ये कहानियाँ मेरी माँ सुनाती थीं।
बड़ों की बात
एक बार एक जंगल में एक बाघ रहता था। वह जब भी शिकार मार के लाता था और खाने के पहले नदी में मुँह धोने जाता था, कोई जानवर शिकार का सबसे अच्छा भाग चुरा ले जाता था। बाघ बहुत नाराज़ था लेकिन उसे पता नहीं था कि क्या करा। उसी जंगल में एक लोमड़ी रहती थी। उसने बाघ से कहा कि यह सियार की करतूत है और वह बाघ को सियार की माँद तक पहुँचा सकती है। यह तय हुआ कि लोमड़ी आगे आगे चलेगी और उसकी पूँछ बाघ की टाँग से बँधी होगी। इस तरह चलते चलते जब वे सियार की माँद के करीब आये, सियार ने उन्हें आते देख कर अपनी पत्नी को आवाज़ लगाई, "चन्द्रवदनी, बच्चे क्यों रो रहे हैं?" पत्नी ने जवाब दिया, "सिंघपछाड़, इन्हें बासी बाघ का मांस नहीं पसन्द आ रहा है, ताज़ा माँग रहे हैं।" सियार ने कहा, "बच्चों को चुप करो। एक बाघ को लोमड़ी मौसी से लाने को कहा था। वे उसे ला रही हैं।" इतना सुनते ही बाघ की सिट्टी पिट्टी गुम हो गई और वह पीछे भागने लगा। लोमड़ी ने बहुत समझाया कि यह सियार ही है, बस गीदड़-भबकी दे रहा है लेकिन बाघ नहीं माना। लोमड़ी की पूँछ इस खींचातानी में टूटते टूटते बची। किसी तरह जब छूटी, तब लोमड़ी ने सोचाः "न बड़ों की बात करते, न खिंचते खिंचते फिरते।"
कोरी की भविष्यवाणी
एक कोरी महाशय अपनी ससुराल गए। दरवाजे को बन्द देखा लेकिन बाहर से ही ज़ीना था, छत पर जाने के लिये। चढ़कर आँगन की मुँड़ेर से देखा कि उनकी सास बड़े बना रही हैं और पहला बड़ा टेढ़ा बना है। फिर वे नीचे उतर के आये और दरवाज़ा खटखटाया। सास ने दरवाज़ा खोल कर पूछा कि आप कब से इन्तज़ार कर रहे थे। उन्होंने कहाकि वे "पहले टेढ़े" के समय पर आये थे। सास बहुत प्रभावित हुईं और सारे गाँव में खबर फैल गई कि कोरी का दामाद बड़ा जान-पाँड़े है। यह खबर राज-दरबार तक पहुँची। अवसर की बात कि रानी का नौलखा हार चोरी हो गया था। कोरी को बुला के कहा गया कि २४ घंटे में हार का पता लगाओ या मौत की सज़ा मिलेगी। गर्मियों के दिन थे। रात को छत पर सोने का प्रबन्ध था। सोने के पहले कोरी ने गाया, " आव आव सुखनिंदिया, भोरहें राजा कटावैं मुड़िया।" बगल की जुड़ी हुई छत से सुखनिंदिया ने जो रानी की दासी थी और जिसने हार चुराया था, यह गीत सुना और वह तुरन्त भागती हुई कोरी के पास आई और अपना अपराध कबूल करके जान की भिक्षा माँगने लगी। कोरी ने किसी तरह राजा से पैरवी कर उसकी जान बचवाई। अब तो कोरी के नक्शे हो गए। रोज़ राज-दरबार जाने लगे। एक दिन जब कोरी साहब दरबार में थे, नाई राजा की दाढ़ी बनाने की तैयारी में अपना उस्तरा तेज़ कर रहा था। कोरी को तुकबन्दी का शौक था तो उसने गाया, " काहे का तुम उलटौ, पलटौ, घिसौ लगाऔ पानी, जौनि बात है तुम्हरे मन माँ तौनि बात हम जानी।" यह सुनते ही नाई कोरी के पैरों पड़ कर जान की भीख माँगने लगा। हुआ क्या कि राजा के खिलाफ़ षड़यंत्र था और नाई राजा का गला काटने वाला था। नाई और सारे षड़यंत्रकारी पकड़े गये। राजा ने इनाम-स्वरूप कोरी को अपनी बेटी ब्याह दी और आधा राज्य दे दिया।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...22 जून 2006
At present, this blog is set up to publish my Hindi poems and accept comments from the readers. Some contributions from others are also published from time to time. Laxmi N. Gupta
Thursday, June 22, 2006
Monday, June 19, 2006
कुछ ग्रामीण कथायें
आज कल मेरा मन संस्मरण मोड में है। इस लिये आपको कुछ सत्य और कुछ काल्पनिक कहानियाँ सुना रहा हूँ जो मैं ने अपने बचपन में सुनी थीं। पहले कुछ सत्य कहानियाँ- जहाँ तक मुझे पता है- सुनियेः
१। हमारे गाँव में एक नत्थू नामका आदमी रहता था। उसके यहाँ एक मेहमान आये। उन्होंने चौपाल पर बैठते ही पिच्च से थूँक दिया। जब नत्थू नाराज़ हुआ तब उन्होंने यह आशु कविता सुनाईः
"आये नथू के, न थूके नथू के, तो थूके कहाँ।"
२। एक बार एक बनिया एक ब्राह्मण के यहाँ अनाज तुलाने गया। काँटा लगा के पसेरियों (पसेरी = ५ सेर) में गिनने लगा कि कितना अनाज तुल गया है। साथ में बनिये का ८-९ साल का लड़का भी आया था। वह जब अनाज के पास आने लगा तो ब्राह्मण ने उसे एक लात मार दी। बनिये ने कहाः
"बाम्हन मारी लाता
लगी कहाँ कुशलाता
बावन ते बयालिस हैं, बयालिस हैं।"
यानी कि बनिये ने बच्चे से कहा कि ब्राह्मण ने तुम्हें लात मारी, लगी तो नहीं, कुशल तो है। और ब्राह्मण को त्वरित दंड भी दे दिया, बावन पसेरी की बयालिस ही रह गईं। यह सब इतनी जल्दी हुआ कि ब्राह्मण को पता भी नहीं चला।
३। एक बार खलिहान में लोग चोरी से जुआँ खेल रहे थे। एक सुदीन नामका व्यक्ति दूर से देख रहा था। उससे जब पूछा गया कि तुमने क्या देखा तो उसने यह दोहा सुनायाः
"दस दस के दुइ होत हैं, पाँच पाँच के तीन।
पुरवा वाले ख्यात ते द्याखत रहैं सुदीन।।"
(ख्यात = खेत, द्याखत = देखत)
४। एक बार एक राजा साहब एक नर्तकी के नाच गाने से बहुत खुश हुए और बोले कि एक ही वाक्य में जो चाहे वह माँग ले। नर्तकी ने यह कहाः
"तारी, तारा, तारगाँव, भैंसही, पचड्डा पाँच गाँव।"
५। यह कथानक मैं ने किसी पत्रिका में पढ़ा था। एक बार एक ८-९ महीने की गर्भवती नर्तकी से एक दर्शक ने कहाः
"नौ महीने का हमल है मुश्तरी को, जो दो चार दिन में हुआ चाहता है।"
नर्तकी ने छूटते ही जवाब दियाः
"इसी से खुश हैं इतने ज्यादा बिरादर कि हमशीरज़ादा हुआ चाहता है।"
(बिरादर= भाई, हमशीरज़ादा= भान्जा)
कुछ काल्पनिक कहानियाँ
१। यह शेखचिल्ली की कहानी मेरी माँ सुनाया करती थीं। एकबार शेखचिल्ली ने अपनी माँ से पूछा कि, "माँ, लोग कैसे मर जाते हैं।" माँ ने कहा, "बेटा, मूँद गईं आँखें और बीत गईं लाखें।" शेखचिल्ली ने सोचा कि वे भी मर के देखेंगे। गाँव के बाहर जाकर एक गड्ढा खोद कर उसी में आँखें बन्द करके लेट गये।" थोड़ी देर बाद जब रात हो गई, उस रास्ते से दो चोर बातें करते जा रहे थे कि अगर एक और साथी होता तो अच्छा रहता। एक घर के पीछे रहता, एक बाहर और तीसरा घर के अन्दर चोरी करने जाता। शेखचिल्ली ने कहा, "मैं तो मर गया हूँ, अगर ज़िंदा होता तो तुम्हारी मदद कर देता।" एक चोर ने कहा कि," तुम, बाहर निकल के हमारी मदद कर दो फिर आके मर जाना। ऐसी मरने की जल्दी क्या है।" शेखचिल्ली को ठंड लग रही थी और भूख भी। सोचा कि इसमें बुरा ही क्या तो वे निकल के चोरों की मदद करने आगये। यह तय हुआ कि शेखचिल्ली अन्दर चोरी करने जायेंगे। घर के अन्दर पहुँच कर शेखचिल्ली कुछ खाने पीने की चीज़ ढ़ूँढ़ने लगे। रसोई में उन्हें दूध, चीनी और चावल मिल गये तो उन्होंने खीर बनाना शुरू किया। रसोई में एक बुढ़िया फर्श पर सोई हुई थी। जैसे जैसे उसे आँच लग रही थी, उसके हाथ फैल रहे थे। शेखचिल्ली ने सोचा कि बुढ़िया खीर माँग रही है। उन्होंने कहा, "बुढ़िया, इतनी सारी खीर बना रहा हूँ, मैं अकेले ही थोड़े ही खाऊँगा, तुझे भी दूँगा।" लेकिन बुढ़िया का हाथ फैलता ही रहा। शेखचिल्ली ने झुँझला के गरम गरम खीर उसके हाथ पर डाल दी। बुढ़िया चीखती, चिल्लाती हड़बड़ा के उठ के बैठ गई और शेखचिल्ली पकड़े गये। उनहोंने बताया कि मुझे पकड़ के क्या करोगे, असली चोर तो बाहर हैं। मैं तो केवल अपने खाने का इन्तज़ाम कर रहा था।
२। यह शेखचिल्ली की कहानी कहीं पर पढ़ी थी। एक बार शेखचिल्ली ने सोचा कि यदि उन्हें कहीं एक रुपया पड़ा मिल जाये तो दो आने की सिन्नी (प्रसाद) चढ़ायेंगे। भाग्य की बात कि उन्हें एक रुपया पड़ा मिल भी जाता है। भुनाने के लिये पंसारी की दूकान पर गये। पंसारी ने कहा कि सिक्का ज़रा घिसा पिटा है, दो आने बट्टा लगेगा। इस पर शेखचिल्ली बोलेः
"अल्ला मियाँ बड़े सयाने। उपरहि काट लिये दो आने।।"
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...१९ जून २००६
१। हमारे गाँव में एक नत्थू नामका आदमी रहता था। उसके यहाँ एक मेहमान आये। उन्होंने चौपाल पर बैठते ही पिच्च से थूँक दिया। जब नत्थू नाराज़ हुआ तब उन्होंने यह आशु कविता सुनाईः
"आये नथू के, न थूके नथू के, तो थूके कहाँ।"
२। एक बार एक बनिया एक ब्राह्मण के यहाँ अनाज तुलाने गया। काँटा लगा के पसेरियों (पसेरी = ५ सेर) में गिनने लगा कि कितना अनाज तुल गया है। साथ में बनिये का ८-९ साल का लड़का भी आया था। वह जब अनाज के पास आने लगा तो ब्राह्मण ने उसे एक लात मार दी। बनिये ने कहाः
"बाम्हन मारी लाता
लगी कहाँ कुशलाता
बावन ते बयालिस हैं, बयालिस हैं।"
यानी कि बनिये ने बच्चे से कहा कि ब्राह्मण ने तुम्हें लात मारी, लगी तो नहीं, कुशल तो है। और ब्राह्मण को त्वरित दंड भी दे दिया, बावन पसेरी की बयालिस ही रह गईं। यह सब इतनी जल्दी हुआ कि ब्राह्मण को पता भी नहीं चला।
३। एक बार खलिहान में लोग चोरी से जुआँ खेल रहे थे। एक सुदीन नामका व्यक्ति दूर से देख रहा था। उससे जब पूछा गया कि तुमने क्या देखा तो उसने यह दोहा सुनायाः
"दस दस के दुइ होत हैं, पाँच पाँच के तीन।
पुरवा वाले ख्यात ते द्याखत रहैं सुदीन।।"
(ख्यात = खेत, द्याखत = देखत)
४। एक बार एक राजा साहब एक नर्तकी के नाच गाने से बहुत खुश हुए और बोले कि एक ही वाक्य में जो चाहे वह माँग ले। नर्तकी ने यह कहाः
"तारी, तारा, तारगाँव, भैंसही, पचड्डा पाँच गाँव।"
५। यह कथानक मैं ने किसी पत्रिका में पढ़ा था। एक बार एक ८-९ महीने की गर्भवती नर्तकी से एक दर्शक ने कहाः
"नौ महीने का हमल है मुश्तरी को, जो दो चार दिन में हुआ चाहता है।"
नर्तकी ने छूटते ही जवाब दियाः
"इसी से खुश हैं इतने ज्यादा बिरादर कि हमशीरज़ादा हुआ चाहता है।"
(बिरादर= भाई, हमशीरज़ादा= भान्जा)
कुछ काल्पनिक कहानियाँ
१। यह शेखचिल्ली की कहानी मेरी माँ सुनाया करती थीं। एकबार शेखचिल्ली ने अपनी माँ से पूछा कि, "माँ, लोग कैसे मर जाते हैं।" माँ ने कहा, "बेटा, मूँद गईं आँखें और बीत गईं लाखें।" शेखचिल्ली ने सोचा कि वे भी मर के देखेंगे। गाँव के बाहर जाकर एक गड्ढा खोद कर उसी में आँखें बन्द करके लेट गये।" थोड़ी देर बाद जब रात हो गई, उस रास्ते से दो चोर बातें करते जा रहे थे कि अगर एक और साथी होता तो अच्छा रहता। एक घर के पीछे रहता, एक बाहर और तीसरा घर के अन्दर चोरी करने जाता। शेखचिल्ली ने कहा, "मैं तो मर गया हूँ, अगर ज़िंदा होता तो तुम्हारी मदद कर देता।" एक चोर ने कहा कि," तुम, बाहर निकल के हमारी मदद कर दो फिर आके मर जाना। ऐसी मरने की जल्दी क्या है।" शेखचिल्ली को ठंड लग रही थी और भूख भी। सोचा कि इसमें बुरा ही क्या तो वे निकल के चोरों की मदद करने आगये। यह तय हुआ कि शेखचिल्ली अन्दर चोरी करने जायेंगे। घर के अन्दर पहुँच कर शेखचिल्ली कुछ खाने पीने की चीज़ ढ़ूँढ़ने लगे। रसोई में उन्हें दूध, चीनी और चावल मिल गये तो उन्होंने खीर बनाना शुरू किया। रसोई में एक बुढ़िया फर्श पर सोई हुई थी। जैसे जैसे उसे आँच लग रही थी, उसके हाथ फैल रहे थे। शेखचिल्ली ने सोचा कि बुढ़िया खीर माँग रही है। उन्होंने कहा, "बुढ़िया, इतनी सारी खीर बना रहा हूँ, मैं अकेले ही थोड़े ही खाऊँगा, तुझे भी दूँगा।" लेकिन बुढ़िया का हाथ फैलता ही रहा। शेखचिल्ली ने झुँझला के गरम गरम खीर उसके हाथ पर डाल दी। बुढ़िया चीखती, चिल्लाती हड़बड़ा के उठ के बैठ गई और शेखचिल्ली पकड़े गये। उनहोंने बताया कि मुझे पकड़ के क्या करोगे, असली चोर तो बाहर हैं। मैं तो केवल अपने खाने का इन्तज़ाम कर रहा था।
२। यह शेखचिल्ली की कहानी कहीं पर पढ़ी थी। एक बार शेखचिल्ली ने सोचा कि यदि उन्हें कहीं एक रुपया पड़ा मिल जाये तो दो आने की सिन्नी (प्रसाद) चढ़ायेंगे। भाग्य की बात कि उन्हें एक रुपया पड़ा मिल भी जाता है। भुनाने के लिये पंसारी की दूकान पर गये। पंसारी ने कहा कि सिक्का ज़रा घिसा पिटा है, दो आने बट्टा लगेगा। इस पर शेखचिल्ली बोलेः
"अल्ला मियाँ बड़े सयाने। उपरहि काट लिये दो आने।।"
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...१९ जून २००६
Friday, June 16, 2006
योरप यात्रा पर कुछ विचार
२ जून से १४ जून तक मेरी पत्नी रानी और मैं भारत से आये एक टूर ग्रुप के साथ योरप यात्रा पर थे। इससे सम्बन्धित कुछ विचार व्यक्त कर रहा हूँ।
१। हमारे ग्रुप में एक ढाई साल का बच्चा भी था जो कोच में मेरे पीछे बैठा था। सड़क के किनारे चरती हुई गायों को दिखा कर मैंने कहा कि, "बेटे, इन गायों को देखो।" बच्चे ने कहा, " अंकल, ये गायें नहीं, काउज़ हैं।" यह छोटा सा सम्वाद भारतीय मध्य वर्ग के लोगों की इस समस्या पर प्रकाश डालता है कि बच्चों को कैसी शिक्षा दी जाये। एक तरफ तो वे चाहते हैं कि बच्चा हिन्दी बोले किन्तु दूसरी तरफ वे बच्चे को प्रारम्भ से ही अंग्रेज़ी भी सिखाना चाहते हैं जिससे बच्चा अंग्रेज़ी माध्यम के विद्यालयों में और बच्चों से पीछे न रह जाये। इस लिये उसे सारे जानवरों के नाम केवल अंग्रेज़ी में सिखाये जा रहे हैं। इसी तरह गिनती और वर्णमाला केवल अंग्रेज़ी में सिखाई जा रही है।
२। यह देख कर प्रसन्नता हुई कि स्विस आल्प्स पर चढ़ने के लिये जब हमने केबल कार ली तो एक स्टेशन पर हिदायतें हिन्दी में भी लिखी थीं। रोम के त्रेवी फव्वारे पर- एक सहयात्री ने मुझे बताया- कि फोन बूथ पर हिदायतें हिन्दी में भी लिखी थीं।
३। पेरिस बहुत गरम था। सहयात्रियों ने कहा कि बहुत कुछ दिल्ली की तरह है। तापमान ३६ सेल्सिअस तक पहुँचा। टूर मैनेज़र की सिफा़रिश पर पेरिस में लीडो नाम का शो देखने गये जिसका शुल्क ९९ यूरो प्रति व्यक्ति था। हमें बताया गया था कि यह नृत्य, संगीत, नट विद्या (acrobatics) आदि का तमाशा है। शो के प्रारम्भ में एक नर्तकी किसी तरीके के एलेक्ट्रानिक झूले में फ़र कोट पहन कर आयी। आते ही उसने अपना कोट उतारा और हमने उसके उन्मीलित उरोजों और नितम्बों का दर्शन किया। फिर २०-२५ सहनर्तकियाँ आयीं, मिलती जुलती वेष-भूषा में। सहनर्तक भी थे किन्तु उन्होंने पूरे कपड़े पहन रखे थे। नर्तकियाँ पूरी नंगी नहीं थीं, उनके गुप्तांग (उरोज नहीं) एक मोटे धागे से ढके हुये थे। बाद में मैंने टूर मैनेज़र को बताया कि इतने सारे उरोज (boobs) मैंने कभी एक साथ नही देखे थे। एक स्किट में धरातल से खजुराहो के मन्दिरों जैसा एक दृश्य उठा जिसमें नग्न देवी देवताओं (मूर्तियाँ नहीं जीवित) का चित्रण था। इसके पश्चात एक स्किट आयी जिसमें भारतीय तरीके के संगीत के साथ चार हाथों वाली उन्मीलित उरोजों और नितम्बों वाली देवियों ने नृत्य किया। उनके साथ हाथी की सूँड़ वाले नग्नप्राय कई एक गणेश भी नृत्य कर रहे थे। मैं सोच रहा था कि यदि विश्व हिन्दू परिषद वाले वहाँ होते तो क्या होता। दर्शकों में भारतीयों की बहुलता थी इस लिये सम्भव हो कि ये स्किटें केवल हम लोगों के लिये जोड़ी गयीं हों। हमारे आगमन पर नमस्ते के साथ हमारा स्वागत किया गया था और जाने पर शुक्रिया भी बोला गया था।
४। हमारे ग्रुप में तीन बंगाली दम्पति थे। अवश्य ही यह संयोग की बात है कि इन छै व्यक्तियों में से पाँच बहुत ही उजड्ड थे। पंक्ति में औरों के आगे लग जाना, रेस्टोरेन्ट के बाथ रूम में अधिक समय लगाना जब बहुत सारे लोग प्रतीक्षा कर रहे हों, धक्का लगाना आदि, आदि। मुझे खेद है कि मेरे धैर्य का बाँध टूट जाने के बाद टूर के आखिरी दिन इनमें से एक सज्जन को कुछ कटु वचन कह कर मैंने अपनी उजड्डता का परिचय दिया।
५। मेरे दोनों घुटनों में वात रोग ( arthritis) है इस लिये मैं एक छड़ी लेकर गया था जिससे सीढ़ियाँ इत्यादि चढ़ने में सहूलियत हो। शायद पाठकों में कुछ लोगों को रीतिकालीन कवि केशवदास का यह दोहा मालूम होः
“केशव केशनि असि करी, जस अरिहू न कराहिं।
चन्द्र वदनि मृग लोचनी, बाबा कहि कहि जाहिं।।“
(Keshav says that what his hair has done to him even one'e enemies don't; moon-faced, doe-eyed beauties call me grandpa and move away.)
इस से प्रेरित एक छोटी सी कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ:
“दोस्तो, यह है मेरी छड़ी
मुहब्बत है मुझको इससे बड़ी
दूर दूर का रास्ता तय कराती है
घटाने से घट और बढ़ाने से बढ़ जाती है
इस लिये यह मुझे बहुत भाती है
लेकिन क्या अज़ब दुश्मनी निभाती है
इसको देख कर देश देश की सलोनी सुन्दरियाँ
वृद्ध समझ कर दूर हट जाती हैं।"
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...१६ जून २००६
१। हमारे ग्रुप में एक ढाई साल का बच्चा भी था जो कोच में मेरे पीछे बैठा था। सड़क के किनारे चरती हुई गायों को दिखा कर मैंने कहा कि, "बेटे, इन गायों को देखो।" बच्चे ने कहा, " अंकल, ये गायें नहीं, काउज़ हैं।" यह छोटा सा सम्वाद भारतीय मध्य वर्ग के लोगों की इस समस्या पर प्रकाश डालता है कि बच्चों को कैसी शिक्षा दी जाये। एक तरफ तो वे चाहते हैं कि बच्चा हिन्दी बोले किन्तु दूसरी तरफ वे बच्चे को प्रारम्भ से ही अंग्रेज़ी भी सिखाना चाहते हैं जिससे बच्चा अंग्रेज़ी माध्यम के विद्यालयों में और बच्चों से पीछे न रह जाये। इस लिये उसे सारे जानवरों के नाम केवल अंग्रेज़ी में सिखाये जा रहे हैं। इसी तरह गिनती और वर्णमाला केवल अंग्रेज़ी में सिखाई जा रही है।
२। यह देख कर प्रसन्नता हुई कि स्विस आल्प्स पर चढ़ने के लिये जब हमने केबल कार ली तो एक स्टेशन पर हिदायतें हिन्दी में भी लिखी थीं। रोम के त्रेवी फव्वारे पर- एक सहयात्री ने मुझे बताया- कि फोन बूथ पर हिदायतें हिन्दी में भी लिखी थीं।
३। पेरिस बहुत गरम था। सहयात्रियों ने कहा कि बहुत कुछ दिल्ली की तरह है। तापमान ३६ सेल्सिअस तक पहुँचा। टूर मैनेज़र की सिफा़रिश पर पेरिस में लीडो नाम का शो देखने गये जिसका शुल्क ९९ यूरो प्रति व्यक्ति था। हमें बताया गया था कि यह नृत्य, संगीत, नट विद्या (acrobatics) आदि का तमाशा है। शो के प्रारम्भ में एक नर्तकी किसी तरीके के एलेक्ट्रानिक झूले में फ़र कोट पहन कर आयी। आते ही उसने अपना कोट उतारा और हमने उसके उन्मीलित उरोजों और नितम्बों का दर्शन किया। फिर २०-२५ सहनर्तकियाँ आयीं, मिलती जुलती वेष-भूषा में। सहनर्तक भी थे किन्तु उन्होंने पूरे कपड़े पहन रखे थे। नर्तकियाँ पूरी नंगी नहीं थीं, उनके गुप्तांग (उरोज नहीं) एक मोटे धागे से ढके हुये थे। बाद में मैंने टूर मैनेज़र को बताया कि इतने सारे उरोज (boobs) मैंने कभी एक साथ नही देखे थे। एक स्किट में धरातल से खजुराहो के मन्दिरों जैसा एक दृश्य उठा जिसमें नग्न देवी देवताओं (मूर्तियाँ नहीं जीवित) का चित्रण था। इसके पश्चात एक स्किट आयी जिसमें भारतीय तरीके के संगीत के साथ चार हाथों वाली उन्मीलित उरोजों और नितम्बों वाली देवियों ने नृत्य किया। उनके साथ हाथी की सूँड़ वाले नग्नप्राय कई एक गणेश भी नृत्य कर रहे थे। मैं सोच रहा था कि यदि विश्व हिन्दू परिषद वाले वहाँ होते तो क्या होता। दर्शकों में भारतीयों की बहुलता थी इस लिये सम्भव हो कि ये स्किटें केवल हम लोगों के लिये जोड़ी गयीं हों। हमारे आगमन पर नमस्ते के साथ हमारा स्वागत किया गया था और जाने पर शुक्रिया भी बोला गया था।
४। हमारे ग्रुप में तीन बंगाली दम्पति थे। अवश्य ही यह संयोग की बात है कि इन छै व्यक्तियों में से पाँच बहुत ही उजड्ड थे। पंक्ति में औरों के आगे लग जाना, रेस्टोरेन्ट के बाथ रूम में अधिक समय लगाना जब बहुत सारे लोग प्रतीक्षा कर रहे हों, धक्का लगाना आदि, आदि। मुझे खेद है कि मेरे धैर्य का बाँध टूट जाने के बाद टूर के आखिरी दिन इनमें से एक सज्जन को कुछ कटु वचन कह कर मैंने अपनी उजड्डता का परिचय दिया।
५। मेरे दोनों घुटनों में वात रोग ( arthritis) है इस लिये मैं एक छड़ी लेकर गया था जिससे सीढ़ियाँ इत्यादि चढ़ने में सहूलियत हो। शायद पाठकों में कुछ लोगों को रीतिकालीन कवि केशवदास का यह दोहा मालूम होः
“केशव केशनि असि करी, जस अरिहू न कराहिं।
चन्द्र वदनि मृग लोचनी, बाबा कहि कहि जाहिं।।“
(Keshav says that what his hair has done to him even one'e enemies don't; moon-faced, doe-eyed beauties call me grandpa and move away.)
इस से प्रेरित एक छोटी सी कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ:
“दोस्तो, यह है मेरी छड़ी
मुहब्बत है मुझको इससे बड़ी
दूर दूर का रास्ता तय कराती है
घटाने से घट और बढ़ाने से बढ़ जाती है
इस लिये यह मुझे बहुत भाती है
लेकिन क्या अज़ब दुश्मनी निभाती है
इसको देख कर देश देश की सलोनी सुन्दरियाँ
वृद्ध समझ कर दूर हट जाती हैं।"
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...१६ जून २००६
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