मानस के कुछ लोकप्रिय प्रसंग वाल्मीकि रामायण में नहीं हैं और सम्भवतः अन्य क्षेत्रीय रामायणओं में भी नहीं हैं:
१। वाटिका प्रसंगः धनुषयज्ञ के पूर्व सीता जी गौरीपूजन के लिये पुष्पवाटिका में आती हैं और राम लक्ष्मण वहीं पूजा के लिये पुष्पचयन करने के लिये आते हैं। यहाँ पर वे दोनों ही एक दूसरे को देखते हैं और राम अपने विचलित मन के बारे में लक्ष्मण को बताते हैं। गोस्वामी जी ने बड़ी कुशलता से सीता और राम की मनोदशा के चित्र खींचे हैं।
२। जनकविलापः जब राजा लोग धनुष को चढ़ाने में विफल रहते हैं, जनक दुःखी होते हैं कि अब शायद सीता का विवाह सम्भव नहीं है। लक्ष्मण इन बातों को अनुचित कहते हैं और फलस्वरूप राम धनुष तोड़ते हैं। वाल्मीकि रामायण में यह कुछ भी नहीं होता है। धनुषयज्ञ जैसा कोई आयोजन भी नहीं है। वर्णन से ऐसा लगता है कि जब भी कोई राजा या राजकुमार मिथिला आता है, उसे धनुष चढ़ाने के लिये आमंत्रित किया जाता है।
३। लक्ष्मण-परशुराम सम्वादः लगता है कि यह पूरी परिकल्पना और विलक्षण सम्वाद तुलसी के अपने हैं। वाल्मीकि रामायण में जब राजा दशरथ सीता को विदा करा कर अयोध्या लौट रहे है, परशुराम रास्ते में मिलते हैं और राम पर कुपित होते हैं, इत्यादि। लक्ष्मण और परशुराम की नोक-झोंक, राम का ऊन्हें शांत करने का प्रयास, रानियों का भय इत्यादि जिस कुशलता से निभाया गया है, वह मानसप्रेमियों की दृषटि में अभूतपूर्व है।
४। केवट प्रसंगः वाल्मीकि रामायण में निषादराज गुह एक केवट के द्वारा रामादि को गंगा पार करा देते हैं। केवट द्वारा नाव के स्त्री होने का भय और राम के पैर धोने का आग्रह तुलसी का अपना है। इतना ही नहीं, सीता का मुंदरी उतार कर उतराई देने का प्रयास और केवट का इंकार करना भी वाल्मीकि में नहीं है। यह प्रसंग काव्यरसिकों और भक्तों को सदा से मनोहारी लगा है।
५। राम की ईश्वरताः वाल्मीकि के राम को पता नहीं है कि वे विष्णु के अवतार हैं। जब अग्निपरीक्षा के समय ब्रह्मा जी और अन्य देवगण उनसे सीता का तिरस्कार करने से मना करते हैं और उनहें याद दिलाते हैं कि वे साक्षात् विष्णु के अवतार हैं तब राम कहते हैं कि वे अपने को केवल दशरथपुत्र राम मानते हैं। मानस के राम जानते हैं कि वे
अवतार हैं, उदाहरण के लिये: वे विभीषण से कहते हैं: “जदपि सखा तव इच्छा नाहीं, मोर दरस अमोघ जग माँही।“
मैंने बचपन में जो रामलीला देखी है वह प्रायः दो दिनों की होती थी और पहिले दिन वाटिका और दूसरे दिन धनुषयज्ञ दिखाया जाता था। तुलसी की रामायण के पूर्व वाल्मीकि रामायण में ये कथानक उपलब्ध नहीं थे।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...११ मई २००७
4 comments:
अच्छा लगा यह सारे तथ्य पढ़कर.
बधाई.
समीर जी,
धन्यवाद।
रामचरितमानस बचपन से ही पारिवारिक परिवेश का अभिन्न हिस्सा रही है . घर पर उसके अखंड पाठ और सामाजिक स्तर पर आयोजित 'रामलीला'के आयोजनों की सुगंध अब तक मन में बसी है .
आपकी पोस्ट ने उन स्मृतियों को पुनः जगा दिया .
प्रियंकर जी।
टिप्पणी के लिये बहुत धन्यवाद।
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