अधिकांश कहावतें अवधी में हैं किन्तु कुछ नहीं हैं।
१। अति का भला न बोलना, अति की भली न चुप्प।
अति का भला न बरसना, अति की भली न धुप्प।।
(धुप्प = धूप)
२। अन्धेर नगरी चौपट राजा, टके सेर भाजी टके सेर खाजा।
---भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
३। अवसर चूकी डोमनी गावै ताल बेताल।
४। आगे नाथ न पाछे पगहा, ता कारन ते नाचै गदहा।
५। आटा का कछु घाटा नाहीं, दाल के नाहीं दर्सन।
दूध दही का नाम न लीजो, बने रहौ चहै बरसन।।
६। कखरी लरिका गांव गोहारि।
७। कबहूं तो घुरवौ के दिन बहुरत हैं।
(घुरवा = घूर = कूड़ा डालने की जगह, बहुरना = लौटना)
८। कलि मां चारि सजीवन मूरी, कलिया पान पतुरिया पूरी।
(कलिया = मांस, पतुरिया = नर्तकी, वेश्या)
९। कानपुर कनकैया।
नीचे बहैं गंगा मइया।
ऊपर चलै रेल का पइहा।
१०। कूटनहारी कूटि जइहैं, सास पतोहू एकै होिहहैं।
११। गुरू गुड़ ही रहे, चेला शक्कर होइगा।
१२। छोटे भूत बड़ेहिं डेरवउना।
१३। जाके पांव न फटी बेंवाई, ओ का जानै पीर पराई।
१४। जाको काम वही को छाजै, और करै तो डंडा बाजै।
१५। जाको राखै सांइया, मारि सकै न कोय।
बारु न बांका करि सकै चहै जग बैरी होय।।
१६। जा दिस बहै बयारि, ताहि दिस टटवा दीजै।
१७। जो पढ़तव्यं सो मरतव्यं।
जो न पढ़तव्यं सो भी मरतव्यं।
तो फिर दन्त कटाकटेति किं कर्तव्यं।
---भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
१८। नगर बसन्ते देवानाम्।
ग्राम बसन्ते मनुष्यानाम्।
पुरई पाले भूतानाम्।
१९। पढ़े फारसी बेचैं तेल, या देखौ किस्मत का खेल।
२०। पहिले दिन महिमान।
दुसरे दिन सहिमान।
तिसरे दिन बेइमान।
२१। पोस्ती १: पोस्ती ने पी पोस्त, नौ दिन चला अढ़ाई कोस।
पोस्ती २: अबे वह पोस्ती नहीं होगा, डाक का हरकारा होगा।
पोस्ती ने पी पोस्त तो कूंड़ी के इस पार या उस पार।
---भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
२२। भंडी मेरी भानमती छै महिने में पक्केगी।
पहुनौ हैं सत्तार बरस दिन तक्केंगे।।
(सत्तार = फुरसत में)
२३। भुइंया गइबे कानपूर की, माता नांव न जानौं त्वार।
जग मां महनामत रचिबे को दुसरी बेला को अवतार।।
---प्रतापनारायण मिश्र
२४। भुस मां तिनगी डारि, जमालो दूर खडीं।
२५। भेड़ा मोट, भवानी दूबरि।
२६। मरे का मारैं शाह मदार।
२७। माहै जाड़ न पूसै जाड़, जबहिं बयरिया तबहीं जाड़।
( बयरिया = बयार = हवा)
२८। मुंडा मूंड़ तिलन का टीका, बाप कहै मोर मुंडै नीका।
२९। रिन कै फिकिर, न धन कै च्वाट।
ई धमधूसर काहे म्वाट।।
(च्वाट = चोट, म्वाट = मोटे)
३०। लोभी गुरू लालची चेला।
होय नरक मां ठेलम् ठेला।
३१। ससुरारि सुख कै सारि, जो रहै दिना दुइ चारि।
जो रहै मास पखवारा, तो हाथ मां खुरपी बगल मां खारा।
(खारा अनसिला कपड़ा है जिसमें जानवरों के लिए घास भर कर लाते हैं।)
३२। (इतनी गन्दगी है कि ) हगे हगास न आवै।
-----लक्ष्मीनारायण गुप्त
-----४ मई २००७
9 comments:
bahut bahut dhanyavad aapka , awadhi ko hindi se jyada sambhale jane ki jarurat hai... ek baar fir se , bahut bhaut dhanyawad
बहुत बढ़िया लाये हैं अवधी कहावतें इकट्ठी करके. धन्यवाद.
"...(इतनी गन्दगी है कि ) हगे हगास न आवै।..."
आह! कितनी सही बात,पर क्या करें, यहीं जीना मरना है!
बजारवाला जी, समीर जी, रवि जी,
टिप्पणियों के लिये धन्यवाद।
...९। कानपुर कनकैया।
ऊपर बहैं गंगा मइया।
नीचे चलै रेल का पइहा।
ई का अहै; रेल गड़िया गंगा मैया के नीचे? कौनो टनल बनी बा का?
पाण्डेय जी,
अच्छा पकड़ा। "ऊपर", "नीचे" का अदल बदल हो गया है। ठीक कर दूँगा।
यदि इस तरह संकलन प्रस्तुत करते रहें तो जनता का उपकार होगा. अगले सारथी-अवलोकन में कहावत 1 एवं 2 हम अपने पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करने जा रहे हैं.
शास्त्री जी,
प्रोत्साहन के लिये धन्यवाद। दो कहावतें आगामी सारथी में प्रस्तुत करने के लिये भी धन्यवाद।
लक्ष्मी नारायणजी आपका बहुत बहुत धन्यवाद । काफी दिनों से इन कहावतों को ढूंढ रहा था । इनकी मदद से मैं अपने व्यंग्य और धारदार बना सकूंगा । कृपया करके इस संकलन में अवधी की कहवातों की संख्या 100-200 से ऊपर ले जायें क्योंकि अवधी की कहावतें ढूंढे नहीं मिलती हैं । एक ही जगह पर जब ढेरों हो जायेंगी तब ये संकलन अद्वितीय हो जायेगा और हम थैंक्यू थैक्यू कहते नहीं अघायेंगे.
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