इतनी बार दिवाली
इतनी बार दिवाली आई
अंधकार पर ज्यों का त्यों है
इतना मधु उपलब्ध
कण्ठ फिर सूखा क्यों है
इतने आशा दीप जले पर
ऐसी अंध निराशा क्यों है
इतनी बार……
आज दिवाली आई है
और ईद साथ में ही आई है
किन्तु मनुजता के ऊपर क्यों
दानवता की परछाईं है
भीषण नरसंहार हो रहा
मानव इतना अंधा क्यों है
इतनी माताओं के आँसू
आज बह रहे अविरल क्यों हैं
इतनी बार…
मध्यपूर्व जल रहा, जल रहे सूडानी हैं
जलते कांगो और युगांडा
जलता मानवता का दिल है
इतने दीप जल रहे बाहर
मन में आज अँधेरा क्यों है
इतनी बार…
लिखने बैठा था कविता मैं
आशा सम्बल देने वाली
किन्तु लेखनी ने लिख डाली
कविता एक निराशा वाली
आज दिवाली के अवसर पर
इतना सघन अँधेरा क्यों है
इतनी बार…
,,,लक्ष्मीनारायण गुप्त
…23 अक्तूबर 2006



