said...

महाशक्ति जी एवं समीर जी,

उत्साह बढ़ाने के लिये धन्यवाद।

अनुराग एवं संघमित्रा said...

इस कविता ने चंद शब्दों में एक गहरी सीख दे दी| बहुत ही मार्मिक कविता और बहुत ही सुन्दर ढंग से सरल भाषा में लिखी हुई है| इन्सान की तुल्नात्मक प्रवऋत्ति से जन्मी हुई ईर्ष्या ही उसके दुखों का स्रोत है, इसकी बहुत ही अच्छी अभिव्यक्ति की है आपने|

Laxmi N. Gupta said...

अनुराग और संघमित्रा,

आपकी उत्साहवर्धक टिप्पणी के लिये धन्यवाद।

Tara Chandra Gupta said...

bahut acchi lagi. aage isi ki jarort hi....

Laxmi N. Gupta said...

ताराचन्द्र जी,

हौसला बढ़ाने के लिये धन्यवाद।