रीति काल के कवियों में बिहारी प्रायः सर्वोपरि माने जाते हैं। बिहारी सतसई उनकी प्रमुख रचना हैं। इसमें ७१३ दोहे हैं। किसी ने इन दोहों के बारे में कहा हैः
सतसइया के दोहरा ज्यों नावक के तीर।
देखन में छोटे लगैं घाव करैं गम्भीर।।
(नावक (फारसी) = एक तरह का धनुष जिससे छोटे पैने तीर चलाये जाते थे, दोहरा = दोहा)
बिहारी शाहजहाँ के समकालीन थे और राजा जयसिंह के राजकवि थे। राजा जयसिंह अपने विवाह के बाद अपनी नव-वधू के प्रेम में राज्य की तरफ बिलकुल ध्यान नहीं दे रहे थे तब बिहारी ने उन्हें यह दोहा सुनाया थाः
नहिं पराग नहिं मधुर मधु नहिं विकास यहि काल।
अली कली में ही बिन्ध्यो आगे कौन हवाल।।
(श्लेष अलंकारः अली = राजा, भौंरा; कली = रानी, पुष्प की कली)
कहते हैं कि बात राजा की समझ में आ गई और उन्होंने फिर से राज्य पर ध्यान देना शुरू कर दिया। जयसिंह शाहजहाँ के अधीन राजा थे। एक बार शाहजहाँ ने बलख पर हमला किया जो सफल नही रहा और शाही सेना को वहाँ से निकालना मुश्किल हो गया। कहते हैं कि जयसिंह ने अपनी चतुराई से सेना को वहाँ से कुशलपूर्वक निकाला। बिहारी ने लिखा हैः
घर घर तुरकिनि हिन्दुनी देतिं असीस सराहि।
पतिनु राति चादर चुरी तैं राखो जयसाहि।।
( चुरी = चूड़ी, राति = रक्षा करके, जयसाहि = राजा जयसिंह)
बिहारी और अन्य रीतिकालीन कवियों ने भक्ति की कवितायें लिखी हैं किन्तु वे भक्ति से कम काव्य की चातुरी से अधिक प्रेरित हैं। किसी रीतिकालीन कवि ने लिखा हैः आगे के सुकवि रीझिहैं चतुराई देखि, राधिका कन्हाई सुमिरन को तो इक बहानो है। बिहारी का एक दोहा हैः
मोर मुकुट कटि काछनी कर मुरली उर माल।
यहि बानिक मो मन बसौ सदा बिहारीलाल।।
(काछनी = धोती की काँछ, यहि बानिक = इसी तरह)
सतसई का प्रथम दोहा हैः
मेरी भववाधा हरौ, राधा नागरि सोय।
जा तन की झाँई परे स्याम हरित दुति होय।।
(झाँई = छाया, स्याम = श्याम, दुति = द्युति = प्रकाश)
राधा जी के पीले शरीर की छाया नीले कृष्ण पर पड़ने से वे हरे लगने लगते है। दूसरा अर्थ है कि राधा की छाया पड़ने से कृष्ण हरित (प्रसन्न) हो उठते हैं। श्लेष अलंकार का सुन्दर उदाहरण है।
बिहारी का एक बड़ा प्रसिद्ध दोहा है:
चिरजीवौ जोरी जुरै, क्यों न स्नेह गम्भीर।
को घटि ये वृषभानुजा, वे हलधर के बीर॥
अर्थात: यह जोड़ी चिरजीवी हो। इनमें क्यों न गहरा प्रेम हो, एक वृषभानु की पुत्री हैं, दूसरे बलराम के भाई हैं। दूसरा अर्थ है: एक वृषभ (बैल) की अनुजा (बहन) हैं और दूसरे हलधर (बैल) के भाई हैं। यहाँ श्लेष अलंकार है।
बिहारी शहर के कवि हैं। ग्रामीणों की अरसिकता की हँसी उड़ाते हैं। जब गंधी (इत्र बेचने वाला) गाँव में इत्र बेचने जाता है तो सुनिये क्या होता हैः
करि फुलेल को आचमन मीठो कहत सराहि।
रे गंधी मतिमंद तू इतर दिखावत काँहि।।
(फुलेल = इत्र, सराहि = सराहना करके, इतर = इत्र, काँहि = किसको)
कर लै सूँघि, सराहि कै सबै रहे धरि मौन।
गंधी गंध गुलाब को गँवई गाहक कौन।।
(गँवई = छोटा गाँव, गाहक = ग्राहक)
इसी तरह जब गाँव में गुलाब खिलता है तो क्या होता हैः
वे न इहाँ नागर भले जिन आदर तौं आब।
फूल्यो अनफूल्यो भलो गँवई गाँव गुलाब।।
(नागर = नागरिक, आब = इज्जत)
नायिका के वर्णन में बिहारी कभी कभी अतिशयोक्ति का उपयोग करते हैं:
काजर दै नहिं ऐ री सुहागिन, आँगुरि तो री कटैगी गँड़ासा
यानी कि: ये सुहागन काजल न लगा, कहीं तेरी उँगली तेरी गँड़ासे जैसी आँख की कोर से कट न जाये। गँड़ासे से जानवरों का चारा काटा जाता है।
और सुनियेः
सुनी पथिक मुँह माह निसि लुवैं चलैं वहि ग्राम।
बिनु पूँछे, बिनु ही कहे, जरति बिचारी बाम।।
यानी कि विरहिणी नायिका की श्वास से माघ के महीने में भी उस गाँव में लू चलती है। विरहिणी क्या हुई, लोहार की धौंकनी हो गई!
विरहिणी अपनी सखी से कहती हैः
मैं ही बौरी विरह बस, कै बौरो सब गाँव।
कहा जानि ये कहत हैं, ससिहिं सीतकर नाँव।।
यानी कि मैं ही पागल हूँ या सारा गाँव पागल है। ये कैसे कहते हैं कि चन्द्रमा का नाम शीतकर (शीतल करने वाला) है? तुलना करिये तुलसीदास जी की चौपाई से। अशोकवन में सीता जी कहती हैं: पावकमय ससि स्रवत न आगी। मानुँहि मोहि जानि बिरहागी। अर्थात्: मुझको विरहिणी जानकर अग्निमय चन्द्रमा भी अग्नि की वर्षा नहीं करता।
कुछ दोहे नीति पर भी हैं, जैसेः
कोटि जतन कोऊ करै, परै न प्रकृतिहिं बीच।
नल बल जल ऊँचो चढ़ै, तऊ नीच को नीच।।
अर्थात् कोई कितना भी प्रयत्न करे किन्तु मनुष्य के स्वभाव में अन्तर नहीं पड़ता। नल के बल से पानी ऊपर तो चढ़ जाता है किन्तु फिर भी अपने स्वभाव के अनुसार नीचे ही बहता है।
इस लेख को बिहारी के दो दोहों के साथ समाप्त करता हूँ जिनमें वे भगवान को उलाहना दे रहे हैं:
नीकी लागि अनाकनी, फीकी परी गोहारि,
तज्यो मनो तारन बिरद, बारक बारनि तारि।
अर्थात् : हे भगवान लगता है आब आपको आनाकानी अच्छी लगने लगी है और हमारी पुकार फीकी हो गई है। लगता है कि एक बार हाथी को तार कर तारने का यश छोड़ ही दिया है।
कब को टेरत दीन ह्वै, होत न स्याम सहाय।
तुम हूँ लागी जगत गुरु, जगनायक जग बाय।।
अर्थात्: हे श्याम, मैं कब से दीन होकर तुम्हें पुकार रहा हूँ किन्तु आप मेरी सहायता नहीं कर रहे हैं। हे जग-गुरु, जगनायक क्या आपको भी इस संसार की हवा लग गई है?
…लक्ष्मीनारायण गुप्त
…25 जुलाई 2006
At present, this blog is set up to publish my Hindi poems and accept comments from the readers. Some contributions from others are also published from time to time. Laxmi N. Gupta
Tuesday, July 25, 2006
Friday, July 21, 2006
नाम काम का मेल
कभी कभी व्यक्ति का नाम और काम मेल नहीं खाता है। जिस विश्वविद्यालय में मैं पढ़ाता हूँ, वहाँ पर एक बड़े ही परिश्रमी प्रोफेसर का कुलनाम है "डूलिटिल।" एक बड़े ही मेधावी छात्र का कुलनाम है, "गुडएनफ़।" काका हाथरसी की एक बहुत पुरानी कविता है, "इस कलियुग में नाम बड़े औ दर्शन छोटे।" इसकी कुछ पंक्तियाँ हैः " ये देखो पंडित ज्वालाप्रसाद जी बिल्कुल ठंडे, पंडित शान्तिस्वरूप चलाते देखे डंडे।"
बचपन में इसी विषय पर एक कहानी सुनी थी, जो आपकी सेवा में प्रस्तुत हैः
किसी गाँव में एक आदमी रहता था जिसका नाम था बेसहूर (शुद्ध भाषा में बेशऊर)। उसकी बीवी को लोग, "बेसहूर की बीबी" कहके बुलाते थे जो उसे बिल्कुल अच्छा नहीं लगता था। एक दिन उसने अपने पति से कहा कि वह पता लगा कर अपना कोई सुन्दर सा नाम रखे कयोंकि वह "बेसहूर की बीवी" सुनते सुनते तंग आ गई है। पत्नी के बहुत अनुरोध करने पर एक दिन बेसहूर जी पोटली में सत्तू बाँध कर गाँव से बाहर अच्छे नाम की खोज में निकले। निकलते ही देखा कि किसी की अर्थी जा रही थी। पता लगाया कि कौन मर गया है। लोगों ने बताया कि बहुत भले आदमी थे, इनका नाम अमरसिंह था। और आगे चले तो देखा कि एक आदमी बेतहाशा भागा चला रहा था। उसको रोकना चाहा तो उसने बताया कि वह रुक नहीं सकता कयोंकि कोई उसका पीछा कर रहा है। बेसहूर ने कहा, "भैया, बस अपना नाम बताते जाओ।" उसने दौड़ते दौड़ते बताया कि उसका नाम रणशूर है। और आगे चला तो एक धुनिया बैठा था, रज़ाई में भरने के लिये रुई धुनक रहा था। उससे पूछा कि "भाई, तुम्हारा नाम क्या है?" उसने अपना नाम भाग्यवान बताया।
बेसहूर ने अपनी खोज समाप्त कर घर लौटने का फैसला किया। लौटने पर बीवी के पूछने पर बतायाः
"अम्मर रहैं सो मरि चले, भागि चले रणशूर।
भाग्यवान धुनिया धुनैं, हमहीं भले बेसहूर।।"
यानी कि जो अमर थे वे मर गये, रणशूर (रण) से भाग रहे हैं, भाग्यवान रुई धुन रहे हैं; इन सब से तो हम बेसहूर ही भले हैं।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...२१ जुलाई २००६
बचपन में इसी विषय पर एक कहानी सुनी थी, जो आपकी सेवा में प्रस्तुत हैः
किसी गाँव में एक आदमी रहता था जिसका नाम था बेसहूर (शुद्ध भाषा में बेशऊर)। उसकी बीवी को लोग, "बेसहूर की बीबी" कहके बुलाते थे जो उसे बिल्कुल अच्छा नहीं लगता था। एक दिन उसने अपने पति से कहा कि वह पता लगा कर अपना कोई सुन्दर सा नाम रखे कयोंकि वह "बेसहूर की बीवी" सुनते सुनते तंग आ गई है। पत्नी के बहुत अनुरोध करने पर एक दिन बेसहूर जी पोटली में सत्तू बाँध कर गाँव से बाहर अच्छे नाम की खोज में निकले। निकलते ही देखा कि किसी की अर्थी जा रही थी। पता लगाया कि कौन मर गया है। लोगों ने बताया कि बहुत भले आदमी थे, इनका नाम अमरसिंह था। और आगे चले तो देखा कि एक आदमी बेतहाशा भागा चला रहा था। उसको रोकना चाहा तो उसने बताया कि वह रुक नहीं सकता कयोंकि कोई उसका पीछा कर रहा है। बेसहूर ने कहा, "भैया, बस अपना नाम बताते जाओ।" उसने दौड़ते दौड़ते बताया कि उसका नाम रणशूर है। और आगे चला तो एक धुनिया बैठा था, रज़ाई में भरने के लिये रुई धुनक रहा था। उससे पूछा कि "भाई, तुम्हारा नाम क्या है?" उसने अपना नाम भाग्यवान बताया।
बेसहूर ने अपनी खोज समाप्त कर घर लौटने का फैसला किया। लौटने पर बीवी के पूछने पर बतायाः
"अम्मर रहैं सो मरि चले, भागि चले रणशूर।
भाग्यवान धुनिया धुनैं, हमहीं भले बेसहूर।।"
यानी कि जो अमर थे वे मर गये, रणशूर (रण) से भाग रहे हैं, भाग्यवान रुई धुन रहे हैं; इन सब से तो हम बेसहूर ही भले हैं।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...२१ जुलाई २००६
Thursday, July 20, 2006
प्रश्नचिह्न
ज़िन्दगी महज़ एक प्रश्नचिह्न है,
रहस्य इसका अकथनीय है।
एक ओर शादी की शहनाइयाँ बजती हैं,
दूसरी ओर चिता की लपटें जलती हैं।
सँवारती है सुन्दरी रूप को कहीं,
जराग्रस्त मानवी तड़पती है कहीं।
ज़िन्दगी महज़ एक प्रश्नचिह्न है,
रहस्य इसका अकथनीय है।
मान सम्मान, पुरस्कार और ख्याति,
वनिता, धन और सन्तान की प्राप्ति,
बीतता है इनमें मानव का जीवन,
होता है फिर उसे मृत्यु का दर्शन।
माया यह सब इतनी प्रिय थी उसे,
छाया तक नहीं गई साथ में उसके।
ज़िन्दगी महज़ एक प्रश्नचिह्न है,
रहस्य इसका अकथनीय है।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...२० जुलाई २००६
रहस्य इसका अकथनीय है।
एक ओर शादी की शहनाइयाँ बजती हैं,
दूसरी ओर चिता की लपटें जलती हैं।
सँवारती है सुन्दरी रूप को कहीं,
जराग्रस्त मानवी तड़पती है कहीं।
ज़िन्दगी महज़ एक प्रश्नचिह्न है,
रहस्य इसका अकथनीय है।
मान सम्मान, पुरस्कार और ख्याति,
वनिता, धन और सन्तान की प्राप्ति,
बीतता है इनमें मानव का जीवन,
होता है फिर उसे मृत्यु का दर्शन।
माया यह सब इतनी प्रिय थी उसे,
छाया तक नहीं गई साथ में उसके।
ज़िन्दगी महज़ एक प्रश्नचिह्न है,
रहस्य इसका अकथनीय है।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...२० जुलाई २००६
Wednesday, July 19, 2006
भारतीय गणतंत्र
विद्यमान हैं बहुत से जग में शासनतंत्र,
सबसे अधिक विचित्र पर भारतीय गणतंत्र।
भारतीय गणतंत्र में जातियाँ हुईं अवैध,
क्यों फिर बढ़ता जा रहा जाति पाँति का भेद?
जातियाँ हुईं अवैध, वैध है आरक्षण,
जाति पाँति के भेद भाव का करता रक्षण।
वैसे तो है हिन्दी भारत की राज्यभाषा,
राज पाट के काम की केवल अंग्रेज़ी ही भाषा।
कहते हैं केवल, हिन्दी को राज्यभाषा,
राजधानी से तार हिन्दी में नहीं जाता।
भारतीय गणतंत्र को कहें धर्मनिरपेक्ष,
हिन्दू मत को छोड़ कर सब के प्रति सापेक्ष।
विद्यालयों में नहीं दी जा सकती हिन्दू धर्म की शिक्षा,
कुरान और बाइबल की नहीं किसी को चिन्ता।
इस चिन्तन से नियम बना यह स्वाभाविक,
सेकुलर मुस्लिमलीग, भाजपा है साम्प्रदायिक।
अभिन्न अंग है भारत का कश्मीर,
कश्मीरी हिन्दुओं की फुटी है तकदीर।
फूटी है तकदीर घरों से गऐ निकाले,
हड़प लिये घरद्वार मुसलमानों ने सारे।
भारतीय नेताओं से करता हूँ अनुरोध,
सुलझाओ कश्मीर समस्या, नहीं करो प्रतिरोध।
जब तक यह समस्या हल नहीं होगी,
आतंकियों की संख्या बढ़ती रहेगी।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...१९ जुलाई २००६
सबसे अधिक विचित्र पर भारतीय गणतंत्र।
भारतीय गणतंत्र में जातियाँ हुईं अवैध,
क्यों फिर बढ़ता जा रहा जाति पाँति का भेद?
जातियाँ हुईं अवैध, वैध है आरक्षण,
जाति पाँति के भेद भाव का करता रक्षण।
वैसे तो है हिन्दी भारत की राज्यभाषा,
राज पाट के काम की केवल अंग्रेज़ी ही भाषा।
कहते हैं केवल, हिन्दी को राज्यभाषा,
राजधानी से तार हिन्दी में नहीं जाता।
भारतीय गणतंत्र को कहें धर्मनिरपेक्ष,
हिन्दू मत को छोड़ कर सब के प्रति सापेक्ष।
विद्यालयों में नहीं दी जा सकती हिन्दू धर्म की शिक्षा,
कुरान और बाइबल की नहीं किसी को चिन्ता।
इस चिन्तन से नियम बना यह स्वाभाविक,
सेकुलर मुस्लिमलीग, भाजपा है साम्प्रदायिक।
अभिन्न अंग है भारत का कश्मीर,
कश्मीरी हिन्दुओं की फुटी है तकदीर।
फूटी है तकदीर घरों से गऐ निकाले,
हड़प लिये घरद्वार मुसलमानों ने सारे।
भारतीय नेताओं से करता हूँ अनुरोध,
सुलझाओ कश्मीर समस्या, नहीं करो प्रतिरोध।
जब तक यह समस्या हल नहीं होगी,
आतंकियों की संख्या बढ़ती रहेगी।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...१९ जुलाई २००६
Sunday, July 16, 2006
जीवन-देवता
ओ मेरे जीवन-देवता, देख तू
सूखती मेरी मन रस-धारा।
अमृत कलश भरा है तेरा,
शुष्क कंठ है लेकिन मेरा।
एक बूँद तो इधर गिरा दे,
शुष्क कंठ को सिक्त बना दे।
जीवन के रहस्य समझा दे,
दीपावलि की ज्योति जगा दे।
जीवन में नव वाद्य बजा दे,
भीतर के सब साज सजा दे।
अंतर की सूखी धारा को
रस-आप्लावित नदी बना दे।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...१६ जुलाई २००६
सूखती मेरी मन रस-धारा।
अमृत कलश भरा है तेरा,
शुष्क कंठ है लेकिन मेरा।
एक बूँद तो इधर गिरा दे,
शुष्क कंठ को सिक्त बना दे।
जीवन के रहस्य समझा दे,
दीपावलि की ज्योति जगा दे।
जीवन में नव वाद्य बजा दे,
भीतर के सब साज सजा दे।
अंतर की सूखी धारा को
रस-आप्लावित नदी बना दे।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...१६ जुलाई २००६
Friday, July 14, 2006
प्रयाग
(यह श्रद्धेय पंडित नरेन्द्र शर्मा की एक दुर्लभ कविता है जो मैंने 'सरस्वती हीरक-जयन्ती विशेषांक १९००-१९५९' से साभार ली है।…लक्ष्मीनारायण गुप्त)
१
मैं बन्दी बन्दी मधुप, और यह गुंजित मम स्नेहानुराग,
संगम की गोदी में पोषित शोभित तू शतदल प्रयाग !
विधि की बाहें गंगा-यमुना तेरे सुवक्ष पर कंठहार,--
लहराती आतीं गिरि-पथ से, लहरों में भर शोभा अपार !
देखा करता हूँ गंगा में उगता गुलाब-सा अरुण प्रात,
यमुना की नीली लहरों में नहला तन ऊठती नित्य रात !
गंगा-यमुना की लहरों में कण-कण में मणि नयनाभिराम
बिखरा देती है साँझ हुए नारंगी रँग की शान्त शाम !
तेरे प्रसाद के लिए, तीर्थ ! आते थे दानी हर्ष जहाँ
पल्लव के रुचिर किरीट पहन आता अब भी ऋतुराज वहाँ !
कर दैन्य-दुःख-हेमन्त-अन्त वैभव से भर सब शुष्क वृन्त
हर साल हर्ष के ही समान सुख-हर्ष-पुष्प लाता वसन्त !
स्वर्णिम मयूर-से नृत्य करते उपवन में गोल्ड मोहर,
कुहुका करती पिक छिप छिप कर तरुओं में रत प्रत्येक प्रहर !
भर जाती मीठी सौरभ-से कड़वे नीमों की डाल डाल,
लद जाते चलदल पर असंख्य नवदल प्रवाल के जाल लाल !
'मधु आया', कहते हँस प्रसून, पल्लव 'हाँ' कह कह हिल जाते
आलिंगन भर, मधु-गंध-भरी बहती समीर जब दिन आते !
शुचि स्वच्छ और चौड़ी सड़कों के हरे-भरे तेरे घर में,
सबको सुख से भर देता है ऋतुपति पल भर के अन्तर में !
मधु के दिन पर कितने दिन के ! -- आतप में तप जल जाता सब
तू सिखलाता, कैसे केवल पल भर का है जग का वैभव !
इस स्वर्ण-परीक्षा से दीक्षा ले ज्ञानी बन मन-नीरजात,
शीतल हो जाता, आती है जब सावन की मुख-सरस रात !
जब रहा-सहा दुख धुल जाता, मन शुभ्र शरद्-सा खिल जाता
यों दीपमिलिका में आलोकित कर पथ विमल शरद् आता !
ऋतुओं का पहिया इसी तरह घूमा करता प्रतिवर्ष यहाँ,
तेरे प्रसाद के लिए तीर्थ ! आते थे दानी हर्ष जहाँ !
खुसरू का बाग सिखाता है, है धूप-छाँह-सी यह माया,
वृक्षों के नीचे लिख जाती है यों ही नित चंचल छाया !
वह दुर्ग !--जहाँ उस शान्ति-स्तम्भ में मूर्तिमान अब तक अशोक,
था गर्व कभी, पर आज जगाता है उर उर में क्षोभ-शोक !
तू सीख त्याग, तू सीख प्रेम, तू नियम-नेम ले अज्ञानी--
क्या पत्थर पर अब तक अंकित यह दया-द्रवित कोमल वाणी?--
जिसमें बोले होंगे गद्गद वे शान्ति-स्नेह के अभिलाषी--
दृग भर भर शोकाकुल अशोक; सम्राट्, भिक्षु औ' संन्यासी !
उस पत्थर अंकित है क्या ? क्या त्याग, शान्ति, तप की वाणी ?
जिससे सीखें जीवन-संयम, सर्वत्र-शान्ति सब अज्ञानी !
संदेश शान्ति का ही होगा, पर अब जो कुछ वह लाचारी--
बन्दी बल-हीन गुलामों की जड़मूक बेबसी बेचारी !
दुख भी हलका हो जाता है अब देख देख परिवर्तन-क्रम,
फिर कभी सोचने लगता हूँ यह जीवन सुख-दुख का संगम !
बेबसी सदा की नहीं, सदा की नहीं गुलामी भी मेरी,
हे काल क्रूर, सुन ! कभी नहीं क्या करवट बदलेगी तेरी ?
२
यह जीवन चंचल छाया है, बदला करता प्रतिपल करवट,
मेरे प्रयाग की छाया में पर, अब तक जीवित अक्षयवट ! --
क्या इसके अजर-पत्र पर चढ़ जीवन जीतेगा महाप्रलय ?
कह, जीवन में क्षमता है यदि तो तम से हो प्रकाश निर्भय !
मैं भी फिर नित निर्भय खोजूँ शाश्वत प्रकाश अक्षय जीवन,
निर्भय गाऊँ, मैं शान्त करूँ इस मृत्युभित जग का क्रन्दन !
है नये जन्म का नाम मृत्यु, है नई शक्ति का नाम ह्रास, --
है आदि अन्त का, अन्त आदि का यों सब दिन क्रम-बद्ध ग्रास !
प्यारे प्रयाग ! तेरे उर में ही था यह अन्तर-स्वर निकला,
था कंठ खुला, काँटा निकला, स्वर शुद्ध हुआ, कवि-हृदय मिला !
कवि-हृदय मिला, मन-मुकुल खिला, अर्पित है जो श्री चरणों में,
पर हो न सकेगा अभिनन्दन मेरे इन कृत्रिम वर्णों में !
ये कृत्रिम, तू सत्-पृकृति-रूप, हे पूर्ण-पुरातन तीर्थराज !
क्षमता दे, जिससे कर पाऊँ तेरा अनन्त गुण-गान आज !
दे शुभाशीस, हे पुण्यधाम !, वाणी कल्याणी हो प्रकाम--
स्वीकृत हो अब श्री चरणों में बन्दी का यह अन्तिम प्रणाम !
तेरे चरणों में शीश धरे आये होंगे कितने नरेन्द्र,
कितने ही आये, चले गये, कुछ दिन रह अभिमानी महेन्द्र !
मैं भी नरेन्द्र, पर इन्द्र नहीं, तेरा बन्दी हूँ, तीर्थराज !
क्षमता दे जिससे कर पाऊँ तेरा अन्न्त गुण-गान आज !!
...नरेन्द्र शर्मा
...१९३६
१
मैं बन्दी बन्दी मधुप, और यह गुंजित मम स्नेहानुराग,
संगम की गोदी में पोषित शोभित तू शतदल प्रयाग !
विधि की बाहें गंगा-यमुना तेरे सुवक्ष पर कंठहार,--
लहराती आतीं गिरि-पथ से, लहरों में भर शोभा अपार !
देखा करता हूँ गंगा में उगता गुलाब-सा अरुण प्रात,
यमुना की नीली लहरों में नहला तन ऊठती नित्य रात !
गंगा-यमुना की लहरों में कण-कण में मणि नयनाभिराम
बिखरा देती है साँझ हुए नारंगी रँग की शान्त शाम !
तेरे प्रसाद के लिए, तीर्थ ! आते थे दानी हर्ष जहाँ
पल्लव के रुचिर किरीट पहन आता अब भी ऋतुराज वहाँ !
कर दैन्य-दुःख-हेमन्त-अन्त वैभव से भर सब शुष्क वृन्त
हर साल हर्ष के ही समान सुख-हर्ष-पुष्प लाता वसन्त !
स्वर्णिम मयूर-से नृत्य करते उपवन में गोल्ड मोहर,
कुहुका करती पिक छिप छिप कर तरुओं में रत प्रत्येक प्रहर !
भर जाती मीठी सौरभ-से कड़वे नीमों की डाल डाल,
लद जाते चलदल पर असंख्य नवदल प्रवाल के जाल लाल !
'मधु आया', कहते हँस प्रसून, पल्लव 'हाँ' कह कह हिल जाते
आलिंगन भर, मधु-गंध-भरी बहती समीर जब दिन आते !
शुचि स्वच्छ और चौड़ी सड़कों के हरे-भरे तेरे घर में,
सबको सुख से भर देता है ऋतुपति पल भर के अन्तर में !
मधु के दिन पर कितने दिन के ! -- आतप में तप जल जाता सब
तू सिखलाता, कैसे केवल पल भर का है जग का वैभव !
इस स्वर्ण-परीक्षा से दीक्षा ले ज्ञानी बन मन-नीरजात,
शीतल हो जाता, आती है जब सावन की मुख-सरस रात !
जब रहा-सहा दुख धुल जाता, मन शुभ्र शरद्-सा खिल जाता
यों दीपमिलिका में आलोकित कर पथ विमल शरद् आता !
ऋतुओं का पहिया इसी तरह घूमा करता प्रतिवर्ष यहाँ,
तेरे प्रसाद के लिए तीर्थ ! आते थे दानी हर्ष जहाँ !
खुसरू का बाग सिखाता है, है धूप-छाँह-सी यह माया,
वृक्षों के नीचे लिख जाती है यों ही नित चंचल छाया !
वह दुर्ग !--जहाँ उस शान्ति-स्तम्भ में मूर्तिमान अब तक अशोक,
था गर्व कभी, पर आज जगाता है उर उर में क्षोभ-शोक !
तू सीख त्याग, तू सीख प्रेम, तू नियम-नेम ले अज्ञानी--
क्या पत्थर पर अब तक अंकित यह दया-द्रवित कोमल वाणी?--
जिसमें बोले होंगे गद्गद वे शान्ति-स्नेह के अभिलाषी--
दृग भर भर शोकाकुल अशोक; सम्राट्, भिक्षु औ' संन्यासी !
उस पत्थर अंकित है क्या ? क्या त्याग, शान्ति, तप की वाणी ?
जिससे सीखें जीवन-संयम, सर्वत्र-शान्ति सब अज्ञानी !
संदेश शान्ति का ही होगा, पर अब जो कुछ वह लाचारी--
बन्दी बल-हीन गुलामों की जड़मूक बेबसी बेचारी !
दुख भी हलका हो जाता है अब देख देख परिवर्तन-क्रम,
फिर कभी सोचने लगता हूँ यह जीवन सुख-दुख का संगम !
बेबसी सदा की नहीं, सदा की नहीं गुलामी भी मेरी,
हे काल क्रूर, सुन ! कभी नहीं क्या करवट बदलेगी तेरी ?
२
यह जीवन चंचल छाया है, बदला करता प्रतिपल करवट,
मेरे प्रयाग की छाया में पर, अब तक जीवित अक्षयवट ! --
क्या इसके अजर-पत्र पर चढ़ जीवन जीतेगा महाप्रलय ?
कह, जीवन में क्षमता है यदि तो तम से हो प्रकाश निर्भय !
मैं भी फिर नित निर्भय खोजूँ शाश्वत प्रकाश अक्षय जीवन,
निर्भय गाऊँ, मैं शान्त करूँ इस मृत्युभित जग का क्रन्दन !
है नये जन्म का नाम मृत्यु, है नई शक्ति का नाम ह्रास, --
है आदि अन्त का, अन्त आदि का यों सब दिन क्रम-बद्ध ग्रास !
प्यारे प्रयाग ! तेरे उर में ही था यह अन्तर-स्वर निकला,
था कंठ खुला, काँटा निकला, स्वर शुद्ध हुआ, कवि-हृदय मिला !
कवि-हृदय मिला, मन-मुकुल खिला, अर्पित है जो श्री चरणों में,
पर हो न सकेगा अभिनन्दन मेरे इन कृत्रिम वर्णों में !
ये कृत्रिम, तू सत्-पृकृति-रूप, हे पूर्ण-पुरातन तीर्थराज !
क्षमता दे, जिससे कर पाऊँ तेरा अनन्त गुण-गान आज !
दे शुभाशीस, हे पुण्यधाम !, वाणी कल्याणी हो प्रकाम--
स्वीकृत हो अब श्री चरणों में बन्दी का यह अन्तिम प्रणाम !
तेरे चरणों में शीश धरे आये होंगे कितने नरेन्द्र,
कितने ही आये, चले गये, कुछ दिन रह अभिमानी महेन्द्र !
मैं भी नरेन्द्र, पर इन्द्र नहीं, तेरा बन्दी हूँ, तीर्थराज !
क्षमता दे जिससे कर पाऊँ तेरा अन्न्त गुण-गान आज !!
...नरेन्द्र शर्मा
...१९३६
Wednesday, July 12, 2006
भारतीय और यूनानी मिथक
मैं कुछ दिनों से यूनानी पौराणिक कथाएं पढ़ रहा हूँ। लगता है कि इनमें और भारतीय कथाओं में काफी समानताएं हैं। जैसे हमारी कथाओं में ऐसे जन्म होते हैं जो रोज़ मर्रे की दुनिया में असम्भव हैं वैसे ही यूनानी कथाओं में। उदाहरण के लिये अगस्त्य मुनि घड़े से पैदा होते हैं, राम इत्यादि की मातायें हवनकुण्ड से निकले अग्नि की दी हुई खीर से गर्भवती होती हैं, सभी पाण्डव देवताओं के आवाहन से पैदा होते हैं आदि, आदि। यूनानी कथायें भी ऐसी ही रंग-बिरंगी हैं। हो सकता है आपने हेलेन का नाम सुना हो जिसके मुख-मण्डल ने हज़ार जहाजों की यात्रा शुरू कराई, ट्र्वाय पर हमला करने के लिये। हेलेन के जन्म की कथा बड़ी ही विचित्र है। हेलेन की माँ स्पार्टा की रानी लेडा थी। देवताओं के राजा ज़्यूस हंस के रूप में आकर लेडा के साथ सम्भोग करते हैं। उसी रात को लेडा के पति टिन्डारेकस भी उससे सम्भोग करते हैं। लेडा दो अंडे देती है। एक से हेलेन और पालीड्यूसेस का जन्म होता है और दूसरे से कैस्टर और क्लाइटोमेन्स्ट्रा का।
हेलेन की शादी मेनलौस के साथ होती है। एक बार ट्र्वाय का राजकुमार पेरिस मेनलौस का अतिथि बन कर आता है। हेलेन और पेरिस एक दूसरे पर मोहित हो जाते हैं। पेरिस हेलेन भगा कर ट्र्वाय ले जाता है। हेलेन को लौटा कर लाने के लिये युद्ध होता है जिसकी कथा होमर के महाकाव्य इलियड का विषय है। रामायण की कथा में रावण सीता को हर ले जाता है किन्तु सीता अपनी मर्ज़ी से नहीं जाती हैं। तुलसीदास के रामचरित मानस में राम असली सीता को अग्नि के सुपुर्द कर देते हैं और अपहरण माया सीता का होता है। वाल्मीकि की रामायण में माया सीता का कोई ज़िक्र नहीं है। हेलेन की कहानी में भी होमर के बाद के कवियों के अनुसार पेरिस माया हेलेन (Phantom Helen) का अपहरण करता है; असली हेलेन मिस्र चली जाती है।
और भी बहुत ही अज़ीबोग़रीब कहानियाँ हैं। एक और उदाहरण दे रहा हूँ। हेलेन के जुड़वाँ भाई पालीड्यूसेस और कैस्टर को वरदान मिलता है कि मरने के बाद भी वे वाकई मरते नहीं हैं। दोनों एक दिन के अन्तर से जीते मरते रहते हैं।
एथीना बुद्धि और ज्ञान की देवी हैं और ज़्यूस की पुत्री हैं। एक बार ज़्यूस को बड़ा भयंकर सरदर्द होता है। उनके सिर को फोड़ कर एथीना का जन्म होता है। यह पढ़ कर मुझे राजा वेन की याद आई जिनकी बाँह का मन्थन करके ऋषियों ने पृथु को जन्म दिया था। इन्हीं पृथु ने धरती को जोत कर खेती के लायक बनाया जिससे धरती का नाम पृथ्वी (संस्कृतः पृथिवी) पड़ा।
सम्भव है कि विद्वानों ने एन समानताओं पर शोध कार्य किया हो जिसका ज्ञान मुझे नहीं है।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...१२ जुलाई २००६
हेलेन की शादी मेनलौस के साथ होती है। एक बार ट्र्वाय का राजकुमार पेरिस मेनलौस का अतिथि बन कर आता है। हेलेन और पेरिस एक दूसरे पर मोहित हो जाते हैं। पेरिस हेलेन भगा कर ट्र्वाय ले जाता है। हेलेन को लौटा कर लाने के लिये युद्ध होता है जिसकी कथा होमर के महाकाव्य इलियड का विषय है। रामायण की कथा में रावण सीता को हर ले जाता है किन्तु सीता अपनी मर्ज़ी से नहीं जाती हैं। तुलसीदास के रामचरित मानस में राम असली सीता को अग्नि के सुपुर्द कर देते हैं और अपहरण माया सीता का होता है। वाल्मीकि की रामायण में माया सीता का कोई ज़िक्र नहीं है। हेलेन की कहानी में भी होमर के बाद के कवियों के अनुसार पेरिस माया हेलेन (Phantom Helen) का अपहरण करता है; असली हेलेन मिस्र चली जाती है।
और भी बहुत ही अज़ीबोग़रीब कहानियाँ हैं। एक और उदाहरण दे रहा हूँ। हेलेन के जुड़वाँ भाई पालीड्यूसेस और कैस्टर को वरदान मिलता है कि मरने के बाद भी वे वाकई मरते नहीं हैं। दोनों एक दिन के अन्तर से जीते मरते रहते हैं।
एथीना बुद्धि और ज्ञान की देवी हैं और ज़्यूस की पुत्री हैं। एक बार ज़्यूस को बड़ा भयंकर सरदर्द होता है। उनके सिर को फोड़ कर एथीना का जन्म होता है। यह पढ़ कर मुझे राजा वेन की याद आई जिनकी बाँह का मन्थन करके ऋषियों ने पृथु को जन्म दिया था। इन्हीं पृथु ने धरती को जोत कर खेती के लायक बनाया जिससे धरती का नाम पृथ्वी (संस्कृतः पृथिवी) पड़ा।
सम्भव है कि विद्वानों ने एन समानताओं पर शोध कार्य किया हो जिसका ज्ञान मुझे नहीं है।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...१२ जुलाई २००६
Tuesday, July 11, 2006
बरवै छन्द
बरवै बड़ा सुन्दर छन्द है किन्तु आधुनिक कविता में इसका प्रयोग बहुत कम हो गया है। यह एक मात्रिक छन्द है जिसमें चार चरण होते हैं। इसके विषम यानी कि पहिले और तीसरे चरणों में १२ मात्राएं और सम यानी दूसरे और चौथे चरणों में ७ मात्राएं होती हैं। सम चरणों के अन्त में जगण यानी लघु, दीर्घ, लघु मात्राएं होती हैं।
उदाहरण
१। रहीम का बड़ा सुन्दर बरवै हैः
आगि लाग घरु बरिगा, कि अति भल कीन।
साजन हाथ घैलना, भरि भरि दीन।।
अर्थः आग लग गई, घर जल गया। यह बड़ा अच्छा हुआ क्योंकि साजन के हाथों में पानी भर भर के घड़े देने का मौका मिला।
तुलसी दास जी का एक लघु ग्रन्थ है जिसका बरवै रामायण नाम है। इसके कुछ बरवै स्मृति से दे रहा हूँ।
सीता जी के रूप के बारे में कहते हैं:
२। चम्पक हरवा उर मिलि, अधिक सोहाय।
जानि परै सिय हियरे कि, जब कुम्हिलाय।।
(मात्राएं गिनते समय ध्यान रखें कि संयुक्त अक्षर के पहले की मात्रा दीर्घ हो जाती है।)
अर्थः सीता जी के गले में चम्पक पुष्पों की माला बहुत शोभा दे रही है। सीता जी का रंग इतना सफेद है कि माला तभि दिखाई देती है जब पुष्प कुम्हलाने लगते हैं।
३। सम सुबरन सुषमाकर, सुखद न थोर।
सीय अंग सखि कोमल, कनक कठोर।।
अर्थः सीता जी के अंग सोने की तरह ही सुषमाकर हैं किन्तु अंग कोमल हैं और सोना कठोर है।
४। अब जीवन कै है कपि, आस न कोय।
कनगुरिया कै मुदरी, कंकन होय।।
अर्थः सीता जी हनुमान जी से कहती हैं कि अब जीवन की कोई आशा नहीं है। वे इतनी कृशकाय हो गई हैं कि उनकी ऊंगली की अँगूठी बाँह के कंकन की तरह हो गई है।
पाठकों से अनुरोध है कि यदि उनके पास और उदाहरण हों तो प्रस्तुत करें।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...११ जुलाई २००६
उदाहरण
१। रहीम का बड़ा सुन्दर बरवै हैः
आगि लाग घरु बरिगा, कि अति भल कीन।
साजन हाथ घैलना, भरि भरि दीन।।
अर्थः आग लग गई, घर जल गया। यह बड़ा अच्छा हुआ क्योंकि साजन के हाथों में पानी भर भर के घड़े देने का मौका मिला।
तुलसी दास जी का एक लघु ग्रन्थ है जिसका बरवै रामायण नाम है। इसके कुछ बरवै स्मृति से दे रहा हूँ।
सीता जी के रूप के बारे में कहते हैं:
२। चम्पक हरवा उर मिलि, अधिक सोहाय।
जानि परै सिय हियरे कि, जब कुम्हिलाय।।
(मात्राएं गिनते समय ध्यान रखें कि संयुक्त अक्षर के पहले की मात्रा दीर्घ हो जाती है।)
अर्थः सीता जी के गले में चम्पक पुष्पों की माला बहुत शोभा दे रही है। सीता जी का रंग इतना सफेद है कि माला तभि दिखाई देती है जब पुष्प कुम्हलाने लगते हैं।
३। सम सुबरन सुषमाकर, सुखद न थोर।
सीय अंग सखि कोमल, कनक कठोर।।
अर्थः सीता जी के अंग सोने की तरह ही सुषमाकर हैं किन्तु अंग कोमल हैं और सोना कठोर है।
४। अब जीवन कै है कपि, आस न कोय।
कनगुरिया कै मुदरी, कंकन होय।।
अर्थः सीता जी हनुमान जी से कहती हैं कि अब जीवन की कोई आशा नहीं है। वे इतनी कृशकाय हो गई हैं कि उनकी ऊंगली की अँगूठी बाँह के कंकन की तरह हो गई है।
पाठकों से अनुरोध है कि यदि उनके पास और उदाहरण हों तो प्रस्तुत करें।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...११ जुलाई २००६
Thursday, July 06, 2006
कबीर
११ जून को कबीर जन्मदिवस था। इस दिन पर मेरा एक स्तम्भ लिखने का इरादा था किन्तु मैं तब यात्रा कर रहा था। इस लिये विलम्ब से लिख रहा हूँ। कबीर का भारतीय सन्त परम्परा में अद्वितीय स्थान है। वे दो टूक बात कहते हैः खरी और स्पष्ट। उदाहरण देखियेः
१। पानी बिच मीन पियासी
मोहिं सुनि सुनि आवै हाँसी
आतम ज्ञान बिना सब सूना
क्या मथुरा क्या काशी
२। हिन्दू तुरुक मसीत देहुरा
दुहुँ ठा राम खुदाई
जहाँ मसीत देहुरा नाहीं
तहँ का की ठकुराई
(मसीत = मस्जिद, देहुरा = मन्दिर, देवस्थान)
कबीर के दोहे सर्वविदित हैं किन्तु उनकी उलटबासियाँ उतनी जानकारी में नहीं हैं। उलटबासियों में विरोधाभास का बाहुल्य होता है और उनका अर्थ गूढ़ होता है जो शब्दार्थ से बिलकुल भिन्न होता है। एक उदाहरण दे रहा हूँ जो आसानी से समझा जा सकता हैः
ऐसी चतुर भौजाई रे
मन लागो देवर संग
बारह बरस पिया संग सोई
बाँझिन राँड़ कहाई रे
एक राति देऊरा संग सोई
सौ लरिका जन्माई रे
निहुरे निहुरे देउरा भागैं
ऊपर ते द्याखैं जेठ भाई रे
ऐसी चतुर...
यहाँ भौजाई माया है, बड़ा भाई परमात्मा और छोटा भाई जीव है। जब तक माया परमात्मा के साथ है, परमात्मा निराकार, निर्विकार, निर्गुण है, अतयेव संसार की उत्पत्ति नहीं होती है किन्तु जीव और माया का साथ होते ही संसार उत्पन्न हो जाता है।
कबीर अन्धविश्वास के सख्त विरोधी थे। हिन्दुओं का विश्वास है कि काशी में मरने वाला सीधे कैलाश जाता है और मगहर में मरने वाला सीधे नरक। कबीर काशी में रहते थे। उन्होंने कहाः जो कबिरा काशी मरै तो रामहिं काह निहोर। सारी ज़िन्दगी काशी में रहे किन्तु मरे मगहर में जाके।
परमात्मा के साक्षात्कार का वर्णन कबीर ऐसे करते हैः
गगन गरजै जहाँ सदा पावस झरै
होत झंकार नित बजत तूरा
वेद कत्तेब की गम्म नाहीं जहाँ
कहैं कब्बीर कोई रमै सूरा।
(कत्तेब = कुरान, पावस = वर्षा)
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...६ जुलाई २००६
१। पानी बिच मीन पियासी
मोहिं सुनि सुनि आवै हाँसी
आतम ज्ञान बिना सब सूना
क्या मथुरा क्या काशी
२। हिन्दू तुरुक मसीत देहुरा
दुहुँ ठा राम खुदाई
जहाँ मसीत देहुरा नाहीं
तहँ का की ठकुराई
(मसीत = मस्जिद, देहुरा = मन्दिर, देवस्थान)
कबीर के दोहे सर्वविदित हैं किन्तु उनकी उलटबासियाँ उतनी जानकारी में नहीं हैं। उलटबासियों में विरोधाभास का बाहुल्य होता है और उनका अर्थ गूढ़ होता है जो शब्दार्थ से बिलकुल भिन्न होता है। एक उदाहरण दे रहा हूँ जो आसानी से समझा जा सकता हैः
ऐसी चतुर भौजाई रे
मन लागो देवर संग
बारह बरस पिया संग सोई
बाँझिन राँड़ कहाई रे
एक राति देऊरा संग सोई
सौ लरिका जन्माई रे
निहुरे निहुरे देउरा भागैं
ऊपर ते द्याखैं जेठ भाई रे
ऐसी चतुर...
यहाँ भौजाई माया है, बड़ा भाई परमात्मा और छोटा भाई जीव है। जब तक माया परमात्मा के साथ है, परमात्मा निराकार, निर्विकार, निर्गुण है, अतयेव संसार की उत्पत्ति नहीं होती है किन्तु जीव और माया का साथ होते ही संसार उत्पन्न हो जाता है।
कबीर अन्धविश्वास के सख्त विरोधी थे। हिन्दुओं का विश्वास है कि काशी में मरने वाला सीधे कैलाश जाता है और मगहर में मरने वाला सीधे नरक। कबीर काशी में रहते थे। उन्होंने कहाः जो कबिरा काशी मरै तो रामहिं काह निहोर। सारी ज़िन्दगी काशी में रहे किन्तु मरे मगहर में जाके।
परमात्मा के साक्षात्कार का वर्णन कबीर ऐसे करते हैः
गगन गरजै जहाँ सदा पावस झरै
होत झंकार नित बजत तूरा
वेद कत्तेब की गम्म नाहीं जहाँ
कहैं कब्बीर कोई रमै सूरा।
(कत्तेब = कुरान, पावस = वर्षा)
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...६ जुलाई २००६
Wednesday, July 05, 2006
प्रतीक्षा
तू आया ले कर के नव कुसुमित कलियाँ,
नहीं सुनी मैंने तेरे कदमों की आहट।
लौट गया देखा जब तूने मुझको सोते,
देख रही हूँ राह तिहारी निर्मम तब से।
तेरी शीतल मन्द पवन का आया झोंका,
बरबस जिससे हिला तनिक सा मेरा घूँघट।
लौट गया तू निष्ठुर बिन पलटाये घूँघट,
बैठी हूँ मैं तेरे पथ में आँख बिछाये।
आई थी इक रात सुहागन बनने की तब,
वह वियोग की रात बनी बिन तेरे आये।
और परीक्षा करवायेगा कितनी प्रियतम,
बैठी हूँ मैं कब से तेरी आस लगाये?
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...५ जुलाई २००६
नहीं सुनी मैंने तेरे कदमों की आहट।
लौट गया देखा जब तूने मुझको सोते,
देख रही हूँ राह तिहारी निर्मम तब से।
तेरी शीतल मन्द पवन का आया झोंका,
बरबस जिससे हिला तनिक सा मेरा घूँघट।
लौट गया तू निष्ठुर बिन पलटाये घूँघट,
बैठी हूँ मैं तेरे पथ में आँख बिछाये।
आई थी इक रात सुहागन बनने की तब,
वह वियोग की रात बनी बिन तेरे आये।
और परीक्षा करवायेगा कितनी प्रियतम,
बैठी हूँ मैं कब से तेरी आस लगाये?
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...५ जुलाई २००६
Subscribe to:
Posts (Atom)