Wednesday, May 30, 2007

एक विचित्र कहानी

महाभारत के आदिपर्व में एक बड़ी विचित्र कथा आती है। जैसा कि बहुत से पाठकों को पता होगा राजा पांडु जब एक मैथुनरत हिरन को मार देते हैं और वह हिरन एक ऋषि निकलता है जो पांडु को शाप देता है कि यदि वह कभी मैथुनरत होंगे तो निश्चय ही उनकी मृत्यु हो जाएगी। पांडु राज्य धृतराष्ट्र को सौप कर अपनी पत्नियों कुन्ती और माद्री के साथ जंगल चले जाते हैं। एक दिन पांडु इस बात से दुःखी हैं कि उनके कोई संतान नहीं है और वे कुन्ती को समझाने का प्रयत्न करते हैं कि उसे किसी ऋषि के साथ समागम करके संतान उत्पन्न करनी चाहिए। कुन्ती परपुरुष के साथ नहीं सोना चाहती तो पांडु उसे यह कथा सुनाते हैं:

प्राचीन काल में स्त्रियाँ स्वतंत्र थीं और वे जिसके साथ चाहें उसके साथ समागम कर सकती थीं जैसे पशु पक्षी करते हैं। केवल ऋतुकाल में पत्नी केवल पति के साथ समागम कर सकती है अन्यथा वह स्वतंत्र है। यही धर्म था जो नारियों का पक्ष करता था और सभी इसका पालन करते थे। एक उद्दालक नामके प्रसिद्ध मुनि थे जिनका श्वेतकेतु नामका एक पुत्र था। एक बार जब श्वेतकेतु अपने माता-पिता के साथ बैठे थे, एक ब्राह्मण आया और श्वेतकेतु की माँ का हाथ पकड़ कर बोला, "आओ चलें।" अपनी माँ को इस तरह जाते हुए देख कर श्वेतकेतु बहुत क्रुद्ध हुए किन्तु पिता ने उनको समझाया कि नियम के अनुसार कि स्त्रियाँ गायों की तरह स्वतंत्र है जिस किसी के भी साथ समागम करने के लिये। इन्हीं श्वेतकेतु के द्वारा फिर यह नियम बनाया गया कि स्त्रियों को पति के प्रति वफादार होना होना और परपुरुष के साथ समागम करने का पाप भ्रूणहत्या की तरह होगा।

पांडु और भी कथायें सुनाते हैं और कुन्ती को विश्वास दिला देते हैं कि परपुरुष के साथ संतान पैदा करने से उन्हें पाप नहीं लगेगा।

...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...३० मई २००७

3 Comments:

At 11:54 PM, Blogger संजय बेंगाणी said...

ये कथाएं इशारा करती है, हमारी पौराणीक कालिन व्यवस्थाओं पर.

 
At 2:37 PM, Blogger जुड़िये गँठजोड़ मित्र समुदाय से! (gathjod.com) said...

गुप्त जी, सादर नमस्कार,

बहुत अच्छा लिखते हैं आप। मैं बहुत अच्छा लिखना उसे मानता हूँ जो बहुत से लोगों को प्रभावित कर सके। ठीक वैसे ही जैसे अपने कार्यों से गाँधी ने समस्त भारत को प्रभावित किया और उनका जन्मदिवस राष्ट्रीय अवकाश बन गया, किन्तु चंद्रशेखर 'आजाद', अपने कार्यों से सिर्फ बंगाल को ही प्रभावित कर पाये, क्योंकि उनके जन्म दिन पर केवल बंगाल में ही अवकाश घोषित होता है।

आलोचना करना एक बहुत ही उत्तम कार्य है, यदि आलोचक नहीं होते कोई लेखक स्वयं को पहले से अच्छा लिखने के योग्य कभी भी नहीं बना पाता। आप भी एक योग्य आलोचक हैं। आपके चिट्ठे की प्रविष्टियों को पढ़कर मुझे सदैव मुझे भारत के एक लोकप्रिय पत्रिका, जिसका नाम है सरिता, का स्मरण हो आता है क्योंकि उस पत्रिका का उद्देश्य है सिर्फ हिंदू धर्म की खामियों को खोज-खोज कर निकालना, और यदि भूल से भी कोई अच्छाई नजर आ जाये तो उसे देख कर भी अनदेखा कर देना।

खैर, इतनी बड़ी भूमिका मैंने केवल इसलिये बाँधी है कि मैं जानना चाहता हूँ कि आपकी 'विचित्र कहानी' का आधार कौन सा 'विचित्र हिंदू ग्रंथ' है क्योंकि महाभारत के आदिपर्व में आपके द्वारा वर्णित घटना का उल्लेख कहीं पर भी नहीं है। यदि आप मेरी इस उत्सुकता का समाधान करने का कष्ट करेंगे तो मैं आपका अत्यंत आभारी रहूँगा।

जी.के. अवधिया

 
At 8:33 AM, Blogger Laxmi N. Gupta said...

अवधिया जी,

पता नहीं कौन सी महाभारत आप पढ़ रहे हैं, हो सकता है कोई संक्षिप्त संस्करण हो जिसमें सभी असुविधाजनक अंश काट दिये गये हों जैसा कि गीताप्रेस वाले अक्सर करते हैं। यह कहानी जहाँ पर मैंने बताया ह वहीं पर आती है, उदाहरण के लिये देखिये:

The Mahabharata
1. The book of Beginning

Translated and Edited by
J.A.B. van Buitenan

The University of Chicago Press
1973

pages: 253-254
(113.1-113.20)

आपका विचार कि मैं हिन्दू धर्म के ख़िलाफ लिखता हूँ, सत्य नहीं है। मुझे केवल सत्य का आग्रह है, इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं कहना चाहूँगा।

सादर,

लक्ष्मीनारायण

 

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