Thursday, September 28, 2006

कन्हैया ने पहिनी जीन्स

(पिछले हफ्ते सुनने में आया कि वृन्दावन के एक मन्दिर में पुजारी ने कृष्ण भगवान की मूर्ति को जीन्स और टीशर्ट पहना दिया और हाथ में मुरली की जगह मोबाइल फोन लगा दिया। बड़े हंगामे हुए और पुजारी बर्ख़ास्त किया जाने वाला था। मैंने सोचना शुरू किया यदि कृष्ण भगवान कलियुग में पैदा हुए होते तो क्या होता। यह कविता इस चिंतन का फल है।)

कन्हैया ने पहिनी जीन्स बड़ा रसु आयो रे।
टी बनियाइन पहिन प्रभू जी रास रचायो रे।।
गोपिन ने पहिनी जीन्स बड़ा रसु आयो रे।
हाल्टर टाप पहिन गोपिन ने रास रचायो रे।।
कन्हैया ने...
या कलजुग माँ मोहन का माखन ना भायो रे।
पीज़ा हट में पीज़ा खावैं गोपिन का खिलायो रे।।
गोरस पीवन माँ रस नाहीं कोक पिलायो रे।
पान प्रभू अब खावत नाहीं चुविंग गम चबायो रे।।
कन्हैया ने...
नन्दगाँव से बरसाने का मोबाइल मिलायो रे।
मोबाइल के ऊपर प्रभू जी मुरली बजायो रे।।
मुरली सुनि कै राधा रीझीं प्रभु को बुलायो रे।
तुरत चल्यो प्रभु नन्दगाँव से बरसाने पहुँच्यो रे।।
मोटरसइकल माँ प्रभु अपनी राधा को बिठायो रे।
वा छवि का हम कैसे बरनैं कछु कहत न जायो रे।।
कन्हैया ने...

...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...२८ सितम्बर २००६

Monday, September 25, 2006

पालक

क्या है वह जो
न छेदने से छिदता है
न काटने से कटता है
न जल से गीला होता है?
गीता पाठक कहेंगे वह आत्मा है,
मैं कहता हूँ वह ई-कोलाई है।
पालक की इसने ऐसी तैसी कराई है।
धोने से नहीं धुलता है,
उबालने से नहीं उबलता है,
अजर अमर यह बैक्टीरिया
हमें बीमार करता है।
पालक प्रेमियों पर आफ़त आई है।
बड़ी मुश्किल में पापाई है।
खा नहीं सकते सलाद में पालक,
विश्व के पालक क्या मुसीबत आई है।
न उबाल के खा सकते हैं,
न साग बना सकते हैं,
पालक पनीर के बिना क्या ज़िन्दगी भाई है।
पूछता हूँ हे प्रभु, जग के पालक,
पालक से ऐसी क्या आपकी लड़ाई है?

...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...२५ सितम्बर २००६

Friday, September 15, 2006

छाते का आविष्कार

आज तीन दिन से बारिस हो रही है। छाता लगा कर सबेरे ८ बजे की क्लास पढ़ाने जा रहा था तो सोचने लगा कि क्या आजकल के नवजवान हिन्दीब्लागरों को यह पता है कि छाते का आविष्कार किसने किया था। मैंने अनुमान लगाया कि शायद नहीं। मैं समाजसेवा का ऐसा सुनहरा मौका हाथ से नहीं निकलने देना चाहता था इसलिये यह प्रविष्टि पेश कर रहा हूँ। यह तो अन्दाज़ा लगा ही लिया होगा कि विश्व की अधिकांश बेहतरीन चीज़ों की तरह यह आविष्कार भारत में ही हुआ होगा। हाँ जी, हमारे पुराणों के अनुसार यह बिलकुल सत्य है।

प्राचीन काल में जमदग्नि ऋषि धनुर्विद्या का अभ्यास कर रहे थे। हाँ जी वही जमदग्नि ऋषि जो परशुराम जी के पिता थे। भरे जेठ की दोपहरी थी। जमदग्नि बाण चलाते थे और उनकी पत्नी रेणुका कड़ी धूप में नंगे पाँव (जूतों और चप्पलों का भी आविष्कार अभी नहीं हुआ था) दूर से बाणों को उठा के लाती थीं। पत्नी के धूप से जलते हुए शरीर और पाँवों को देख कर जमदग्नि को बहुत क्रोध हुआ और उन्होंने सूर्य देवता को शाप देने की ठानी। सूर्य देव अन्तर्यामी होने के नाते उनके मन का भाव जान गए और ब्राह्मण के वेष में छाता और जूते लेकर प्रकट हुए। तो पाठको इस प्रकार विश्व को छाते और जूतों का उपहार सूर्य देव ने दिया और अपनी जान बचाई।

अब यह दूसरी बात है कि यही जमदग्नि ऋषि एक बार अपनी पत्नी पर इतने नाराज़ हुए कि उन्होंने अपने पुत्र को माँ को मार डालने का आदेश दिया और परशुराम ने बेहिचक पिता की आज्ञा मान कर अपने परशु (कुल्हाड़ी) से माँ की गर्दन काट दी।

...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...१५ सितम्बर २००६

Sunday, September 10, 2006

एक पुरातन प्रश्न

मरते हैं क्यों हम
और क्यों जीते हैं
जीवन-मरण का यह प्रश्न
चला आ रहा है युगों युगों से।
कृष्ण ने कहा था अर्जुन से
मध्य में रणभूमि के
अजर, अमर, यह अविनाशी आत्मा
जन्मता है, न मरता है, पार्थ
अर्थहीन है अतयेव
जन्म-मरण का यह प्रश्न, कौन्तेय।
किन्तु मरा नहीं यह पुरातन प्रश्न
केशव की इस तर्कसंगत युक्ति से।
बुद्ध ने कहा अस्तित्व आत्मा का
भ्रम है सबसे बड़ा यह मानव का
कैसे वह मरेगा और जियेगा
शंका में हो अस्तित्व ही जिसका?
ईसा ने कहा मेरी शरण में आओ
निर्भय होकर शास्वत सुख पाओ।
भयग्रस्त है मानव तो भी मृत्यु से
जीवन है उसका पूर्वतत् निरर्थक।
मानव है बिल्कुल यंत्रवत
डेकार्त और मार्क्स का है यह मत
टूट जाता है पुराना यंत्र जैसे
मर जाता है मानव भी वैसे
आत्मा और परमात्मा के मत
धर्मधारियों ने रचे हैं मनगढ़न्त।
जीवन और मरण का अर्थ है क्या
सशक्त है यह प्रश्न पूर्व सा।
व्यर्थ हुए हैं अभी तक के सारे उत्तर
सार्त्र और कामू का मत भी निरर्थक।
निरर्थक हैं पुण्य, निरर्थक हैं पाप
निरर्थक हैं सारे पूजा पाठ।
निरर्थक है योग, निरर्थक है ध्यान
निरर्थक हैं दोनों शैतान और भगवान।
निरर्थक हैं सारे धर्म आचार
निरर्थक हैं सारे मानव व्यवहार
सार्थक है केवल यह प्रश्न ज्वलंत
मरते हैं क्यों और जीते क्यों हम?

...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...१० सितम्बर २००६

Monday, September 04, 2006

हाहा महराज

(पितृ पक्ष के अवसर पर)



कहानी यह बहुत साल पहले की है

बीत गया जो कब का उस बचपन की है

मेरे गाँव के पास ही एक गाँव था

जो मेरे चरित्रनायक का वास-स्थान था

'हाहा महराज' के नाम से विख्यात थे

आसपास के गाँवों में उनके कारनामे ज्ञात थे

लम्बे चौड़े, मोटे ताज़े और सुदृढ़काय थे

अँधेरे में भी चमकते थे काले भुजंग से

बदन पर घुटनों तक की लुंगी पहिनते थे

कुर्ता बनियाइन को हाथ भी न लगाते थे

घर अपने वे कभी कभी आते थे

सारा जीवन वे खेतों में बिताते थे

चैत के महीने में जब गन्ने पेले जाते थे

एक गगरा रस वे एक साँस में पी जाते थे

पितृ पक्ष में निमंत्रण श्राद्ध का जब पाते थे

हाहा हर्ष से फूले नहीं समाते थे

एक शर्त थी उनकी निमंत्रणों के बारे में

एक दिन पहले मिलना चाहिए हर हालत में

एक दिन महराज दोपहर में ऊँघ रहे थे

कोई निमंत्रण क्यों नहीं आया यह सोच रहे थे

इतने में एक व्यक्ति दौड़ा दौड़ा आया

हाहा महराज के चरणों में सिर झुकाया

"खुश रहो, बच्चा" हाहा महराज बोले

"किस काम से इधर आये हो, भोले"

"महराज, आज रात मेरे यहाँ श्राद्ध का आयोजन है

आपकी सेवा में भोजन का निमंत्रण है"

हाहा महराज बोले, "हे मूर्ख

कल क्यों नहीं तूने बताया यह धूर्त

खैर अभी भी मैं कोशिश करूँगा

तेरे भोजन के साथ न्याय करना चाहूँगा"

इतना कहके महराज ने लोटा उठाया

जंगल की तरफ जाने को पग बढ़ाया



...लक्ष्मीनारायण गुप्त

...3 सितम्बर २००६

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