नरोत्तमदास के सुदामाचरित से शायद अधिकांश हिन्दीभाषी परिचित होंगे। इनका जन्म सम्वत् १५५० विक्रम (तदनुसार १४९३ ईसवी) के लगभग वर्तमान उत्तरप्रदेश के सीतापुर जिले में हुआ और मृत्यु सम्वत् १६०५ (तदनुसार १५४२ ईसवी) में हुई। इनकी भाषा ब्रज है। सुदामाचरित इनका मुख्य ग्रन्थ है और ग्रन्थों के बारे में मुझे जानकारी नहीं है।
सुदामाचरित के कुछ अंश स्मृति से, अपनी बुद्धि के अनुसार, अर्थ सहित प्रस्तुत कर रहा हूँ। कुछ पद पूरे पूरे याद भी नहीं हैं। आशा है कि विद्वान पाठक इन अधूरे पदों को पूर्ण करने में सहायता करेंगे। यदि किसी के पास पुस्तक हो तो कृपया पूरी पुस्तक अन्तर्जाल पर डालने का प्रयास करिये। सुदामाचरित की भाषा बड़ी सहज, मार्मिक और गेय है। तो अब रसास्वादन करियेः
सुदामा की पत्नी सुदामा से द्वारका जाने का अनुरोध करती हैं क्योंकि वे बड़ी दरिद्रता से रह रहे हैं।
१। कोदो सवाँ जुरतो भरि पेट तो चाहति ना दधि दूध मठौती
तीन पंक्तियाँ याद नहीं हैं।
(यदि मोटे अन्न जैसे कोदो और सवाँ भी उपलब्ध होते तो मुझे दही दूध, मट्ठे की चाह नहीं है।)
२। शिक्षक हौं सगरे जग को तिय ताको कहा तू देति है शिक्षा
जे तप कइ परलोक सुधारत सम्पति के तिनके नहिं इच्छा
(विस्मृत पंक्ति)
औरन को धन चाहिए बावरी ब्राह्मण को धन केवल भिक्षा
(मैं ब्राह्मण सारे जगत का शिक्षक हूँ; मुझे तू क्या शिक्षा दे रही है। जो तपस्या कर के परलोक सुधारते हैं, उन्हें सम्पत्ति की इच्छा नहीं होती है। हे बावली, औरों को धन की इच्छा हो सकती है किन्तु ब्राह्मण का धन केवल भिक्षा है।)
३। हूजे कनावड़ो बार हजार हितू जो दीनदयालू सों पाइए।
तीनहुँ लोक के नायक हैं तिनके दरबार न जात लजाइए।
मेरी कही चित में धरिए प्रभु भूलि न और प्रसंग चलाइए।
और के द्वारे को काज नहीं अब द्वारिकानायक के द्वारे पे जाइए।
( यदि दीन दयालु (कृष्ण) जैसा हितैषी मिले तो हजार बार नम्रता से सिर झुका सकते हैं। जो तीनों लोकों के नायक हैं, उनके दरबार जाते हुए नहीं लजाइए। प्रभु (सुदामा) आप मेरी कही चित्त में रखिए, और कोई प्रसंग नहीं चलाइए। अब किसी और के दरवाजे पे (भिक्षा माँगने) नहीं जाइए केवल द्वारिकानायक के द्वार को जाइए।)
४। द्वारिका जाहु जू द्वारिका जाहु जू आठहुँ याम यहै रट तेरे।
जो न कहो करिए तो बड़ो दुख जइए कहाँ अपनी गति हेरे।
(विस्मृत पंक्ति)
चारि सुपारी बिचारि कै देखु तो भेंट को चारि न चाउर मोरे।
("द्वारिका जाइए जी, द्वारिका जाइए जी" आठों पहर तूने यही रट लगा रखी है। यदि मैं तेरा कहना न करूँ तो तुझे बड़ा दुःख होगा किनतु मैं अपनी हालत देख कर कैसे जाऊँ। मेरे पास भेट देने को न तो चार सुपारी हैं, न मुट्ठी भर चावल।)
५। यह सुनि कै तिय हर्ष सों गई एक तिय पास।
पाव सेर चावल लिए आई सहित हुलास।।
( यह सुन कर सुदामा की पत्नी एक (पड़ोसी) महिला से पाव सेर चावल माँग लाई और बड़ी प्रसन्नता से सुदामा को दिए।)
६। सिद्धि कियो गणपति सुमिरि बाँधि दुपटिया खूँट।
माँगत खात चले गए मारग बाली बूँट।।
( (सुदामा) सिद्धि मनाकर, गणेश जी का स्मरण कर चावल को दुपट्टे की खूँट पर बाँध कर, रास्ते में बाली, बूँट (हरे चने) माँगते खाते, चले गए।
७। दीठि चकचौंधि गई येइ सब सुबरनमई एक सों एक सरस द्वारिका के भौन हैं।
पूँछे बिन कोऊ कहूँ काहू सों न करै बात देवता सों बैठे सब साधि करि मौन हैं।
(दो विस्मृत पंक्तियाँ)
( द्वारिका पहुँच कर द्वारिका के स्वर्णमय भवनों को देख कर सुदामा की आँखें चकाचौंध हो गईं। एक से एक बढ़ कर सुन्दर महल देखे। कोई भी बिना पूछे बात नहीं करता; सभी देवताओं की तरह मौन साध कर बैठे हैं।)
८। सीस पगा न झगा तन में प्रभु जानै को आहि बसै केहि ग्रामा।
धोती फटी सी लटी दुपटी अरु पाँव उपानह की नहिं सामा।
द्वार खड़ो द्विज दुर्बल एकु रहेउ चकि सो बसुधा अभिरामा।
बूझत दीन दयालु को धाम बतावत आपन नाम सुदामा।
(न सिर पर पगड़ी है, न बदन पर कुर्ता है, न पैरों में जूते हैं। फटी सी धोती पहने है और बदन पर एक दुपट्टा है। प्रभु पता नहीं यह कौन है और किस ग्राम में रहता है। द्वार पर यह दुर्बल ब्राह्मण खड़ा बड़ा चकित होकर आपकी अपार सम्पत्ति को देख रहा है। वह आप दीनदयालु के धाम को पूछ रहा है और अपना नाम सुदामा बताता है।)
९। बोल्यो द्वारपाल सों सुदामा नाम पाँड़े सुनि छाँड़े राज काज ऐसे जी की गति जानै को।
द्वारिका के नाथ हाथ जोरि धाय गहे पाँव भेंटे लपटाय ऐसी प्रीति अब मानै को।
नैनन बीच जल भरि पूँछत कुशल हरि विप्र बोल्यो विपदा में मोंहि पहिचानै को।
जैसी तुम कीन्हीं तैसी करै को कृपा के सिन्धु ऐसी प्रीति दीनबन्धु दीनन सन मानै को।
( जैसे ही द्वारपाल से सुदामा पांडे नाम सुना, कृष्ण, जिनके मन की गति को कोई नहीं जानता, राज काज छोड़ कर दौड़े और हाथ जोड़ कर सुदामा के पैर पकड़े और लपट के भेंट की। प्रभु जैसी प्रीति मानने वाला कौन है। आँखों में आँसू भर के प्रभु ने सुदामा से कुशल पूछी। सुदामा ने कहा कि, "मुशीबत में मुझे कौन पहचानता है। जैसा व्यवहार आपने किया है, ऐसा कौन करता है। हे दीनबन्धु, ऐसी प्रीति दीनों के साथ कौन मानता है।")
१०। ऐसे बिहाल बिवाँइन सो पग कंटक जाल गड़े पुनि जोये।
हाय महा दुख पायो सखा तुम आये इतै न कितै दिन खोये।
देखि सुदामा की दीनदशा करुणा करि कै करुणानिधि रोये।
पानी परात को हाथ छुयो नहिं नैनन के जल सों पग धोये।
(कृष्ण ने कहा, " आपके पैरों में ऐसी विषम बिवाँइयां हो रही हैं, पैरों में काँटे लगे हैं। हे मित्र, आपने महान दुःख पाये हैं और इतने दिन तक यहाँ न आकर कितना समय खोया है।" सुदामा की दीन दशा को देख कर असीम करुणा से करुणानिधि रो पड़े। परात का पानी तो रखा ही रहा, प्रभु के आँसुओं से सुदामा के पैर धुल गए।)
…लक्ष्मीनारायण गुप्त
…28 नवम्बर 2006
At present, this blog is set up to publish my Hindi poems and accept comments from the readers. Some contributions from others are also published from time to time. Laxmi N. Gupta
Tuesday, November 28, 2006
Wednesday, November 22, 2006
ज्वार की रोटी और बथुए का साग
जैसे पंजाबी खाने में मक्की की रोटी और सरसों का साग है वैसे ही हमारे क्षेत्रीय खाने में ज्वार की रोटी और बथुए का साग है। एक कहावत हैः
"जोन्डी की रोटी, साग बथुआ, नकल करै दहिजार नथुआ।"
जोन्डी = ज्वार, दहिजार = दाढ़ीजार
ज्वार की रोटी आटे को हाथ से थपथपा कर पतली और गोलाकार कर के तवे पर सेंकते हैं। इस आटे को बेलन से बेलना बहुत मुश्किल है। इस रोटी को पनेथी भी कहते हैं जैसे बेली हुई रोटी को बेली। पुराने समय के लोग समझते थे कि बेली रोटी स्वास्थ्य के लिये अच्छी नहीं होती। जब बहू ने बेली रोटियाँ ससुर को खिलानी शुरू कीं तो ससुर ने कहाः "सब हड्डी पसुरी निकरि परीं, उइ बेलि बेलि सब बेलि दिहिन।"
यह कहानी मैंने अपने गाँव के बुज़ुर्गों से सुनी थी। एक बार गाँव में कोई अंग्रेज़ अफसर रात में रुका। अब समस्या हुई कि इसे खाने को क्या दिया जाय। बहुत सोच बिचार कर उसे ज्वार की रोटी को गरम दूध में डाल कर, चीनी मिला कर दिया गया। अफसर ने खाने की बहुत तारीफ की और कहा कि इतना बढ़िया खाना उसने कभी नहीं खाया था।
अब फिर ज्वार की रोटी और बथुए के साग की तरफ चलते हैं। हमारे यहाँ का साग पंजाबी साग की तरह पिसा हुआ नहीं होता। साक को पतला पतला काट कर, थोड़ी सी अरहर की दाल के साथ और आटे के आलन के साथ बनाया जाता है तथा लहसुन का छौंक लगाया जाता है। बथुआ न हो तो पालक, चौलाई, सुकसा या पथरचटे के साथ भी बनाया जा सकता है। ये सभी चीज़ें खाए ३५-४० वर्ष हो चुके। सुकसा सुखाए हुए चने के साग को कहते हैं। सुकसे की याद से एक और कहावत याद आती है। इसमें बताया गया है कि किन किन चीज़ों को किन महीनों में त्याग देने से वैद्य घर नहीं आता हैः
"चैते गुड़, बैसाखे तेल
जेठे पन्थ, असाढ़े बेल
सावन सुकसा, भादौं मही
क्वार करेला, न कातिक दही
अगहन जीरा, पूसै धना
माघै मिश्री, न फागुन चना
जो यह बारह देय निभाय
ता घर वैद्य कबौं न जाय।"
इसके सत्य का मुझे कोई ज्ञान नहीं है। जो इसका परीक्षण करना चाहते हों, अपने खतरे पर करें।
आज इतना ही।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...२२ नवम्बर २००६
"जोन्डी की रोटी, साग बथुआ, नकल करै दहिजार नथुआ।"
जोन्डी = ज्वार, दहिजार = दाढ़ीजार
ज्वार की रोटी आटे को हाथ से थपथपा कर पतली और गोलाकार कर के तवे पर सेंकते हैं। इस आटे को बेलन से बेलना बहुत मुश्किल है। इस रोटी को पनेथी भी कहते हैं जैसे बेली हुई रोटी को बेली। पुराने समय के लोग समझते थे कि बेली रोटी स्वास्थ्य के लिये अच्छी नहीं होती। जब बहू ने बेली रोटियाँ ससुर को खिलानी शुरू कीं तो ससुर ने कहाः "सब हड्डी पसुरी निकरि परीं, उइ बेलि बेलि सब बेलि दिहिन।"
यह कहानी मैंने अपने गाँव के बुज़ुर्गों से सुनी थी। एक बार गाँव में कोई अंग्रेज़ अफसर रात में रुका। अब समस्या हुई कि इसे खाने को क्या दिया जाय। बहुत सोच बिचार कर उसे ज्वार की रोटी को गरम दूध में डाल कर, चीनी मिला कर दिया गया। अफसर ने खाने की बहुत तारीफ की और कहा कि इतना बढ़िया खाना उसने कभी नहीं खाया था।
अब फिर ज्वार की रोटी और बथुए के साग की तरफ चलते हैं। हमारे यहाँ का साग पंजाबी साग की तरह पिसा हुआ नहीं होता। साक को पतला पतला काट कर, थोड़ी सी अरहर की दाल के साथ और आटे के आलन के साथ बनाया जाता है तथा लहसुन का छौंक लगाया जाता है। बथुआ न हो तो पालक, चौलाई, सुकसा या पथरचटे के साथ भी बनाया जा सकता है। ये सभी चीज़ें खाए ३५-४० वर्ष हो चुके। सुकसा सुखाए हुए चने के साग को कहते हैं। सुकसे की याद से एक और कहावत याद आती है। इसमें बताया गया है कि किन किन चीज़ों को किन महीनों में त्याग देने से वैद्य घर नहीं आता हैः
"चैते गुड़, बैसाखे तेल
जेठे पन्थ, असाढ़े बेल
सावन सुकसा, भादौं मही
क्वार करेला, न कातिक दही
अगहन जीरा, पूसै धना
माघै मिश्री, न फागुन चना
जो यह बारह देय निभाय
ता घर वैद्य कबौं न जाय।"
इसके सत्य का मुझे कोई ज्ञान नहीं है। जो इसका परीक्षण करना चाहते हों, अपने खतरे पर करें।
आज इतना ही।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...२२ नवम्बर २००६
Sunday, November 19, 2006
प्रेम का चक्कर
प्रेम के चक्कर में जो इन्साँ पड़ा
बड़ा घनचक्कर उसे कहते हैं हम।
प्रेम से भोजन बड़ा है
बात यह पूरी सही कहते हैं हम।
प्रेम न करने से कोई
मृत्यु को पाता नहीं
किन्तु भोजन के बिना
मर जाओगे निश्चय ही तुम।
प्रेम के चक्कर में यारो पड़े तो
दुःख ही दुःख सदा पाओगे तुम।
लैला मजनू, हीर राँझा
की मिसालें याद हैं।
प्रेम के कारण मरे सब
तुमसे यह फरियाद है।
प्रेम ही करना है यदि तो
प्रेम भोजन से करो।
मरना ही है यदि तो मित्रो
रसमलाई पर मरो।
मुक्ति मिल जाएगी निश्चय
तृप्त होकर यदि मरो।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...१९ नवम्बर २००६
बड़ा घनचक्कर उसे कहते हैं हम।
प्रेम से भोजन बड़ा है
बात यह पूरी सही कहते हैं हम।
प्रेम न करने से कोई
मृत्यु को पाता नहीं
किन्तु भोजन के बिना
मर जाओगे निश्चय ही तुम।
प्रेम के चक्कर में यारो पड़े तो
दुःख ही दुःख सदा पाओगे तुम।
लैला मजनू, हीर राँझा
की मिसालें याद हैं।
प्रेम के कारण मरे सब
तुमसे यह फरियाद है।
प्रेम ही करना है यदि तो
प्रेम भोजन से करो।
मरना ही है यदि तो मित्रो
रसमलाई पर मरो।
मुक्ति मिल जाएगी निश्चय
तृप्त होकर यदि मरो।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...१९ नवम्बर २००६
Sunday, November 12, 2006
कृष्णभक्त कवि रसखान
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने जिन मुस्लिम हरिभक्तों के लिये कहा था, "इन मुसलमान हरिजनन पर कोटिन हिन्दू वारिए" उनमें रसखान का नाम सर्वोपरि है। वाहिद और आलम भी इसी परम्परा में आते हैं। सय्यद इब्राहीम "रसखान" का जन्म अन्तर्जाल पर उपलब्ध स्रोतों के अनुसार सन् १५३३ से १५५८ के बीच कभी हुआ था। चूँकि अकबर का राज्यकाल १५५६-१६०५ है, ये लगभग अकबर के समकालीन हैं। जन्मस्थान पिहानी कुछ लोगों के मतानुसार दिल्ली के समीप है। कुछ और लोगों के मतानुसार यह पिहानी उत्तरप्रदेश के हरदोई ज़िले में है। मृत्यु के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल पाई। यह भी पढ़ा कि रसखान ने भागवत का अनुवाद फारसी में किया।
पाठकों की सेवा में रसखान के कुछ सवैये अर्थसहित प्रस्तुत कर रहा हूँ।
१। मोरपखा सिर ऊपर राखिहौं, गुंज की माल गरे पहिरौंगी।
ओढ़ि पिताम्बर लै लकुटी, बन गोधन ग्वालन संग फिरौंगी।।
भावतो तोहिं जो है रसखान, तो तोरे कहे सब स्वाँग भरौंगी।
पै वा मुरली मुरलीधर की, अधरान धरी अधरा न धरौंगी।।
(गोपी कहती है) सिर के ऊपर मोरपंख रखूँगी, गुंजों (गुंजा या घुमचिल लाल और काले रंग का एक बहुत छोटा पत्थर है जिसका वज़न एक रत्ती माना जाता है) की माला गले में पहिनूँगी। पीताम्बर ओढ़ कर वन में गायों और ग्वालों के संग वन में भ्रमण करूँगी। रसखान कहते हैं क्योंकि तुझे (कृष्ण) को अच्छा लगता है इस लिये यह सारा तमाशा तेरे लिये करूँगी किन्तु तुम्हारे अधरों पर रखी हुई यह मुरली मैं अपने अधरों पर नहीं रखूँगी।
२। या लकुटी अरु कामरिया पै, राज्य तिहूँ पुर को तजि डारौं।
आठहुँ सिद्धि नवो निधि को सुख, नंद की गाय चराय बिसारौं।।
रसखान कबहुँ इन आँखिन सों ब्रज के बन बाग तड़ाग निहारौं।
कोटिन हूँ कलधौत के धाम करील के कुंजन वा पर वारौं।।
(रसखान कहते हैं) इस लकुटी (छड़ी) और कम्बल पर तीनों लोकों का राज्य छोड़ सकता हूँ। आठों सिद्धियों और नवों निधियों का सुख नन्द की गायें चरा कर भुला सकता हूँ। रसखान कहते हैं कि क्या मैं कभी इन आँखों से ब्रज के वन, बाग और तालाबों को देख सकूँगा? सोने के बने करोड़ों महल वृन्दावन के करील के कुंजों पर न्योछावर कर सकता हूँ।
३। धूरि भरे अति शोभित श्याम जू, तैसी बनी सिर सुन्दर चोटी।
खेलत खात फिरैं अँगना, पग पैंजनिया कटि पीरी कछौटी।।
वा छवि को रसखान विलोकत, वारत काम कलानिधि कोटी
काग के भाग कहा कहिए हरि हाथ सों ले गयो माखन रोटी।।
(बाल) कृष्ण धूल से भरे अति शोभित हो रहे हैं, सिर पर सुन्दर चोटी है, खेलते, खाते आँगन में घूम रहे हैं, पैरों में पैंजनी और कमर में पीली कछौटी बँधी है। रसखान कहते हैं कि उस छवि पर कामदेव अपनी करोड़ों कलाओं को न्योछावर करते हैं। अहोभाग्य उस कौवे के जो कृष्ण के हाथ से माखन रोटी छीन कर ले गया।
४। मानुष हौं तो वही रसखान, बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन।
जो पशु हौं तो कहा बस मेरो, चरौं नित नन्द की धेनु मँझारन।।
पाहन हौं तो वही गिरि को, जो लियो कर छत्र पुरन्दर कारन।
जो खग हौं तो बसेरो करौं, मिलि कालिन्दि कूल कदम्ब की डारन।।
रसखान कहते हैं कि (अगले जन्म में) मैं यदि मनुष्य हूँ तो मैं गोकुल के ग्वालों और गायों के बीच रहना चाहूँगा। यदि मैं बेबस पशु हूँ तो मै नन्द की गायों के साथ चरना चाहूँगा। अगर मैं पत्थर हूँ तो उसी पहाड़ का जिसे कृष्ण ने इन्द्र के कारण अपनी उँगली पर उठाया था। यदि मैं पक्षी हूँ तो मैं यमुना के तट पर किसी कदम्ब वृक्ष पर बसेरा करूँ।
५। गावैं गुनी गनिका गन्धर्व औ सारद सेस सबै गुण गावैं।
नाम अनन्त गनन्त गनेस जो ब्रह्मा त्रिलोचन पार न पावैं।।
जोगी जती तपसी अरु सिद्ध निरन्तर जाहिं समाधि लगावैं।
ताहिं अहीर की छोहरियाँ छछिया भरि छाछ पे नाच नचावैं।।
जिसके गुण अप्सरायें, गन्धर्व, शारदा और शेष सभी गाते हैं, जिसके अगणित नामों को गणेश भी नहीं गिन सकते, ब्रह्मा और त्रिलोचन शिव जी जिसकी महिमा का पार नहीं पाते हैं, योगी, यती, तपस्वी और सिद्ध जिसको पाने के लिये समाधि लगाते हैं, उसी (कृष्ण) को अहीरों की कन्यायें कटोरे भर मट्ठे के लिये नाच नचाती हैं।
६। सेस गनेस, महेस, दिनेस, सुरेसहु जाहिं निरन्तर गावैं।
जाहिं अनादि, अनन्त अखंड, अछेद, अभेद सुबेद बतावैं।
नारद से सुक व्यास रटैं पचि हारे तऊ पुनि पार न पावैं।
ताहिं अहीर की छोहरियाँ छछिया भरि छाछ पे नाच नचावैं।।
शेष, महेश, गणेश, दिनेश (सूर्य) और सुरेश (इन्द्र) जिसके गुण निरन्तर गाते हैं, जिसे वेद अनादि, अनन्त, अखंड, अछेद्य, और अभेद बतातेहैं, नारद, शुकदेव और व्यास जैसे मुनि जिसका नाम रटते हैं और प्रयत्न करके भी उसका पार नहीं पाते हैं, उसी (कृष्ण) को अहीरों की कन्यायें कटोरे भर मट्ठे के लिये नाच नचाती हैं।
७। संकर से सुर जाहिं जपैं चतुरानन ध्यानन धर्म बढ़ावैं।
नेक हिये में जो आवत ही जड़ मूढ़ महा रसखान कहावै।।
जा पर देव अदेव भुअंगन वारत प्रानन प्रानन पावैं।
ताहिं अहीर की छोहरियाँ छछिया भरि छाछ पे नाच नचावैं।।
शंकर जी जैसे देव जिसे जपते हैं और ब्रह्मा जी धर्म की वृद्धि के लिये जिसका ध्यान करते हैं, जिसके बस तनिक ही हृदय में आ जाने पर मेरा जैसा जड़, मूढ़ रसखान (रस की खान) कहलाता है, जिस पर देवता, राक्षस, नाग अपने प्राणों को न्योछावर करते हैं, उसी (कृष्ण) को अहीरों की कन्यायें कटोरे भर मट्ठे के लिये नाच नचाती हैं।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...11 नवम्बर 2006
पाठकों की सेवा में रसखान के कुछ सवैये अर्थसहित प्रस्तुत कर रहा हूँ।
१। मोरपखा सिर ऊपर राखिहौं, गुंज की माल गरे पहिरौंगी।
ओढ़ि पिताम्बर लै लकुटी, बन गोधन ग्वालन संग फिरौंगी।।
भावतो तोहिं जो है रसखान, तो तोरे कहे सब स्वाँग भरौंगी।
पै वा मुरली मुरलीधर की, अधरान धरी अधरा न धरौंगी।।
(गोपी कहती है) सिर के ऊपर मोरपंख रखूँगी, गुंजों (गुंजा या घुमचिल लाल और काले रंग का एक बहुत छोटा पत्थर है जिसका वज़न एक रत्ती माना जाता है) की माला गले में पहिनूँगी। पीताम्बर ओढ़ कर वन में गायों और ग्वालों के संग वन में भ्रमण करूँगी। रसखान कहते हैं क्योंकि तुझे (कृष्ण) को अच्छा लगता है इस लिये यह सारा तमाशा तेरे लिये करूँगी किन्तु तुम्हारे अधरों पर रखी हुई यह मुरली मैं अपने अधरों पर नहीं रखूँगी।
२। या लकुटी अरु कामरिया पै, राज्य तिहूँ पुर को तजि डारौं।
आठहुँ सिद्धि नवो निधि को सुख, नंद की गाय चराय बिसारौं।।
रसखान कबहुँ इन आँखिन सों ब्रज के बन बाग तड़ाग निहारौं।
कोटिन हूँ कलधौत के धाम करील के कुंजन वा पर वारौं।।
(रसखान कहते हैं) इस लकुटी (छड़ी) और कम्बल पर तीनों लोकों का राज्य छोड़ सकता हूँ। आठों सिद्धियों और नवों निधियों का सुख नन्द की गायें चरा कर भुला सकता हूँ। रसखान कहते हैं कि क्या मैं कभी इन आँखों से ब्रज के वन, बाग और तालाबों को देख सकूँगा? सोने के बने करोड़ों महल वृन्दावन के करील के कुंजों पर न्योछावर कर सकता हूँ।
३। धूरि भरे अति शोभित श्याम जू, तैसी बनी सिर सुन्दर चोटी।
खेलत खात फिरैं अँगना, पग पैंजनिया कटि पीरी कछौटी।।
वा छवि को रसखान विलोकत, वारत काम कलानिधि कोटी
काग के भाग कहा कहिए हरि हाथ सों ले गयो माखन रोटी।।
(बाल) कृष्ण धूल से भरे अति शोभित हो रहे हैं, सिर पर सुन्दर चोटी है, खेलते, खाते आँगन में घूम रहे हैं, पैरों में पैंजनी और कमर में पीली कछौटी बँधी है। रसखान कहते हैं कि उस छवि पर कामदेव अपनी करोड़ों कलाओं को न्योछावर करते हैं। अहोभाग्य उस कौवे के जो कृष्ण के हाथ से माखन रोटी छीन कर ले गया।
४। मानुष हौं तो वही रसखान, बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन।
जो पशु हौं तो कहा बस मेरो, चरौं नित नन्द की धेनु मँझारन।।
पाहन हौं तो वही गिरि को, जो लियो कर छत्र पुरन्दर कारन।
जो खग हौं तो बसेरो करौं, मिलि कालिन्दि कूल कदम्ब की डारन।।
रसखान कहते हैं कि (अगले जन्म में) मैं यदि मनुष्य हूँ तो मैं गोकुल के ग्वालों और गायों के बीच रहना चाहूँगा। यदि मैं बेबस पशु हूँ तो मै नन्द की गायों के साथ चरना चाहूँगा। अगर मैं पत्थर हूँ तो उसी पहाड़ का जिसे कृष्ण ने इन्द्र के कारण अपनी उँगली पर उठाया था। यदि मैं पक्षी हूँ तो मैं यमुना के तट पर किसी कदम्ब वृक्ष पर बसेरा करूँ।
५। गावैं गुनी गनिका गन्धर्व औ सारद सेस सबै गुण गावैं।
नाम अनन्त गनन्त गनेस जो ब्रह्मा त्रिलोचन पार न पावैं।।
जोगी जती तपसी अरु सिद्ध निरन्तर जाहिं समाधि लगावैं।
ताहिं अहीर की छोहरियाँ छछिया भरि छाछ पे नाच नचावैं।।
जिसके गुण अप्सरायें, गन्धर्व, शारदा और शेष सभी गाते हैं, जिसके अगणित नामों को गणेश भी नहीं गिन सकते, ब्रह्मा और त्रिलोचन शिव जी जिसकी महिमा का पार नहीं पाते हैं, योगी, यती, तपस्वी और सिद्ध जिसको पाने के लिये समाधि लगाते हैं, उसी (कृष्ण) को अहीरों की कन्यायें कटोरे भर मट्ठे के लिये नाच नचाती हैं।
६। सेस गनेस, महेस, दिनेस, सुरेसहु जाहिं निरन्तर गावैं।
जाहिं अनादि, अनन्त अखंड, अछेद, अभेद सुबेद बतावैं।
नारद से सुक व्यास रटैं पचि हारे तऊ पुनि पार न पावैं।
ताहिं अहीर की छोहरियाँ छछिया भरि छाछ पे नाच नचावैं।।
शेष, महेश, गणेश, दिनेश (सूर्य) और सुरेश (इन्द्र) जिसके गुण निरन्तर गाते हैं, जिसे वेद अनादि, अनन्त, अखंड, अछेद्य, और अभेद बतातेहैं, नारद, शुकदेव और व्यास जैसे मुनि जिसका नाम रटते हैं और प्रयत्न करके भी उसका पार नहीं पाते हैं, उसी (कृष्ण) को अहीरों की कन्यायें कटोरे भर मट्ठे के लिये नाच नचाती हैं।
७। संकर से सुर जाहिं जपैं चतुरानन ध्यानन धर्म बढ़ावैं।
नेक हिये में जो आवत ही जड़ मूढ़ महा रसखान कहावै।।
जा पर देव अदेव भुअंगन वारत प्रानन प्रानन पावैं।
ताहिं अहीर की छोहरियाँ छछिया भरि छाछ पे नाच नचावैं।।
शंकर जी जैसे देव जिसे जपते हैं और ब्रह्मा जी धर्म की वृद्धि के लिये जिसका ध्यान करते हैं, जिसके बस तनिक ही हृदय में आ जाने पर मेरा जैसा जड़, मूढ़ रसखान (रस की खान) कहलाता है, जिस पर देवता, राक्षस, नाग अपने प्राणों को न्योछावर करते हैं, उसी (कृष्ण) को अहीरों की कन्यायें कटोरे भर मट्ठे के लिये नाच नचाती हैं।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...11 नवम्बर 2006
Friday, November 10, 2006
प्यार का एक यथार्थ चित्र
भाग्य में भूसा भरा था
अक्ल में पत्थर।
प्रिये जो तुमसे चलाया
प्यार का चक्कर।।
प्यार के चक्कर में प्रिय
बरबाद अब हम हो गए।
चाट, पिक्चर में सभी
पैसे नदारद हो गए।।
फीस कालेज़ की प्रिये
अब किस तरह दे पायेंगे।
पूज्य डैडी जी को मुँह
अब किस तरह दिखलायेंगे।।
हल तुम्ही ही कुछ निकालो
प्रिये यह लफड़ा बड़ा।
हम यही कहते रहेंगे
प्यार यह महँगा पड़ा।।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...१० नवम्बर २००६
अक्ल में पत्थर।
प्रिये जो तुमसे चलाया
प्यार का चक्कर।।
प्यार के चक्कर में प्रिय
बरबाद अब हम हो गए।
चाट, पिक्चर में सभी
पैसे नदारद हो गए।।
फीस कालेज़ की प्रिये
अब किस तरह दे पायेंगे।
पूज्य डैडी जी को मुँह
अब किस तरह दिखलायेंगे।।
हल तुम्ही ही कुछ निकालो
प्रिये यह लफड़ा बड़ा।
हम यही कहते रहेंगे
प्यार यह महँगा पड़ा।।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...१० नवम्बर २००६
Wednesday, November 08, 2006
नक़ाबपोश
हम सभी नक़ाबपोश हैं
बहुत तरह की हैं हमारी नक़ाबें
मज़हब की, जाति की, चमड़ी के रंग की
राजनीति की, राष्ट्रीयता की
ग़रीबी की, अमीरी की
शोषक की, शोषित की
नायक की, खलनायक की
पंडित की, मूरख की
फ़ख़्र है हमें अपनी नक़ाबों पर
गर्व है हमें अपनी नक़ाबों पर
हम इन पर जान दे सकते हैं
शहीद हो सकते हैं
क़ुरबान हो सकते हैं
दूसरे की जान ले सकते हैं
छिपे हैं इन नक़ाबों के पीछे
इन्सान हाड़ मांस के
जिनके सीनों में एक जैसा दिल है
जिनकी रगों में एक जैसा लहू है
जिनकी ज़िन्दगी में आशायें, निराशायें हैं
सुख दुःख हैं
नक़ाबों के पीछे सब इक जैसे हैं
आसान है नक़ाबें पहन कर
नाटक करना
लड़ना भिड़ना
कत्ल, मारकाट करना
दुराचार और बलात्कार करना
इसकी नक़ाब दूसरी है
यह दूसरी जाति का है
यह दूसरे मज़हब का है
यह दूसरे देश का है
इसका रंग दूसरा है
यह देशद्रोही है
यह विद्रोही है
मारना आसान है
एक नक़ाबपोश को
दूसरे नक़ाबपोश के लिये
बेहतरीन तरीका है
इन्सानियत को ढकने का
आइए अब बहुत देर हो चुकी है
इन नक़ाबों को हटाइए
नक़ाबों के पीछे छिपे
इन्सान को देखिये
जो तुम्हारी ही तरह
हाड़ मांस का है
जिसके सीने में
तुम्हारा जैसा ही दिल है
जो तुम्हारी ही तरह
जीता है
और साँस लेता है
गहराई से देखो तो
तुम वही हो
जो वह है
उसे गले लगाइए
इन नक़ाबों को हटाइए
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...८ नवम्बर २००६
बहुत तरह की हैं हमारी नक़ाबें
मज़हब की, जाति की, चमड़ी के रंग की
राजनीति की, राष्ट्रीयता की
ग़रीबी की, अमीरी की
शोषक की, शोषित की
नायक की, खलनायक की
पंडित की, मूरख की
फ़ख़्र है हमें अपनी नक़ाबों पर
गर्व है हमें अपनी नक़ाबों पर
हम इन पर जान दे सकते हैं
शहीद हो सकते हैं
क़ुरबान हो सकते हैं
दूसरे की जान ले सकते हैं
छिपे हैं इन नक़ाबों के पीछे
इन्सान हाड़ मांस के
जिनके सीनों में एक जैसा दिल है
जिनकी रगों में एक जैसा लहू है
जिनकी ज़िन्दगी में आशायें, निराशायें हैं
सुख दुःख हैं
नक़ाबों के पीछे सब इक जैसे हैं
आसान है नक़ाबें पहन कर
नाटक करना
लड़ना भिड़ना
कत्ल, मारकाट करना
दुराचार और बलात्कार करना
इसकी नक़ाब दूसरी है
यह दूसरी जाति का है
यह दूसरे मज़हब का है
यह दूसरे देश का है
इसका रंग दूसरा है
यह देशद्रोही है
यह विद्रोही है
मारना आसान है
एक नक़ाबपोश को
दूसरे नक़ाबपोश के लिये
बेहतरीन तरीका है
इन्सानियत को ढकने का
आइए अब बहुत देर हो चुकी है
इन नक़ाबों को हटाइए
नक़ाबों के पीछे छिपे
इन्सान को देखिये
जो तुम्हारी ही तरह
हाड़ मांस का है
जिसके सीने में
तुम्हारा जैसा ही दिल है
जो तुम्हारी ही तरह
जीता है
और साँस लेता है
गहराई से देखो तो
तुम वही हो
जो वह है
उसे गले लगाइए
इन नक़ाबों को हटाइए
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...८ नवम्बर २००६
Friday, November 03, 2006
फुलझड़ियाँ
१। केरी ने ऐसी करी जस करिहू न कराहिं।
जीते हुए चुनाव को हार तरफ धकियाहिं।।
(केरी = जान केरी, करि = रिपब्लिकन हाथी)
२। फोली ने फल खाय के करि को मारी लात।
गदहों की यह दुलत्ती तुम कहँ सीखी तात।।
(फोली = मार्क फोली, करि = रिपब्लिकन हाथी, गदहा = डेमोक्रैटिक गधा)
३। संत बड़े हैं पोप से जग को देवैं सीख।
लेकिन उनके पादरी लरिकन संग करैं प्रीत।।
लरिकन के सँग प्रीति करैं उनका फुसलावैं।
शिशुवन के सँग बलात्कार ना प्रभुहिं सुहावै।।
४। सदामहुसेन को पकड़ के दियो जेल में डाल।
बोले बुश ईराक अब होवेगो खुशहाल।।
ऐसी खुशहाली प्रभू ना काहू को देहु।
रूमी, चेनी, बुशी को डारि नरक माँ देहु।।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...३ नवम्बर २००६
जीते हुए चुनाव को हार तरफ धकियाहिं।।
(केरी = जान केरी, करि = रिपब्लिकन हाथी)
२। फोली ने फल खाय के करि को मारी लात।
गदहों की यह दुलत्ती तुम कहँ सीखी तात।।
(फोली = मार्क फोली, करि = रिपब्लिकन हाथी, गदहा = डेमोक्रैटिक गधा)
३। संत बड़े हैं पोप से जग को देवैं सीख।
लेकिन उनके पादरी लरिकन संग करैं प्रीत।।
लरिकन के सँग प्रीति करैं उनका फुसलावैं।
शिशुवन के सँग बलात्कार ना प्रभुहिं सुहावै।।
४। सदामहुसेन को पकड़ के दियो जेल में डाल।
बोले बुश ईराक अब होवेगो खुशहाल।।
ऐसी खुशहाली प्रभू ना काहू को देहु।
रूमी, चेनी, बुशी को डारि नरक माँ देहु।।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...३ नवम्बर २००६
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