Tuesday, December 19, 2006

रमई काका

हिन्दी जगत में हास्यकवि काका हाथरसी के नाम से सभी परिचित हैं किन्तु एक और काका थे जिनसे बहुत से लोग परिचित नहीं हैं। ये थे रमई काका जिनका असली नाम था चन्द्रभूषण त्रिवेदी। आप बैसवाड़ी अवधी के उत्तम हास्य कवि (किन्तु केवल हास्य नहीं) थे। इनका जन्म सन् १९१५ में उत्तरप्रदेश के उन्नाव ज़िले के रावतपुर नामक गाँव में हुआ था। आपने आकाशवाणी लखनऊ-इलाहाबाद में सन् १९४० से १९७५ तक काम किया था। मेरे बचपन में इनका देहाती प्रोग्राम आता था जिसको गाँव के लोग बड़े चाव से रेडियो को घेर कर सुना करते थे। इस प्रोग्राम में कभी कभी एक प्रहसन आटा था जिसमें रमई काका 'बहिरे बाबा' का रोल अदा करते थे।

इनकी प्रकाशित पुस्तकों के नाम हैं:

बौछार, भिनसार, नेताजी, फुहार, हरपति तरवार, गुलछर्रे और हास्य के छींटे।

इनमें से मैं केवल बौछार और फुहार से परिचित हूँ। स्मृति से कुछ कविताओं के अंश आपको सुना रहा हूँ।

१। या छीछाल्यादरि द्याखौ तो
लरिकउना बी ए पास किहिसि
पुतऊ का बैरु ककहरा ते
या...

लरिकऊ चले अस्नान करैं तब
साबुन का उन सोप कहा
बहुरेवा लैकै सूप चली
या...

दिन राति बिलइती बोली माँ
उइ गिटपिट बोलि रहे
बहुरेवा सुनि सुनि सिटपिटाति
या...

२. बुढ़ऊ का बिवाह
जब पचपन के घरघाट भएन
तब देखुआ आये बड़े बड़े
हम शादी ते इनकार कीन
सब का लौटारा खड़े खड़े

सुखदीन दुबे, चिथरू चौबे
तिरबेनी आये धुन्नर जी
जिन बड़ेन बड़ेन का मात किहिन
बड़कए अवस्थी खुन्नर जी

(किसी तरीके से बुढ़ऊ को शादी के लिये तैयार किया जाता है। बारात जाती है किन्तु रतौंधी सारा मज़ा किरकिरा कर देती है। जब वर देवता खाने पर बैठते हैं तो दिखाई न देने के कारण दीवार की तरफ मुँह करके बैठते हैं। तब सासु जी आके कहती हैं, सुनिएः)

बच्चा आगे तन टाठी है
हम कहा कि हमरेव आँखी हैं
....
है बड़ी सफेद पोताई या
ताते देवार तन हेरि रहेन

(बिल्ली आके वर की थाली से खाना खाने लगती है। जब कोई आके बताता है तो वर देवता कहते हैं:)

घरहू माँ सदा बिलारिन का
हम साथै दूध पियावा है

(थोड़ी देर बाद वर को लगता है कि बिल्ली फिर से आगई है।)

हम जाना आई फिर बिलारि
मूँड़े माँ पाटा दै मारा

(लेकिन वे सासू जी थीं। फिर क्या हुआ?)

सब भेदु रतौंधिन का खुलिगा
चालाकी सारी खोई है।
३। ध्वाखा

हम गएन याक दिन लखनउऐ
कक्कू संजोग अइस परिगा
पहिलेहे पहिल हम सहरु दीख
तो कतौं कतौं ध्वाखा होइगा
....
हम गएन अमीनाबादै जब
कपड़ा लेंय बजाजा माँ
माटी कै सुघर मेहरिया एकु
तहँ खड़ी रहै दरवाजा माँ
हम जाना दुकान कै मलकिन
तो भाव ताव पूछैं लागेन
..
हम कहा बड़ा ध्वाखा होइगा।
...
तहमत पहिने अंडी ओढ़े
बाबू जी याकैं रहैं खड़े
हम कहा मेम साहेब सलाम
उइ झिझकि भखुरि खौख्याय उठे
मैं मेम नहीं हूँ, साहब हूँ
हम कहा बड़ा ध्वाखा होइगा।

४। कजरी तीज

सखि बरै जाय अस बरतु कि जस
लछमीना कजरी तीज रहीं
जिभिया है चलति कतन्नी असि
दिन राति कीन करतीं टंटा
लरिकन का धरि धरि खाती हैं
दुलहा का कहती हैं बंटा
मुलु आजु अमरु अहिबातु लेंय
सिव का चरनन माँ रीझि रहीं
लछमीना...
...
उठि परीं तड़क्के गजरदम्ब
फिरि ख्वावा सकर सुहारी लै
बिनु भूखै धाँसेनि पेटे माँ
जइसे बन्दूक अनारी कै
....
बाई ऊपर का चढ़ैं लागि
औ आवैं लाग घुमरि चक्कर
...
छोटकई बिटेवा रोय कहै
अम्मा भूखी हौ चलौ खाव
वा लोनु जरे माँ लगाय रही
लछमीना...
...
(अब ओझा को बुलाया जाता है जो कहता हैः)

पकरे जिन्नात बड़ा भारी
पूजा का जल्दी जतनु करौ
नहिं यो लछमीना का मारी

(लछमीना कहती हैं:)
बाबा, अब तो जिउ अच्छा है
है लाग न भूथ परेतु कोऊ
हम ख्वावा सक्करु भच्छा है।

५। बैठे गड़गप्प मतोले हैं
बड़ बूढ़न के पाँव छुऐं ना
छुवैं लँबरि कै मत्था
अतरु भूलिगे सब के कपरन
बइठे चुपरैं कत्था
अरे ई लोटन भाँग ढकोले हैं
बइठे...

६। ई आहीं पक्के लखनउआ
कहैं चीज के दूने दाम
बात बात माँ करैं सलाम
चीकट तकिया चटक लिहाफ
घर माँ गन्दे बाहेर साफ
बड़ा तकल्लुफ करि कै खाँय
एक कौर का सत्तरि दाँय
तितुर लड़ावैं कबौं बटेर
कबौं कबुतरन के हैं फेर
तिथि त्यौहार उड़ैं कनकउआ
जान लेहेव पक्का लखनउआ।

७। अरे भइ यहु तो काम नकारा है
दुसरे का उपदेसु देंय तो भाखैं पूरा बेद
साँझ सबेरा सिलबट्टा तर तूरैं नसा निषेध
अरे यहु दिया तरे अँधियारा है
अरे भइ...

८। जानि लेहेव पक्का ठगु आय
औषधि ब्याँचै साँप देखाय
लिल्लामी माँ खुब चिल्लाय
जानि...

बानगी के लिये इतना पर्याप्त है। चूँकि मेरे पास पुस्तकें नहीं है, अशुद्धियाँ हो सकती हैं। सहृदय पाठकों से निवेदन है कि इन अशुद्धियों को दूर करें और काका की अन्य कविताओं को अन्तरजाल तक पहुचाएँ।

...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...१९ दिसम्बर २००६

Monday, December 11, 2006

परदेसवा न जाव

( आज यह समाचार पढ़ा कि अमेरिकन एयरलाइन्स की एक उड़ान में किसी महिला ने अपान वायु का निष्काषन किया जो सुवासयुक्त नहीं था। शर्म से बचने के लिये महिला ने दो चार दियासलाई की तीलियाँ जला दीं। सहयात्रियों को जलने की गंध आयी। इसके फलस्वरूप उड़ान की आपत्कालीन लैंडिंग हुई और सभी ९९ यात्रियों की जाँच पड़ताल एफ बी आई ने की। यह कविता इन महिलारत्न को समर्पित है। तर्ज हैः नदी नारे न जाव, श्याम पइयाँ परूँ।)

परदेसवा न जाव प्रिया पइयाँ परूँ।
परदेसवा जो जाव प्रिया जइबे करौ,
पलेनवा ते न जाव, प्रिया पइयाँ परूँ।
परदेसवा...
पलेनवा ते जाव प्रिया जइबे करौ,
उहमाँ पादेव न प्रिया तोरे पइयाँ परूँ।
परदेसवा...
गर पलेनवाँ माँ पादेव प्रिया पादा करौ,
गंध का न छुपाव प्रिया पइयाँ परूँ।
परदेसवा...
गंध का जो छुपाव तो छुपइबे करौ,
माचिस न जराव प्रिया पइयाँ परूँ।
परदेसवा...
एक तीली जराई तो जरइबे करौ,
दुइ चारा न जराव प्रिया पइयाँ परूँ।
परदेसवा...
दुइ चारा जराई तो जरइबे करौ,
होस्टेस का बताव प्रिया पइयाँ परूँ।
परदेसवा...
होस्टेस का न बतायो तो न बतइबे करौ,
मुसाफिरन का बताव प्रिया पइयाँ परूँ।
परदेसवा...

…लक्ष्मीनारायण गुप्त
…11 दिसम्बर 2006

Sunday, December 03, 2006

भारत-भारती

मेरे बचपन में १९५५ ईसवी के लगभग मेरे पिता जी मैथिलीशरण गुप्त जी की पुस्तक "भारत-भारती" खरीद कर लाए थे या हो सकता है कि मेरे बड़े भाई के हिन्दी पाठ्यक्रम में रही हो। मुझे ठीक से याद नहीं है। कब लिखी गई थी, यह भी पता नहीं है। अन्तर्जाल से कुछ पता नहीं लग सका। बहरहाल, आपको इस पुस्तक की कुछ पंक्तियाँ जो याद हैं, सुना रहा हूँ।



१। मानस भवन में आर्य जन

जिसकी उतारें आरती

भगवान भारतवर्ष में

गूँजे हमारी भारती|

हो भव्य भावोद्भाविनी

ये भारती हे भगवते

सीतापते, सीतापते

गीतामते, गीतामते।



२। हम कौन थे क्या हो गए हैं

और क्या होंगे अभी

आओ बिचारें आज मिल कर

ये समस्याएं सभी।



३। केवल पतंग विहंगमों में

जलचरों में नाव ही

बस भोजनार्थ चतुष्पदों में

चारपाई बच रही।



४। श्रीमान शिक्षा दें अगर

तो श्रीमती कहतीं यही

छेड़ो न लल्ला को हमारे

नौकरी करनी नहीं।

शिक्षे, तुम्हारा नाश हो

तुम नौकरी के हित बनी।

लो, मूर्खते जीवित रहो

रक्षक तुम्हारे हैं धनी।



यह पुस्तक सम्पूर्ण हिन्दी भाषी जगत में बहुत ही लोकप्रिय हुई थी। यदि किसी को कुछ और याद हो, या किसी के पास पुस्तक हो तो अवश्य लिखें।



...लक्ष्मीनारायण गुप्त

...१ दिसम्बर २००६

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