हरि किरपा, एक व्यंग्य कविता
(चेतावनीः जिन्हें "हगास" जैसे शब्द सुरुचिपूर्ण न लगते हों, कृपया आगे न पढ़ें। जो बहुत अधिक आस्तिक या बहुत पक्के नास्तिक हों उन्हें भी शायद बुरा लगे। मैंने यह कविता ज़रा शरारत के मूड में लिखी है। माफ़ कीजियेगा।)
बिना हरि किरपा के हगास भी नहीं आती है।
इसीलिये नास्तिकों को कब्जियत हो जाती है।।
पहला चूरन चार्वाक ने बनाया होगा।
कर्ज के घी से जब अजीरण हुआ होगा।।
श्राद्ध माह में प्रति दिन तीन दावतें होती हैं।
पंडितों को किन्तु कोई बीमारी नहीं लगती है।।
राम नाम जैसी कोई दवाई नहीं आती है।
बिना हरि किरपा के हगास भी नहीं आती है।।
नास्तिक करते हैं अपना जिगर खराब।
चरणामृत की जगह पीते हैं शराब।।
तभी तो उन पर महामारी आती है।
बिना हरि किरपा के हगास भी नहीं आती है।।
इसलिये सज्जनो रामनाम का चूरन खाइए।
रबड़ी मलाई भर पेट खा जाइए।।
खाना है यदि हलवा पूरी, मोहनभोग और रबड़ी।
कचौरी, मालपुए और सोहनपपड़ी।।
तो हरि किरपा बिन बात नहीं बनती है।
बिना हरि किरपा के हगास भी नहीं आती है॥
कब्ज, मधुमेह और दिल की बीमारी।
भक्तों को ये नहीं लगती हैं सारी।।
इसलिये प्यारो मन्दिरों, मस्जिदों और गिरजों में जाओ।
घंटे घड़ियाल बजाओ और रोओ गिड़गिड़ाओ।।
प्रेम से फिर मस्ती मनाओ।
और जितना चाहो उतना खाओ।।
प्रभु की किरपा से महामारी नहीं आती है।
बिना हरि किरपा के हगास भी नहीं आती है।।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...११ जुलाई २००७




8 Comments:
आपकी कविता उन लोगों को दर्द बखूबी बयान करती है जिनको कब्ज की शिकायत रहती है। मनोहर श्याम जोशी ने इस पर एक पूरा उपन्यास लिखा है-क्याप। :)
चेतावनी तो नाहक ही लगा दी है! हमें कतई बुरा नहीं लगा!
प्रिय भाई,
आप अमरीका में रह कर भी भारत के उस विलुप्त हो रही भाषा और उसके शब्दों को फिर से पुनर्जीवन दे रहे है. साधुवाद्. कविता अगर शरारत के मूड में न लिखी जाये तो पढने वालो को हरारत हो जाती है. आपने जो शब्द उपयोग किया है- हगास वही इस रचना को बनाती है खास. है कि नहीं.
आज से इसबगोल बंद और मंदिर में धूप, अगरबत्ती और दीप जलाना शुरू. साथ में यह आरती भी "मुझको भी तू लिफ़्ट करादे..."
अनूप जी, रवि जी, बसंत जी और अनुराग जी,
उत्साह्वर्धन के लिये धन्यवाद। अनूप जी के मनोहर श्याम जोशी के उपन्यास से मैं परिचित नहीं हूँ। क्या नाम बता सकेंगे?
भाई लक्ष्मी जी
आपने भारत के नेताओं और अफसरों का मामला तो छोड़ ही दिया. वह न जाने क्या-क्या खा जाते हैं और ढकार तक नहीं लेते. फिर भी उन्हें कभी अजीर्ण नहीं होता. आपकी अगली पोस्ट में हम उनकी इस गुणवत्ता का रहस्य जानना चाहेंगे. और हाँ, जोशी जी उपन्यास का नाम 'क्याप' ही है. पिढ़येगा मजा आएगा.
हा हा!! बहुत सही विचारमंथन. :)
इष्ट देव जी और समीर जी,
टिप्पणी के लिए धन्यवाद।
Post a Comment
<< Home