नहीं सही है कभी विरह की व्यथा जिन्होंने,
मधुर मिलन का मान करेंगे कैसे?
कभी कलह की कटुता जिनके पास न आई,
प्रेम भाव का मोल करेंगे कैसे?
नहीं सहा है दुःख गरीबी का पल भर भी जिनने,
वे नर धन की कद्र करेंगे कैसे?
जिनसे पीड़ा का कोई सम्बन्ध नहीं है,
औरों की पीड़ा जानेंगे कैसे?
द्वेष कभी न उठा चित्त में जिनके,
कैसे राग उठेगा उनके मन में?
कभी अँधेरा जिनके पास न आया,
वे प्रकाश का मान करेंगे कैसे?
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...१० जुलाई २००७
2 comments:
सही कहा आपने...
पानी का मोल तो प्यासा ही जान सकता है।
नितिन जी,
उत्साह बढ़ाने के लिये धन्यवाद।
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