Tuesday, July 10, 2007

जीवन के द्वन्द्व

नहीं सही है कभी विरह की व्यथा जिन्होंने,
मधुर मिलन का मान करेंगे कैसे?
कभी कलह की कटुता जिनके पास न आई,
प्रेम भाव का मोल करेंगे कैसे?
नहीं सहा है दुःख गरीबी का पल भर भी जिनने,
वे नर धन की कद्र करेंगे कैसे?
जिनसे पीड़ा का कोई सम्बन्ध नहीं है,
औरों की पीड़ा जानेंगे कैसे?
द्वेष कभी न उठा चित्त में जिनके,
कैसे राग उठेगा उनके मन में?
कभी अँधेरा जिनके पास न आया,
वे प्रकाश का मान करेंगे कैसे?

...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...१० जुलाई २००७

2 Comments:

At 12:26 AM, Anonymous नितिन बागला said...

सही कहा आपने...
पानी का मोल तो प्यासा ही जान सकता है।

 
At 1:09 PM, Blogger Laxmi N. Gupta said...

नितिन जी,

उत्साह बढ़ाने के लिये धन्यवाद।

 

Post a Comment

<< Home

NARAD:Hindi Blog Aggregator Hindi Blogs. Com - हिन्दी चिट्ठों की जीवनधारा
blogvani