इतनी बार दिवाली आई
अंधकार पर ज्यों का त्यों है
इतना मधु उपलब्ध
कण्ठ फिर सूखा क्यों है
इतने आशा दीप जले पर
ऐसी अंध निराशा क्यों है
इतनी बार……
आज दिवाली आई है
और ईद साथ में ही आई है
किन्तु मनुजता के ऊपर क्यों
दानवता की परछाईं है
भीषण नरसंहार हो रहा
मानव इतना अंधा क्यों है
इतनी माताओं के आँसू
आज बह रहे अविरल क्यों हैं
इतनी बार…
मध्यपूर्व जल रहा, जल रहे सूडानी हैं
जलते कांगो और युगांडा
जलता मानवता का दिल है
इतने दीप जल रहे बाहर
मन में आज अँधेरा क्यों है
इतनी बार…
लिखने बैठा था कविता मैं
आशा सम्बल देने वाली
किन्तु लेखनी ने लिख डाली
कविता एक निराशा वाली
आज दिवाली के अवसर पर
इतना सघन अँधेरा क्यों है
इतनी बार…
,,,लक्ष्मीनारायण गुप्त
…23 अक्तूबर 2006
At present, this blog is set up to publish my Hindi poems and accept comments from the readers. Some contributions from others are also published from time to time. Laxmi N. Gupta
Monday, October 23, 2006
Thursday, October 19, 2006
प्रभु के दरबार में वस्त्र
कैसे कपड़े पहिन के जायें, प्रभु दरबार।
प्रश्न उठा है मनस में, सज्जन करें विचार।।
प्रश्न पादरी से करो, तो यह उत्तर देय।
सूट बूट टाई बिना चर्च न आवे कोय।।
चर्च न आवे कोय, करे ना प्रभु का आदर।
सुन्दर वस्त्रों बिना घुसे, जो प्रभु के मन्दिर।।
हिन्दू मन्दिर बहुत से, हैं जग में विख्यात।
जिनमें धोती ही पहिन, घुस सकते हैं आप।।
नारी ने धारण किये, यदि यूरोपियन वस्त्र।
घुसने पाएगी नहीं, तो वह मेरे मित्र।।
गुरुद्वारे में घुसन का स्वप्न न देखें आप।
पगड़ी पहिनन में अगर होता है संताप।।
यह सब झंझट देख के, मन में उठे विचार।
कैसे प्रभु के पास से, हम सब आए यार।।
नंगे प्रभु के पास से हम सब आए यार।
नंगे होके जाइए, सब प्रभु के दरबार।।
यदि तुम को करने न दे, कोई नग्न प्रवेश।
कम से कम कपड़े पहिन, जायें प्रभु के देश।।
छुपा हुआ कोई नहीं, प्रभु से तेरा अंग।
वस्त्र पहिनने का कोई, उठता नहीं प्रसंग।।
अन्तर्यामी राम को, मालुम सारे भाव।
सूट पहिनने का कोई, पड़ता नहीं प्रभाव।।
इससे तो कच्छा पहिन, जाओ प्रभु के पास।
कपड़ों की छद्मता यह, प्रभु को करे न रास।।
नग्न नहीं यदि नारियो, जा सकती हैं आप।
बिकिनी चोली पहिन कर, जायें बेधड़क आप।।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...१९ अक्टूबर २००६
प्रश्न उठा है मनस में, सज्जन करें विचार।।
प्रश्न पादरी से करो, तो यह उत्तर देय।
सूट बूट टाई बिना चर्च न आवे कोय।।
चर्च न आवे कोय, करे ना प्रभु का आदर।
सुन्दर वस्त्रों बिना घुसे, जो प्रभु के मन्दिर।।
हिन्दू मन्दिर बहुत से, हैं जग में विख्यात।
जिनमें धोती ही पहिन, घुस सकते हैं आप।।
नारी ने धारण किये, यदि यूरोपियन वस्त्र।
घुसने पाएगी नहीं, तो वह मेरे मित्र।।
गुरुद्वारे में घुसन का स्वप्न न देखें आप।
पगड़ी पहिनन में अगर होता है संताप।।
यह सब झंझट देख के, मन में उठे विचार।
कैसे प्रभु के पास से, हम सब आए यार।।
नंगे प्रभु के पास से हम सब आए यार।
नंगे होके जाइए, सब प्रभु के दरबार।।
यदि तुम को करने न दे, कोई नग्न प्रवेश।
कम से कम कपड़े पहिन, जायें प्रभु के देश।।
छुपा हुआ कोई नहीं, प्रभु से तेरा अंग।
वस्त्र पहिनने का कोई, उठता नहीं प्रसंग।।
अन्तर्यामी राम को, मालुम सारे भाव।
सूट पहिनने का कोई, पड़ता नहीं प्रभाव।।
इससे तो कच्छा पहिन, जाओ प्रभु के पास।
कपड़ों की छद्मता यह, प्रभु को करे न रास।।
नग्न नहीं यदि नारियो, जा सकती हैं आप।
बिकिनी चोली पहिन कर, जायें बेधड़क आप।।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...१९ अक्टूबर २००६
Monday, October 09, 2006
दो सुभाषित
शूद्रक के मशहूर नाटक मृच्छकटिक (मिट्टी की गाड़ी) में दो बहुत सुन्दर सुभाषित हैं:
1. रे रे चातक सावधान मनसा मित्रं क्षणं श्रूयताम्।
अम्भोदा बहवो हि सन्ति गगने सर्वेति नैताद्रशाः।।
केचिद् वृष्टिभिराद्रयन्ति वसुधा केचिद् गर्जन्ति वृथा।
यं यं पश्यसि तस्य तस्य पुरता मा ब्रूहि दीनं वचः।।
अर्थः हे चातक (पपीहा) सावधान होकर एक क्षण के लिये मेरी बात सुनो। आकाश में बहुत से बादल होते हैं किनतु सभी समान नहीं होते हैं। किन्हीं की वर्षा से पृथ्वी गीली हो जाती है और कुछ व्यर्थ ही गरजते हैं। इस लिये जिस जिस को देखते हो उन सभी के सामने दीन वचन न बोलो।
इसका लगभग समानार्थी रहीम का दोहा हैः
रहिमन निज मन की व्यथा मन ही राखौ गोय।
सुनि अठिलैहैं लोग सब बाँटि न लेहै कोय।।
अर्थः रहीम कहते हैं कि अपने मन की व्यथा अपने ही मन में रखो क्योंकि सुन कर लोग केवल हँसी उड़ायेंगे और तुम्हारा कष्ट कोई नहीं बाँटेगा।
2. सुखं हि दुःखाय अनुभूय शोभते घनांधकारेमिव दीपदर्शनम्।
सुखात् यो याति नरो दरिद्रतां धृत: शरीरेण मृत: स जीवति।।
अर्थः सुख का अनुभव दुःख के अनुभव के बाद ज्यादा गहराई से होता है जैसे घने अँधेरे में दीपक की रोशनी ज्यादा भली लगती है किन्तु जो सुख के बाद गरीबी में जाता है वह शरीर धारण किये हुए भी मरे हुए की तरह जीता है।
इसका लगभग समानार्थी यह दोहा हैः
बढ़त बढ़त सम्पति सलिल मन सरोज बढ़ि जाय।
घटत घटत पुनि ना घटै तब समूल कुम्हिलाय।।
अर्थः सम्पत्ति रूपी पानी के बढ़ने पर मन रूपी कमल बढ़ जाता है। सम्पत्ति के घटने पर यह कमल घट नहीं पाता और जड़ के सहित कुम्हला जाता है।
दिवाली आने वाली है। अच्छा होगा यदि जुआड़ी लोग इस सुभाषित का ध्यान रखें।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...9 अक्टूबर 2006
1. रे रे चातक सावधान मनसा मित्रं क्षणं श्रूयताम्।
अम्भोदा बहवो हि सन्ति गगने सर्वेति नैताद्रशाः।।
केचिद् वृष्टिभिराद्रयन्ति वसुधा केचिद् गर्जन्ति वृथा।
यं यं पश्यसि तस्य तस्य पुरता मा ब्रूहि दीनं वचः।।
अर्थः हे चातक (पपीहा) सावधान होकर एक क्षण के लिये मेरी बात सुनो। आकाश में बहुत से बादल होते हैं किनतु सभी समान नहीं होते हैं। किन्हीं की वर्षा से पृथ्वी गीली हो जाती है और कुछ व्यर्थ ही गरजते हैं। इस लिये जिस जिस को देखते हो उन सभी के सामने दीन वचन न बोलो।
इसका लगभग समानार्थी रहीम का दोहा हैः
रहिमन निज मन की व्यथा मन ही राखौ गोय।
सुनि अठिलैहैं लोग सब बाँटि न लेहै कोय।।
अर्थः रहीम कहते हैं कि अपने मन की व्यथा अपने ही मन में रखो क्योंकि सुन कर लोग केवल हँसी उड़ायेंगे और तुम्हारा कष्ट कोई नहीं बाँटेगा।
2. सुखं हि दुःखाय अनुभूय शोभते घनांधकारेमिव दीपदर्शनम्।
सुखात् यो याति नरो दरिद्रतां धृत: शरीरेण मृत: स जीवति।।
अर्थः सुख का अनुभव दुःख के अनुभव के बाद ज्यादा गहराई से होता है जैसे घने अँधेरे में दीपक की रोशनी ज्यादा भली लगती है किन्तु जो सुख के बाद गरीबी में जाता है वह शरीर धारण किये हुए भी मरे हुए की तरह जीता है।
इसका लगभग समानार्थी यह दोहा हैः
बढ़त बढ़त सम्पति सलिल मन सरोज बढ़ि जाय।
घटत घटत पुनि ना घटै तब समूल कुम्हिलाय।।
अर्थः सम्पत्ति रूपी पानी के बढ़ने पर मन रूपी कमल बढ़ जाता है। सम्पत्ति के घटने पर यह कमल घट नहीं पाता और जड़ के सहित कुम्हला जाता है।
दिवाली आने वाली है। अच्छा होगा यदि जुआड़ी लोग इस सुभाषित का ध्यान रखें।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...9 अक्टूबर 2006
Tuesday, October 03, 2006
कलियुग में नाम काम का मेल
(यह कविता काका हाथरसी की कविता "नाम बड़े औ दर्शन छोटे" से प्रेरित है।)
कलियुग में होता नहीं नाम काम का मेल।
धनपति के घर में रहे चूहे दंडें पेल।।
जिनके चित में है नहीं करुणा का लवलेस।
बोधिसत्व के नाम से जाने उनको देश।।
दस्तख़त करने केलिये देत अँगूठा छाप।
विद्यापति उनको कहैं उनको उनके बाप।।
जिनकी छवि को देख कर दयी मातु भी रोय।
रूपमती के नाम से शादी उनकी होय।।
भीमसेन के नाम से जो जग में विख्यात।
पिद्दी सा उनका बदन कोमल उनके गात।।
धरी चपत इक पुत्र के पति को मारा हाथ।
शीला उनका नाम है रखा पिता ने तात।।
जो कविता के नाम पे चारो खाने चित्त।
उन्हें कवीश्वर नाम से जानें सारे मित्र।।
जो हत्या के जुर्म में जेल रहे हैं काट।
धर्मराज के नाम से जग में जाने जात।।
जिनके कर्कश सुरों ने हियरा किया विदीर्ण।
उन्हें कोकिला नाम से जानें सभी प्रवीण।।
नाम रखा था पिता ने जिनका श्रवणकुमार।
क्रुद्ध हुए वे पिता से घर से दिया निकाल।।
जिनके घर में क्रान्ति सी होती साँझ सवेर
शान्ति उनका नाम है यह कैसी अन्धेर।।
भाग रहे हैं युद्ध से वीरसिंह जी भाय।
औ कुबेरमल सड़क पर झाड़ू रहे लगाय।।
जिनके भीषण कोप से पत्नी जाती काँप।
करुणाशंकर नाम से जाने जाते आप।।
लक्ष्मीगुप्त सुजान अब तुमको देवैं सीख।
भाग्यवान हैं माँगते प्लेटफार्म पर भीख।।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...३ अक्टूबर २००६
कलियुग में होता नहीं नाम काम का मेल।
धनपति के घर में रहे चूहे दंडें पेल।।
जिनके चित में है नहीं करुणा का लवलेस।
बोधिसत्व के नाम से जाने उनको देश।।
दस्तख़त करने केलिये देत अँगूठा छाप।
विद्यापति उनको कहैं उनको उनके बाप।।
जिनकी छवि को देख कर दयी मातु भी रोय।
रूपमती के नाम से शादी उनकी होय।।
भीमसेन के नाम से जो जग में विख्यात।
पिद्दी सा उनका बदन कोमल उनके गात।।
धरी चपत इक पुत्र के पति को मारा हाथ।
शीला उनका नाम है रखा पिता ने तात।।
जो कविता के नाम पे चारो खाने चित्त।
उन्हें कवीश्वर नाम से जानें सारे मित्र।।
जो हत्या के जुर्म में जेल रहे हैं काट।
धर्मराज के नाम से जग में जाने जात।।
जिनके कर्कश सुरों ने हियरा किया विदीर्ण।
उन्हें कोकिला नाम से जानें सभी प्रवीण।।
नाम रखा था पिता ने जिनका श्रवणकुमार।
क्रुद्ध हुए वे पिता से घर से दिया निकाल।।
जिनके घर में क्रान्ति सी होती साँझ सवेर
शान्ति उनका नाम है यह कैसी अन्धेर।।
भाग रहे हैं युद्ध से वीरसिंह जी भाय।
औ कुबेरमल सड़क पर झाड़ू रहे लगाय।।
जिनके भीषण कोप से पत्नी जाती काँप।
करुणाशंकर नाम से जाने जाते आप।।
लक्ष्मीगुप्त सुजान अब तुमको देवैं सीख।
भाग्यवान हैं माँगते प्लेटफार्म पर भीख।।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...३ अक्टूबर २००६
Sunday, October 01, 2006
दुर्गा जी के जूते
कल दुर्गाष्टमी थी। स्थानीय हिन्दू मन्दिर में दुर्गा चौकी लगी थी। लगभग २०० भक्तगण उपस्थित थे। सब से अधिक उत्साह था पंजाबियों में। भक्ति से ओतप्रोत ध्वनियाँ आ रहीं थीं:
शेराँ वाली माँ
पहाड़ा वाली माँ...
सुन कर एक करीब १५ वर्ष पुरानी याद आई। एक बार हमारे घर में दुर्गाष्टमी मनाई जा रही थी। कुछ मित्र भजनों की प्रतिलिपियाँ बना कर लाये थे और सभी को वितरित की गईं थीं। लोग प्रेम भाव से भक्तिविभोर होकर गा रहे थेः
शेराँ वाली माँ
पहाड़ा वाली माँ
जूता वाली माँ...
मैंने अपनी प्रतिलिपि में बड़े गौर से देखा। वस्तुतः "जूता वाली माँ" लिखा हुआ था। भजनों की समाप्ति के बाद मैने भक्तसमूह से कहा कि मैंने पहली बार किसी हिन्दू देवी देवता के जूते पहनने के बारे में सुना है। थोड़ी चर्चा के बाद पता चला कि जिन सज्जन ने यह भजन नकल किया था, वे पंजाबी न होकर मेरी तरह उत्तरप्रदेश के वासी थे और उन्होंने "जोताँ" को स्पष्टतः गलत समझ कर उसे सुधार कर "जूता" कर दिया था। इस तरह जोताँ यानी ज्योति वाली माँ जूता वाली माँ बन गईं। दुर्गा जी को जूते मिले तो लेकिन बस बड़े अल्प काल के लिये।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...१ अक्टूबर २००६
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