दिन के उजाले में जो दिख नहीं पाता,
उसे रात के तुम अँधेरे में देखो।
दिखता नहीं है खुली आँख से जो,
उसे आँख को बन्द करके ही देखो।
जागते हुए जो दिखता नहीं है,
उसे सोते सोते सपनों में देखो।
मजलिसों में कभी जो दिखाई न देता,
उसे जाके तुम बीराने में देखो।
जिसे मुद्दतों से दूरी से देखा,
आज उसको अपने आग़ोश में देखो।
सदियों से जिसकी निशानी न देखी,
उसे आज अपनी चौखट पे देखो।
जिसे तुमने खुद से सदा दूर समझा,
उसे अपने प्रिय की निगाहों में देखो।
सदा रोते रोते जिसे तुमने ढ़ूँढ़ा,
वही हँसते हँसते आया है देखो।
अजनबी जिसको हमेशा था माना,
परिचित पुराना वह निकला है देखो।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...११ फरवरी २००७
9 comments:
अंधेरों मे उजालों मे हर फैली हुई दिवारों में समता में विषमता में जरा देखो तो करीब से वही भीतर बैठा शांत कमल निहार रहा है तुझको…!!!
बहुत सारगर्भित रचना…बहुत सुंदर्…बधाई स्वीकारें।
इतने सीधे सरल शब्दों मे
क्या क्या नहीं कह दिया देखो....
कौन आ गया, लक्ष्मी जी? :)
सही है एक नये अंदाज में आपकी यह रचना. बधाई.
अजनबी जिसको हमेशा था माना,
परिचित पुराना वह निकला है देखो।
क्या खूब मनोभावों को उकेरा है, साधुवाद स्वीकार करें |
इसी प्रकार की कुछ और पंक्तियां याद आ रही हैं जो कुछ इस प्रकार हैं,
दिल के तराजू में संविधान तोल कर देखो,
अमीरी और गरीबी से ईमान तोल कर देखो |
हम नफरतों की हद तक गिरते ही भला क्यों हैं,
अवसर की बराबरी से इंसान तोल कर देखो |
खाली है गोदाम अगर तो खाली ही रहा करे,
पसीने की बूंदो से खलिहान तोल कर देखो |
वाह जी वाह, बहुत खुब.
कविता नए अंदाज में पसन्द आई.
सुनी न रही होगी प्रविष्टीयाँ कभी,
फिर भी यहाँ, टिप्पणीयों की भरमार देखो.
दिव्याभ जी, उपस्थित जी, समीर जी, रोहिल्ला जी और संजय जी,
टिप्पणियों के लिये बहुत धन्यवाद। ऐसी ही कृपा बनाये रखिए।
बहुत सुन्दर रचना है बाकी अभी बहुत कुछ पढने एंव समझने को बाकी है
मेरे ब्लाग http://dilkadarpan.blogspot.com पर पधार कर अपनी टिप्पणी से मेरी रचनाओं का मुल्याकंन करने की कृपा करें
विशेष रूप से मेरी एक कविता "केवल संज्ञान है" जो http://merekavimitra.blogspot.com पर प्रेषित है आप की टिप्पणी की प्रतीक्षा में है
मोहिन्दर
आपकी कविता मे बहुत गहराई है इसमे अन्तःकरण के द्वन्द और इन्सान की अधीर खोज का बहुत ही अनुपम चित्रण किया है आपने
मोहिन्दर जी, अनुराग एवं संघमित्रा,
आपकी अर्थपूर्ण टिप्पणियों का बहुत धन्यवाद।
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