Thursday, May 24, 2007

भारतीय ट्रेन की एक गौरव-गाथा

हम उस देश के वासी हैं, जहाँ रेल धकाधक चलती है।
कोई बिजली से चलती है, कोई डीज़ल से चलती है।।

कोई डब्बे के अन्दर है, कोई डब्बे से लटके हैं।
कोई डब्बे के ऊपर हैं, खा रहे हवा के झटके हैं।।

कोइ टिकट खरीद के चलता है, कोई बिना टिकट ही जाता है।
भारतीय ट्रेन से हे मित्रो, इन सब का गहरा नाता है।।

ये सब लालू की गाड़ी हैं, जो बिन चारे के चलती हैं।
कोई पीती हैं डीज़ल औ कोई बिजली से चलती हैं।।

सब तलबगार लालू के हैं, जिनके घर सारा चारा है,
जिस पर लालू की कृपा न हो, वह हो जाता बेचारा है।।

बिजली की गाड़ी एक जा रही थी, बिहार से हो करके।
खींची ज़ंजीर किसी जन ने, रुक गई ट्रेन धीमी होके।।

रुक गई ट्रेन फिर चल न सकी, लोगों ने पूछा यह कैसे।
बिजली ही नहीं तार में जब, तब गाड़ी मित्र चले कैसे।।

तारों में इन बिजली के प्रिय, होते हैं कुछ स्थल ऐसे।
जिनमें पावर के बिना ट्रेन, चलती जाती मोमेंटम से।।

देखो ड्राइवर की सूझ, दाद उसकी अवश्य देना मित्रो।
वह बोला लोगों से तुरंत, धक्का दो गाड़ी को मित्रो।।

देखो जनता की शक्ति प्रबल, धकेला गाड़ी को पथ पर मित्रो।
आधे घंटे के अंदर ही, गतिमान हुई गाड़ी मित्रो।।

यह कथा पढ़ी जब हमने सच, रोमांच हुआ तन में यारो।
देशी जुगाड़ टेक्नोलाजी का, प्रामिस ग्रेट सही यारो।।

...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...२४ मई २००७

13 comments:

Udan Tashtari said...

बहुत सही, कब घूम आये. अब पाण्डेय जी को जबाब देना. :) हम नहीं जानते.

संजय बेंगाणी said...

भारत माता की जय.
संकट के समय सब एक है.
रूकी गाड़ी को घकियाये और मंजिल पा ली.

अभिनव said...

इसे अगले कवि सम्मेलन में सुनाया जाए, बहुत बढ़िया।

Laxmi N. Gupta said...

समीर जी,

मैं कहीं नहीं गया। गाड़ी को धक्का दे कर चलाने की कहानी बी बी सी में पढ़ी थी। कविता उसी के ऊपर है।
टिप्पणी के लिये धन्यवाद।

Laxmi N. Gupta said...

संजय जी एव अभिनव जी। प्रोत्साहन के लिये धन्यवाद।

Sagar Chand Nahar said...

मजेदार कविता। :)

अच्छा है लालूजी विमान मंत्री नहीं है वरना विमान यात्रियों से..............:)

आलोक पुराणिक said...

हम बहूत प्रसन्न हुआ हूं इस कबीता से, भंडरफूल है जी आप ईतना बिहाड़ के बाड़े में कईसे जनतै हैं, जड़ूड़ आप उसी ट्रेन से कोई सीट उखार के लाये हैं। गुप्ताजी इस कबीता पर आपका सीभीआई इन्कावयरी भईठ सकता है। हम रुकवा सकता हूं. बीस लाख में सैटिंग किजियेगा
आलोक पुराणिक

Pratik said...

वाह, बढ़िया कविता है। :)

अनुराग एवम संघमित्रा said...

आपकी कविता बहुत अच्छी है| इसको पढ़ कर एक पुराना गीत याद आ गया: ``साथी हाथ बढ़ाना, एक (इन्जन) अकेला थक जायेगा, मिल कर बोझ उठाना (धक्का लगाना)…।"

"जुगाड़ टेक्नोलॉजी जिन्दाबाद"

antarman-- said...

जोर लगा के ...हैय्या ..
भारत के रेल गाडी के चालक की जय हो !
स्नेह के साथ,
--लावण्या

Laxmi N. Gupta said...

सागर जी,आलोक पुराणिक जी, प्रतीक जी, लावण्या जी,

आप सभी को अति धन्यवाद, कविता पढ़ने और टिप्पणी डालने के लिये। पुराणिक जी, दोस्ती के नाते आपनि फीस कुछ कम करौ, भइया।

Ashu said...

ekta main bahut shakti hai....Mera Bharat Mahan....badhiya kavita laxmi ji

Laxmi N. Gupta said...

आशु जी,

प्रोत्साहन के लिये धन्यवाद।