गोविन्द हिन्दी के मध्य युग के एक भक्त कवि हैं। इन की जीवनी के बारे में मुझे कुछ पता नहीं है। इनके दो छन्द शेखर सेन के टेप 'अमृतवाणी' से लिपित किए हैं। बहुत ही सुन्दर अलंकारिक भाषा हैः
१। काले ही मोहन, काले ही सोहन
काली कलिन्दी के तट आयो।
काली कलिन्दी में काली सी नागिन
काले से नाग को जाइ जगायो।
काले को नाथ लियो छिन में
अरु काले के सीस पे नृत्य करायो।
गोविन्द यों प्रभु सोभा बखानत
काले को नाथि कै नाथ कहायो।
अर्थः काले, मन को सुहाने वाले मोहन काली कालिन्दी (यमुना) के तट पर आए। काली कालिन्दी में एक काली नागिन अपने पति कालिया नाग को जाके जगाया। मोहन ने कालिया एक क्षण में नाथ कर उसके सिर पर नृत्य किया। कवि गोविन्द उन प्रभु की शोभा का वर्णन करते हुए कहते हैं कि प्रभु कालिया को नाथ कर नाथ कहलाए।
२। लाल ही लाल के लाल ही लोचन
लालन के मुख लाल ही बीरा।
लाल बँधी कटि में कछनी
अरु लाल के सीस पे लाल ही चीरा।
लाल ही बाग बने अति सुन्दर
लाल खड़े जमुना जी के तीरा।
गोविन्द यों प्रभु सोभा बखानत
लाल के कण्ठ बिराजत हीरा।
अर्थः लाल बालकृष्ण की आँखें लाल हैं और उनके मुख में लाल पान का बीड़ा है। उनकी कमर में लाल कछनी बँधी है और सिर पर लाल वस्त्र बँधा है। वे यमुना के तट पर अति सुन्दर लाल बगीचे में खड़े हैं। कवि गोविन्द उन प्रभु की शोभा का वर्णन करते हुए कहते हैं कि उन लाल के गले में हीरों की माला बिराजित है।
निम्नलिखित दोहा भी, जहाँ तक मुझे ध्यान है, कवि गोविन्द का ही हैः
अमिय, हलाहल, मद भरे स्वेत, स्याम, रतनार।
जियत, मरत, झुकि झुकि परत, जेहिं चितवहिं इक बार।।
अर्थः उनके नयन श्वेत, श्याम और लाल हैं और अमृत, विष और मदिरा से भरे हैं। वे जिसको भी एक बार देख लेते हैं, वह जीता (अमृत के कारण), मरता (विष के कारण) और झुक झुक के गिरता (मदिरा के कारण) है।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...३० अगस्त २००६
At present, this blog is set up to publish my Hindi poems and accept comments from the readers. Some contributions from others are also published from time to time. Laxmi N. Gupta
Wednesday, August 30, 2006
Friday, August 25, 2006
गिरिधर नागर की अस्मिता
भक्त हैं यदि तो भगवान भी होंगे ही,
मीरा से प्रमाणित है गिरिधर नागर की अस्मिता।
रसना है तो रस भी कहीं होगा ही,
रसिकों से ही है रसिकशिरोमणि की मान्यता।
श्रद्धा की लहर यदि उठ रही है हृदय में,
श्रद्धा का सागर नहीं दूर हो सकता।
सुनते हो यदि राधा के नूपुर,
मोहन का वेणु कहीं पास में ही बजता।
भक्त हैं यदि....
जीवन है तो जीवन का स्रोत भी होगा ही,
धारा से ही है नदी की मान्यता।
मोहित हैं यदि तो मोहन भी होगा ही,
भ्रमरों को ज्ञात है पुष्प की पुष्पता।
गायन है तो गायक भी होगा ही,
कविता से ही है कवि की अस्मिता।
झनक झनक बजते पायलों के सुर,
नृत्य से प्रमाणित है नर्तकी की अस्मिता।
भक्त हैं यदि...
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...२४ अगस्त २००६
मीरा से प्रमाणित है गिरिधर नागर की अस्मिता।
रसना है तो रस भी कहीं होगा ही,
रसिकों से ही है रसिकशिरोमणि की मान्यता।
श्रद्धा की लहर यदि उठ रही है हृदय में,
श्रद्धा का सागर नहीं दूर हो सकता।
सुनते हो यदि राधा के नूपुर,
मोहन का वेणु कहीं पास में ही बजता।
भक्त हैं यदि....
जीवन है तो जीवन का स्रोत भी होगा ही,
धारा से ही है नदी की मान्यता।
मोहित हैं यदि तो मोहन भी होगा ही,
भ्रमरों को ज्ञात है पुष्प की पुष्पता।
गायन है तो गायक भी होगा ही,
कविता से ही है कवि की अस्मिता।
झनक झनक बजते पायलों के सुर,
नृत्य से प्रमाणित है नर्तकी की अस्मिता।
भक्त हैं यदि...
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...२४ अगस्त २००६
Wednesday, August 23, 2006
इक अँधेरी राह
इक अँधेरी राह पर
मैं चल रहा हूँ।
एक दीपक लघु
कहीं पर जल रहा है,
ज्योति जिसकी मुझ
तलक पहुँची नहीं है।
प्रेरणा की किरण मेरे
हृदय में जागी नहीं है।
कौन से बाजे बजाऊँ?
किन सुरों में आज गाऊँ?
कौन से दीपक जलाऊँ?
मैं किसे माला चढ़ाऊँ?
मैं यही सब प्रश्न
लेकर जी रहा हूँ।
कौन पथ पर आ रहा है,
मैं कहाँ पलकें बिछाऊँ?
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...२३ अगस्त २००६
मैं चल रहा हूँ।
एक दीपक लघु
कहीं पर जल रहा है,
ज्योति जिसकी मुझ
तलक पहुँची नहीं है।
प्रेरणा की किरण मेरे
हृदय में जागी नहीं है।
कौन से बाजे बजाऊँ?
किन सुरों में आज गाऊँ?
कौन से दीपक जलाऊँ?
मैं किसे माला चढ़ाऊँ?
मैं यही सब प्रश्न
लेकर जी रहा हूँ।
कौन पथ पर आ रहा है,
मैं कहाँ पलकें बिछाऊँ?
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...२३ अगस्त २००६
Sunday, August 20, 2006
एक नज़्म
क्या क्या हसीन ख़्वाब तुमने दिखाए थे
ख़्वाहिशों के सब्ज़ बाग हमने लगाए थे
अपनी बदकिस्मती थी या तुम्हारी बेमुरव्वत
जो हमने की थी तुम छलिये से मुहब्बत
दिल की नादानी ने जुल्म किए बेहिसाब
देखते देखते ही उजड़ गए सब्ज़ बाग
ख़त्म हुई ख़्वाहिशें और ख़त्म हुए ख़्वाब
अब तो हुई है ज़िन्दगी बेलुबाब
हम भी कभी दरियादिल हुआ करते थे
जब फकीरों की तरह बसर नहीं करते थे
सूखा दरिया-ए-दिल, सूख गया प्यार
घूमता हूँ मैं अब दिले-बेज़ार
उजड़े चमन का अब मैं आदी हूँ यार
नहीं करूँगा बहारों का इन्तज़ार
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...२० अगस्त २००६
ख़्वाहिशों के सब्ज़ बाग हमने लगाए थे
अपनी बदकिस्मती थी या तुम्हारी बेमुरव्वत
जो हमने की थी तुम छलिये से मुहब्बत
दिल की नादानी ने जुल्म किए बेहिसाब
देखते देखते ही उजड़ गए सब्ज़ बाग
ख़त्म हुई ख़्वाहिशें और ख़त्म हुए ख़्वाब
अब तो हुई है ज़िन्दगी बेलुबाब
हम भी कभी दरियादिल हुआ करते थे
जब फकीरों की तरह बसर नहीं करते थे
सूखा दरिया-ए-दिल, सूख गया प्यार
घूमता हूँ मैं अब दिले-बेज़ार
उजड़े चमन का अब मैं आदी हूँ यार
नहीं करूँगा बहारों का इन्तज़ार
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...२० अगस्त २००६
Monday, August 14, 2006
कुछ इधर की, कुछ उधर की-२
यह कुछ छुटपुट स्मृतियों का संग्रह हैः
१। एक लोकगीत का हिस्सा याद आ रहा है जिसका कोई खास मतलब नहीं समझ आताः
"साग लायीं, पात लाईं और लाईं कनकौआ
सास पतोहू जेंवन बैठीं, नाक ले गया कौआ
चुपाय जाओ दुलहिन, मारा जैहै कौआ।"
(कनकौआ को पथरचटा भी कहते हैं। यह चौलाई की तरह एक घास है जिसकी भूजी बनाते हैं।)
२। मेरे घर से गंगा जी ६ मील दूर थीं। कार्तिकी पूर्णिमा (कतकी) को गंगा तट पर नजफ़गढ़ नामके गाँव में मेला लगता था जहाँ हम लोग बैलगाड़ी से जाते थे। रास्ते में एक भिखारी बैठता था जो प्रायः यह गीत गाता थाः
"दिन दिन जियरा जारै, पुतहेवा दिन दिन जियरा जारै
जब आई हरवाहे कै ब्यारा, चूल्हे लकड़िया डारै
दिन दिन...."
(पुत्र-वधू दिन दिन जी जलाती है। जब शाम को जानवरों के लौटने का समय होता है तब वह चूल्हे में लकड़ी डालती है।)
३। जब मेरी माँ और भाभी में मनमुटाव होता था, मेरी माँ चक्की पीसते हुए यह गीत गाती थीं (अब दोनों की ही मृत्यु हो चुकी है।):
"इक दिन बहू सास से बोली, चकिया पीस डोकरिया ना
बैठे बैठे खान न देहौं, डरिहौं फोरि खोपड़िया ना।"
४। होलिका-दहन के दूसरे दिन धुलहठी को फाग-मंडलियाँ निकलती थीं। कुछ फागों की एक आध पंक्तियाँ याद हैं:
i) "बम भोला करैं अस्नान, गौरा पार्वती पानियाँ भरैं
पानियाँ भरैं, पानियाँ न हो
बम भोला रे बम भोला..."
ii) "मन बसेउ म्वार वृन्दावन माँ
वृन्दावन बेली, चम्प चमेली, गुलाबास, गुलखैरा फूल हजारन माँ
मन बसेउ...।"
iii) "महदेव कहैं सुनु पार्वती भँगिया मति देहु गँवारन का।"
५। यह किसी आदिवासी लोकगीत का एक अंश है (हो सकता है छत्तिसगढ़ से हो):
"लोखरी के बिल से निकरीं भवानी, लप लप लपसी खाओ मेरी माँ
कोदरा के बबरा बनाओ मेरी माँ।"
(लोखरी = लोमड़ी, लपसी = एक तरीके का पतला हलुवा, कोदरा = कोदई या कोदों, एक तरीके का मोटा अनाज, बबरा = पुआ)
६। किसी गाँव में लाल बुझक्कड़ नाम के एक सज्जन थे जो सभी कुछ "जानते" थे। एक बार उस गाँव में एक हाथी आया। वहाँ किसी ने हाथी कभी नहीं देखा था तो लाल बुझक्कड़ को बुलाया गया। लाल बुझक्कड़ ने सोते हुए हाथी को देख कर यह कहाः
"जानैं लाल बुझक्कड़ जानैं और न जानै कोय
राति भरे की थकी अँधेरिया रही इकट्ठा सोय।"
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...१४ अगस्त २००६
१। एक लोकगीत का हिस्सा याद आ रहा है जिसका कोई खास मतलब नहीं समझ आताः
"साग लायीं, पात लाईं और लाईं कनकौआ
सास पतोहू जेंवन बैठीं, नाक ले गया कौआ
चुपाय जाओ दुलहिन, मारा जैहै कौआ।"
(कनकौआ को पथरचटा भी कहते हैं। यह चौलाई की तरह एक घास है जिसकी भूजी बनाते हैं।)
२। मेरे घर से गंगा जी ६ मील दूर थीं। कार्तिकी पूर्णिमा (कतकी) को गंगा तट पर नजफ़गढ़ नामके गाँव में मेला लगता था जहाँ हम लोग बैलगाड़ी से जाते थे। रास्ते में एक भिखारी बैठता था जो प्रायः यह गीत गाता थाः
"दिन दिन जियरा जारै, पुतहेवा दिन दिन जियरा जारै
जब आई हरवाहे कै ब्यारा, चूल्हे लकड़िया डारै
दिन दिन...."
(पुत्र-वधू दिन दिन जी जलाती है। जब शाम को जानवरों के लौटने का समय होता है तब वह चूल्हे में लकड़ी डालती है।)
३। जब मेरी माँ और भाभी में मनमुटाव होता था, मेरी माँ चक्की पीसते हुए यह गीत गाती थीं (अब दोनों की ही मृत्यु हो चुकी है।):
"इक दिन बहू सास से बोली, चकिया पीस डोकरिया ना
बैठे बैठे खान न देहौं, डरिहौं फोरि खोपड़िया ना।"
४। होलिका-दहन के दूसरे दिन धुलहठी को फाग-मंडलियाँ निकलती थीं। कुछ फागों की एक आध पंक्तियाँ याद हैं:
i) "बम भोला करैं अस्नान, गौरा पार्वती पानियाँ भरैं
पानियाँ भरैं, पानियाँ न हो
बम भोला रे बम भोला..."
ii) "मन बसेउ म्वार वृन्दावन माँ
वृन्दावन बेली, चम्प चमेली, गुलाबास, गुलखैरा फूल हजारन माँ
मन बसेउ...।"
iii) "महदेव कहैं सुनु पार्वती भँगिया मति देहु गँवारन का।"
५। यह किसी आदिवासी लोकगीत का एक अंश है (हो सकता है छत्तिसगढ़ से हो):
"लोखरी के बिल से निकरीं भवानी, लप लप लपसी खाओ मेरी माँ
कोदरा के बबरा बनाओ मेरी माँ।"
(लोखरी = लोमड़ी, लपसी = एक तरीके का पतला हलुवा, कोदरा = कोदई या कोदों, एक तरीके का मोटा अनाज, बबरा = पुआ)
६। किसी गाँव में लाल बुझक्कड़ नाम के एक सज्जन थे जो सभी कुछ "जानते" थे। एक बार उस गाँव में एक हाथी आया। वहाँ किसी ने हाथी कभी नहीं देखा था तो लाल बुझक्कड़ को बुलाया गया। लाल बुझक्कड़ ने सोते हुए हाथी को देख कर यह कहाः
"जानैं लाल बुझक्कड़ जानैं और न जानै कोय
राति भरे की थकी अँधेरिया रही इकट्ठा सोय।"
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...१४ अगस्त २००६
Wednesday, August 09, 2006
कुछ अटकलपच्चियाँ
बचपन में कुछ बातें सुनीं थीं जिनका मतलब आज तक नहीं लगा पायाः
१। जब कोई छोटा बच्चा इतना उपद्रव करता था जो कि उसके डील डौल के समानुपात में नहीं होता था तो मेरी माँ कहती थीं कि, "घोड़ न कूदै, बाखर कूदै।" कभी हिम्मत नहीं जुटा पाया कि पूछता कि यह बाखर क्या बला है।
२। महिलाओं और लड़कियों को जो माँ को नाराज करती थीं, यह गाली सुनने को मिलती थीः "गदहों की सास।" अब बिचारे दामाद ने क्या बिगाड़ा था कि उसे गधे की उपाधि मिली।
३। यह doggerel बचपन में सुनी थीः
"जगन्नाथ जगधरिया,
काँधे धरे मुसरिया
वहै मुसरिया औसी खौसी
जगन्नाथ कै लागै मौसी।"
अब यह केवल ऊल जलूल की कहावत है कि बहुत गहरा वेदान्तिक सत्य है। मुसरिया (चुहिया) के अन्दर जो ब्रह्म है, उसमें और जगन्नाथ में कोई अन्तर नहीं है।
४। और एक अन्ड बन्ड कविता सुनी थीः
"लाल गुलाल बड़े भकुआ
गे ससुरारि मँगैं लेंड़ुआ
सासु कहैं बैठौ बबुआ
ससुर कहै छ्यादौ नकुआ।"
(भकुआ = मूर्ख, लेंड़ुआ = लड्डू, छ्यादौ = छेद दो, नकुआ = नाक)
आप सोचें तो यह बड़ी रहस्यवादी कविता है। ससुर लाल गुलाल की नाक क्यों छेदना चाहता है? लाल गुलाल के लड्डू माँगने और उसकी नाक छिदने में क्या सम्बन्ध है?
५। हमारे घर के पीछे धोबियों का घर था। धोबी की दो पत्नियाँ थीं। एक मोटी थी, एक पतली। मोटी वाली मोटकी कहलाती थी और पतली वाली पतरिया। कभी कभी धोबियों के यहाँ जमघट होता था। दावत के बाद शराब का दौर चलता था, फिर गाना बजाना। यह बड़े रहस्य की बात है कि वाद्य यंत्र ढोलक, मँजीरा, हारमोनियम, तबला इत्यादि नहीं होते थे बल्कि गगरी और सूप। इस तरह की वीर गाथाएं गाई जाती थीं:
"एक बार भगवन्त नगर माँ
तोप चली मल्लावें माँ
घाटमपुर के अवध विहारी
शिवरतन जूझि के बक्सर के
बाजैं दे गगरी सूप रे
बाजैं दे गगरी सूप रे।"
६। एक झगड़ालू लड़की की दास्तान है इस गीत में:
"बाप कहै मेरी लाड़ो आई
सिर के बाल कहाँ धरि आई
ऐ बाबुल मैंने दोहुँ कुल तारे
सास ससुर मैंने लठियन मारे
बड़े जेठ की पगड़ी उतारी
छोटे देवर की तनियाँ फारी
दाढ़ीजार कमाई ला
तब तू घर में दिया जला।"
ये वीरांगना कहाँ की थी? मेरी जान पहचान की किसी लड़की में तो इसका आधा भी दम नहीं था। और उसके बालों का क्या हुआ, इसका तो उसने जवाब ही नहीं दिया। यह तो आप समझ ही गए होंगे कि दाढ़ीजार से मतलब उसके पति से है।
७। यह आखिरी कविता या इसका कोई संस्करण आपने सुना होगाः
"लम्बी टोपी चिदक चिदू
उससे निकलू पक्के हिन्दू
पक्के हिन्दू ने खाया अन्डा
उससे निकला गाँधी बुड्ढा
गाँधी बुड्ढे ने खाया कचालू
उससे निकले जवाहरलालू
जवाहरलालू ने खाया गोश्त
उससे निकले सुभाषचन्द्र बोस....।"
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...९ अगस्त २००६
१। जब कोई छोटा बच्चा इतना उपद्रव करता था जो कि उसके डील डौल के समानुपात में नहीं होता था तो मेरी माँ कहती थीं कि, "घोड़ न कूदै, बाखर कूदै।" कभी हिम्मत नहीं जुटा पाया कि पूछता कि यह बाखर क्या बला है।
२। महिलाओं और लड़कियों को जो माँ को नाराज करती थीं, यह गाली सुनने को मिलती थीः "गदहों की सास।" अब बिचारे दामाद ने क्या बिगाड़ा था कि उसे गधे की उपाधि मिली।
३। यह doggerel बचपन में सुनी थीः
"जगन्नाथ जगधरिया,
काँधे धरे मुसरिया
वहै मुसरिया औसी खौसी
जगन्नाथ कै लागै मौसी।"
अब यह केवल ऊल जलूल की कहावत है कि बहुत गहरा वेदान्तिक सत्य है। मुसरिया (चुहिया) के अन्दर जो ब्रह्म है, उसमें और जगन्नाथ में कोई अन्तर नहीं है।
४। और एक अन्ड बन्ड कविता सुनी थीः
"लाल गुलाल बड़े भकुआ
गे ससुरारि मँगैं लेंड़ुआ
सासु कहैं बैठौ बबुआ
ससुर कहै छ्यादौ नकुआ।"
(भकुआ = मूर्ख, लेंड़ुआ = लड्डू, छ्यादौ = छेद दो, नकुआ = नाक)
आप सोचें तो यह बड़ी रहस्यवादी कविता है। ससुर लाल गुलाल की नाक क्यों छेदना चाहता है? लाल गुलाल के लड्डू माँगने और उसकी नाक छिदने में क्या सम्बन्ध है?
५। हमारे घर के पीछे धोबियों का घर था। धोबी की दो पत्नियाँ थीं। एक मोटी थी, एक पतली। मोटी वाली मोटकी कहलाती थी और पतली वाली पतरिया। कभी कभी धोबियों के यहाँ जमघट होता था। दावत के बाद शराब का दौर चलता था, फिर गाना बजाना। यह बड़े रहस्य की बात है कि वाद्य यंत्र ढोलक, मँजीरा, हारमोनियम, तबला इत्यादि नहीं होते थे बल्कि गगरी और सूप। इस तरह की वीर गाथाएं गाई जाती थीं:
"एक बार भगवन्त नगर माँ
तोप चली मल्लावें माँ
घाटमपुर के अवध विहारी
शिवरतन जूझि के बक्सर के
बाजैं दे गगरी सूप रे
बाजैं दे गगरी सूप रे।"
६। एक झगड़ालू लड़की की दास्तान है इस गीत में:
"बाप कहै मेरी लाड़ो आई
सिर के बाल कहाँ धरि आई
ऐ बाबुल मैंने दोहुँ कुल तारे
सास ससुर मैंने लठियन मारे
बड़े जेठ की पगड़ी उतारी
छोटे देवर की तनियाँ फारी
दाढ़ीजार कमाई ला
तब तू घर में दिया जला।"
ये वीरांगना कहाँ की थी? मेरी जान पहचान की किसी लड़की में तो इसका आधा भी दम नहीं था। और उसके बालों का क्या हुआ, इसका तो उसने जवाब ही नहीं दिया। यह तो आप समझ ही गए होंगे कि दाढ़ीजार से मतलब उसके पति से है।
७। यह आखिरी कविता या इसका कोई संस्करण आपने सुना होगाः
"लम्बी टोपी चिदक चिदू
उससे निकलू पक्के हिन्दू
पक्के हिन्दू ने खाया अन्डा
उससे निकला गाँधी बुड्ढा
गाँधी बुड्ढे ने खाया कचालू
उससे निकले जवाहरलालू
जवाहरलालू ने खाया गोश्त
उससे निकले सुभाषचन्द्र बोस....।"
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...९ अगस्त २००६
Monday, August 07, 2006
पत्नी पुराण
पत्नी के बिन नहीं है इस जग में उद्धार।
पत्नी की पूजा करो सब कुछ तज के यार।।
सब कुछ तज कर यार तुम सुनो खोल कर कान।
तिरछी चितवन से तुम्हें कर देगी धनवान।।
पत्नी पूजा के सरिस धर्म न दूजा कोय।
जो नर ऐसा न करें उनसा दुखी न कोय।।
उनसा दुखी न कोय गई मति उनकी मारी।
अन्तःपुर जाने की उनकी कभी न आती बारी।।
ऐसे नर को कभी भी पत्नी करे न प्यार।
प्यार बिना इस जगत में न होवे उद्धार।।
न होवे उद्धार कभी जब घर को आवे।
कोपभवन के अन्दर वह पत्नी को पावे।।
कोपभवन पत्नी गई तुम तो मर गए यार।
नहीं कोई इस जगत में तुम्हें बचा ले यार।।
तुम्हें बचा ले यार बात अब मेरी मानो।
शरण उसी की जाओ यही अब मन में ठानो।।
रामबाण था ज्यों जयंत के पीछे दौड़ा।
पत्नी का यह क्रोध करेगा तुमसे लफड़ा।।
इस लफड़े से बचन का साधन केवल एक।
शरणागत हो प्रिया के सबसे बड़ा विवेक।।
जुर्माना इक आँख का जैसे लीन्हों राम।
दण्ड दिये तुमको बिना करे न वह विश्राम।।
भाग्य तुम्हारे ने सखे अगर दे दिया साथ।
हो सकता पत्नी करे दण्ड तुम्हारा माफ।।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...७ अगस्त २००६
पत्नी की पूजा करो सब कुछ तज के यार।।
सब कुछ तज कर यार तुम सुनो खोल कर कान।
तिरछी चितवन से तुम्हें कर देगी धनवान।।
पत्नी पूजा के सरिस धर्म न दूजा कोय।
जो नर ऐसा न करें उनसा दुखी न कोय।।
उनसा दुखी न कोय गई मति उनकी मारी।
अन्तःपुर जाने की उनकी कभी न आती बारी।।
ऐसे नर को कभी भी पत्नी करे न प्यार।
प्यार बिना इस जगत में न होवे उद्धार।।
न होवे उद्धार कभी जब घर को आवे।
कोपभवन के अन्दर वह पत्नी को पावे।।
कोपभवन पत्नी गई तुम तो मर गए यार।
नहीं कोई इस जगत में तुम्हें बचा ले यार।।
तुम्हें बचा ले यार बात अब मेरी मानो।
शरण उसी की जाओ यही अब मन में ठानो।।
रामबाण था ज्यों जयंत के पीछे दौड़ा।
पत्नी का यह क्रोध करेगा तुमसे लफड़ा।।
इस लफड़े से बचन का साधन केवल एक।
शरणागत हो प्रिया के सबसे बड़ा विवेक।।
जुर्माना इक आँख का जैसे लीन्हों राम।
दण्ड दिये तुमको बिना करे न वह विश्राम।।
भाग्य तुम्हारे ने सखे अगर दे दिया साथ।
हो सकता पत्नी करे दण्ड तुम्हारा माफ।।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...७ अगस्त २००६
Friday, August 04, 2006
यशुदा के वीर
साँझइ सों तव नँव लइ गोहरावति दुख भौन,
नैन स्रवैं नैनानि सों कर धीरजुहू गौन,
कर धीरजुहू गौन दहै बिरहा की ज्वाला,
राधा सों सुकुमारि सहै बिन कृष्ण कसाला,
कह कुमुदेश सुजान प्रीति की रीति अनोखी,
बीति गई सब रैन भोर कै बैहरि तीखी।
मनु जारनि, तनु गारनि बहै बसंत बयारि,
तरु कदम्ब छैयाँ तरे लोचन वारत वारि,
लोचन वारत वारि, कुंज बन नेकु न भावैं,
कालिन्दी कै धार सोहावनि धरि धरि खावै,
दीन्हें जहँ कल रास श्याम गर बैहाँ डारे,
कह कुमुदेश सुजान सोई थल देहियाँ जारैं।
बूड़न चाहत उर पुर, आकुल नैनन नीर।
बेगि उबारौ राधिकहिं ओ यशुदा के वीर॥
…सत्यनारायण गुप्त ‘कुमुद’
…2 अगस्त 1961
(यह कविता मेरे बड़े भाई सत्यनारायण गुप्त ‘कुमुद’ ने 21 वर्ष की आयु में लिख़ी थी।)
नैन स्रवैं नैनानि सों कर धीरजुहू गौन,
कर धीरजुहू गौन दहै बिरहा की ज्वाला,
राधा सों सुकुमारि सहै बिन कृष्ण कसाला,
कह कुमुदेश सुजान प्रीति की रीति अनोखी,
बीति गई सब रैन भोर कै बैहरि तीखी।
मनु जारनि, तनु गारनि बहै बसंत बयारि,
तरु कदम्ब छैयाँ तरे लोचन वारत वारि,
लोचन वारत वारि, कुंज बन नेकु न भावैं,
कालिन्दी कै धार सोहावनि धरि धरि खावै,
दीन्हें जहँ कल रास श्याम गर बैहाँ डारे,
कह कुमुदेश सुजान सोई थल देहियाँ जारैं।
बूड़न चाहत उर पुर, आकुल नैनन नीर।
बेगि उबारौ राधिकहिं ओ यशुदा के वीर॥
…सत्यनारायण गुप्त ‘कुमुद’
…2 अगस्त 1961
(यह कविता मेरे बड़े भाई सत्यनारायण गुप्त ‘कुमुद’ ने 21 वर्ष की आयु में लिख़ी थी।)
Tuesday, August 01, 2006
डायमन्ड सेल
प्रश्नचिह्न सी खड़ी हुई तुम,
कैसे मैं इंकार करूँ?
मान भरे नयनों में मोती,
कैसे मैं स्वीकार करूँ?
तुम ही जीती प्रिये,
रही अब और न कोई बाधा है।
सेल पर हैं हीरे की अँगूठियों,
उनका दाम हुआ अब आधा है।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...३१ जुलाई २००६
कैसे मैं इंकार करूँ?
मान भरे नयनों में मोती,
कैसे मैं स्वीकार करूँ?
तुम ही जीती प्रिये,
रही अब और न कोई बाधा है।
सेल पर हैं हीरे की अँगूठियों,
उनका दाम हुआ अब आधा है।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...३१ जुलाई २००६
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