Thursday, April 27, 2006

टेसू , वभ्रुवाहन और आल्हा

प्रतीक पान्डेय जी के सौजन्य से टेसू के बारे में बहुमूल्य जानकारी हासिल हुई। निम्नलिखित कड़ी में श्री मुश्ताक खाँ का टेसू और साँझी (झाँझी या झोंझिया) के बारे में विस्तृत निबन्ध हैः

http://tdil.mit.gov.in/coilnet/ignca/tesu0001.htm

प्रतीक जी का ब्लोग हैः http://www.hindiblogs.com/hindiblog/

इस निबन्ध में टेसू का तादात्म्य बबराबाहन यानी वभ्रुवाहन से किया गया है। इस बबराबाहन को कुन्ती का पुत्र बताया गया है जो उनके कुँआरेपन में हुआ था। किन्तु तब तो यह कर्ण हुआ। किसी के अनुसार बबराबाहन भीम का पुत्र था किसी राक्षसी से किन्तु वह तो घटोत्कच था। महाभारत के अनुसार वभ्रुवाहन अर्जुन का पुत्र था, नागकन्या उलूपी से। जो पौराणिक कथाओं से परिचित हैं, उन्हें याद होगा कि जब पान्डव इन्द्रप्रस्थ से राज्य करते थे, उन्होंने यह परस्पर इकरार बना रखा था कि जब एक भाई द्रौपदी के पास होगा तब दूसरा भाई वहाँ नहीं जायेगा। यदि वह गया तो उसे १२ माह तक वनवास के लिये जाना पड़ेगा। एक बार जब युधिष्ठिर द्रौपदी के साथ थे, अर्जुन को वहाँ जाना पड़ा। अतयेव अर्जुन को वन जाना पड़ा। वन में वे किसी तरह नागलोक पहुँच गये और राजकुमारी उलूपी से गन्धर्व विवाह किया। अब आप खुद ही सोच सकते हैं कि इस वनवास में अर्जुन को कितने कष्ट उठाने पड़े। अर्जुन के वापस चले जाने के बाद, वभ्रुवाहन का जन्म हुआ। महाभारत युद्ध समाप्त होने के बाद जब युधिष्ठिर ने अश्वमेध यज्ञ किया, यज्ञ का घोड़ा किशी तरह नागलोक पहुँचा जहाँ वभ्रुवाहन ने उसे पकड़ा। अर्जुन उससे पराजित हुए। पता चलने पर कि अर्जुन उसके पिता हैं, वभ्रुवाहन ने यज्ञ में आना स्वीकार किया। आल्हा वालों ने ऊदल को इस वभ्रुवाहन का अवतार माना है और आल्हा को युधिष्ठिर का।

यह तो टेसू की कथा से विषयान्तर हो गया। आब फिर टेसू की तरफ चलते हैं। मुश्ताक खाँ के लेख में टेसू का सम्बन्ध एक लोक-कथा से भी जोड़ा गया है। इस कथा का ताल-मेल टेसू की रश्मों से ज्यादा अच्छा बैठता है। इस कथा के अनुसार एक राक्षस (जिसका नाम टेसू है) एक ब्राह्मण कन्या साँझी (झाँझी, झोंझिया) पर मोहित हो जाता है और उसका हाथ माँगने ब्राह्मण के पास आता है। ब्राह्मण इन्कार तो नहीं कर सकता किन्तु वह तमाम सारी शर्तें रखता है। राक्षस सारी शर्तें मान लेता है, यहाँ तक कि भीख माँगना भी। इसलिये टेसू भीख माँगता है, हर साल। राक्षस का विवाह आधा ही हो पाता है जब ब्राह्मण के बन्धु बान्धव आकर उसे मार देते हैं। इसी लिये कोई लड़की (माँ) अपनी पुत्री (साँझी) का विवाह टेसू से नहीं होने देती है।

पौराणिक कथायें देश काल के अनुसार विभिन्न रूप लेती हैं। उदाहरण की तरह इन्डोनेशिया के मुस्लिम मानते हैं कि शिव जी आदम के बेटे हैं। यहाँ पर इस्लाम के पाँच मूलभूत सिद्धान्त पंच पान्डव कह के जाने जाते हैं।

ज़रा आल्हा की तरफ फिर चलें और कुछ अवतारों की बात करें। लाखन जो कन्नौज के राजा जयचन्द के भतीजे और ऊदल के परम मित्र हैं, पान्डव नकुल के अवतार हैं। दिल्ली के राजा पृथ्वीराज जो महोबे के और आल्हा ऊदल के सख्त विरोधी हैं, दुर्योधन के अवतार हैं। पृथ्वीराज की पुत्री बेला, जिसका विवाह महोबे के राजा परमाल के पुत्र ब्रह्मा से होता है, द्रौपदी का अवतार मानी गई है। बेला के गौने में ऊदल, लाखन और महोबे के सारे वीर योद्धा मारे जाते हैं। इन्ही बेला की तुलना कानपुर निवासी भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के समकालीन प्रतापनारायण मिश्र ने कानपुर से की है और वह भी आल्हा में:

भुइयाँ गइए कानपूर की, माता नाँव न जानौं त्वार।
जग माँ महनामत रचिबे को, दुसरी बेला को अवतार।।

इसी कानपुर के हम हैं और अनूप कुमार शुक्ल "फुरसतिया" (http://hindini.com/fursatiya/?p=125 )
हो सकता है कि इसी लिये हम दोनों को खुराफ़ात ज्यादा सूझती है।

...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...२७ अप्रैल २००६

Tuesday, April 25, 2006

विश्व की मधुशाला

खुली विश्व की मधुशाला है,

जितनी चाहो पी लो यारो।

मोल भाव की नहीं ज़रूरत,

मुफ़्त बँट रही हाला, प्यारो।

पी के मटवाले हो जाओ,

यही मूल्य है इसका यारो।

हर ख़रीददारी में तुम,

पहले मूल्य चुकाते प्यारो।

इस खरीददारी में लेकिन,

पीछे मूल्य चुकाते यारो।

जीने का सुख तभी मिलेगा,

पी के मतवाले हो प्यारो।

जिन्हें न यह मदिरा चढ़ती है,

रोते जन्म बिताते यारो।

बिना पिये जो मतवाले हैं,

साधु सन्त कहलाते प्यारो।

हम दुनियादारों को लेकिन,

मदिरा पीनी पड़ती यारो।

कई फ्लेवरों में आती है,

जीवन की यह मदिरा प्यारो।

कोई बसन्ती, कोई गुलाबी,

लाल रंग की मदिरा प्यारो।

जितनी चाहो, उतनी पी लो,

कभी न घटती मदिरा प्यारो।

नहीं प्रेम से जो पीते हैं,

हाला उन्हें हलाहल यारो।

प्रेम भाव से जो पीते हैं,

अमृत सी हाला है प्यारो।

...लक्ष्मीनारायण गुप्त

...१५ अप्रैल २००६

Sunday, April 23, 2006

टेसू का त्योहार

इस टेसू का टेसू या पलाश के पुष्प से कोई सम्बन्ध नहीं है। यह त्योहार, मुझे ठीक से याद नहीं है, कि कब पड़ता है लेकिन सम्भव है कि दशहरे के आस-पास पड़ता हो। जहाँ तक त्योहारों का सम्बन्ध है यह त्योहार बड़ा विचित्र है। शाम को मनाया जाता है, दिया बत्ती के बाद। गाँव के लड़के कुम्हार के यहाँ से टेसू का पुतला लाते हैं। यह मिट्टी का बना हुआ सफेदी से पुता होता है। इसकी शक्ल सूरत अंग्रेज़ों जैसी है और यह मोढ़े पर बैठा होता है। इसकी टाँगों के बीच में दिया रखने की जगह होती है। इस दिये मे तेल और बत्ती लगा कर, उसे जला कर बच्चे निकलते हैं और गृहस्थों से पैसे की माँग करते हैं गाने गाते हुए। कुछ गाने जो मुझे याद हैं, लिख रहा हूँ:

१। टेसू आये धूम से
टका निकालें सूम से
सूम सूम साले को
आगि लगाओ
सरगै जाय
रंग रंग की लगी खमाचैं
उनमाँ बैठे टेसू राजा
टेसू की दुइ चार मेहरियाँ
दुइ नाचैं दुइ चढैं अटरियाँ
एक के बाँधी घुँघरू
एक के बाँधी डोर
डोर पकड़ के खींच लिया
तो आ गया लिल्ला घोड़

२। टेसू अकर करैं
टेसू मकर करैं
टेसू लई कै टरैं

इस त्योहार में लड़कियाँ भी भाग लेती हैं। वे कुम्हार के यहाँ से एक बर्तन लाती हैं जिसका मुंह खुला होता है और ऊपर एक सकोरा अनाज भर के रखा जाता है। बर्तन के चारों ओर जाली का काम होता है। इस बर्तन के अन्दर एक जलता हुआ तेल का दिया रखा जाता है। इस पात्र को झोंझिया कहते हैं। लड़कियाँ इस बर्तन को ले कर घर घर जाती हैं और माँग करती हैं। लीजिये, इनकी माँगें सुनियेः

मोरि झोंझिया आउर माँगै
चाउर माँगै
माँग भरैं का सेंदुर माँगै
सोरहौ सिंगार माँगै
मोरि झोंझिया चली है
पराग नारे सुअना

यदि कोई शरारती लड़का अपने टेसू को किसी की झोंझिया के चारों तरफ घुमा देता है तो बड़े हंगामे होते हैं क्यों कि इसका मतलब होता है कि टेसू की झोंझिया से शादी हो गई।

यह त्योहार उत्तरप्रदेश के कानपुर, उन्नाव और फतेहपुर ज़िलों में तो मनाया ही जाता है और कहाँ मनाया जाता है, मुझे पता नहीं। मेरी पत्नी लखनऊ से हैंऔर उन्हें इस त्योहार का कोई ज्ञान नहीं है। इसका मूल क्या है, यह भी मुझे पता नहीं। ऐसा नहीं लगता कि इसका कोई धार्मिक महत्व है। हो सकता है कुछ पाठक इन प्रश्नों पर और प्रकाश डाल सकें।

...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...23 अप्रैल २००६

Tuesday, April 18, 2006

धर्मप्रचारक ईसाई

(सत्य कथानक पर आधारित)



भारत से अमरीका आये,

पंडित सूरजभान अवस्थी।

इंजीनियरिंग पढ़ने के हित,

मात पिता से लेकर छुट्टी।

पत्नी थोड़े दिन में आयी,

बच्चे भी आगये साथ में।

चैन अमन की बंशी बजती,

विद्याध्ययन हो रहा साथ में।

इक दिन दरवाज़े पर आया,

धर्मप्रचारक ईसाई।

पंडित जी ने साथ बिठा कर,

उसे खिलायी खीर मिठाई।

धर्मप्रचारक तृप्त हुआ,

फिर पंडित को उपदेश दिया।

बोला पंडित आपके ही हित,

ईसा का बलिदान हुआ।

पंडित बोले, पादरी,

क्या बकते हैं आप?

धर्मप्रचारक ने कहा,

बड़े आपके पाप।

बड़े आपके पाप,

दया ईसा को आयी।

दयाद्रवित हो प्रभु ने,

अपने पर शूली टँगवाई।

पंडित बोले, पादरी,

यह समझायें, मित्तर।

घोर अनर्थ किया ईसा ने,

क्यों यह मुझ पर।

ईसा ने मेरे ऊपर क्यों,

यह महान अन्याय किया?

अपने पापों के हित मरने का,

हक भी मुझसे छीन लिया।

सुन पंडित की बात,

पादरी रह गया हक्का बक्का।

नहीं लिखा था उसकी,

उत्तर पुस्तक में, उत्तर इसका।



...लक्ष्मीनारायण गुप्त

...१७ अप्रैल २००६

Thursday, April 13, 2006

कुछ इधर की कुछ उधर की

एक
बहुत दिन पहले जब मैं छठे दर्जे में पढ़ता था, हर मंगल और शनिश्चर को गाँव में बाज़ार लगता थे। हर बाज़ार के दिन मेरे पिता जी मुझे दो आने देते थे ज़ेबखर्च के लिये। मैं एक आने की आइस्क्रीम और दो पैसे का एक खीरा खरीदता था। इस तरह दो पैसे बच जाते थे। इन पैसों को इकट्ठा कर मैं किताबें खरीदता था। बाज़ार के आखिरी एक कोने पर सड़क के किनारे एक व्यक्ति किताबों की दुकान लगाता था। यहाँ पर किताबें होती थीं जैसेः पहाड़े की पुस्तक, सिनेमा के गाने, संगीत सुल्ताना डाकू, संगीत अमरसिंह राठौर, कान्कुब्ज वंशावली, बारामासा इत्यादि इत्यादि। इस दुकान से मैंने एक पुस्तक खरीदी थी जिसका नाम था "गड़बड़ रामायण"; लेखक थे कोई कुटिलेश। पिता जी ने किताब देख कर डाँट तो लगाई लेकिन जब्त करना भूल गये। यह जैसा शायद आप समझ गये होंगे, रामायण की कुछ चौपाइयों की पैरोडी थी। स्मृति से कुछ उदाहरण दे रहा हूँ:

१। आगे चले बहुरि रघुराई, पाछे लछिमन चना भुँजाई।
राम कहैं हमहूँ का देहू, लछिमन कहैं सिंगट्टा लेहू।

२। कह सुग्रीव सुनहु रघुबीरा, नमक मिलै तो खइये खीरा।

३। कह सुग्रीव नयन भरि बारी, हम कहँ मेटि दीन पटवारी।

दो

जूनिअर हाई स्कूल जहाँ मैं पढ़ता था मेरे गाँव से डेढ़ मील दूर बाज़ार वाले गाँव में था। मैं पैदल स्कूल जाता था। हर मंगल और शनिश्चर को मेरे पिता जी अपनी दुकान बाज़ार लाते थे, बैल गाड़ीपर। हमारी दुकान गाँव की मस्जिद के सामने लगती थी। दुकान से कुछ हट कर एक इमली का पेड़ था जिसके नीचे एक क्रिश्चियन मिशनरी खड़ा होकर हिन्दू धर्म की निंदा और ईसाई धर्म की बड़ाई करता था। यह आदमी यूरोपियन था किन्तु इसे हिन्दू धर्म का अच्छा ज्ञान था। वह ऋषियों के जन्म की कहानिया जैसे कि अगस्त्य मुनि का घड़े से जन्म इत्यादि जानता था और इन कहानियों का उपयोग हिन्दू धर्म की खिल्ली उड़ाने के लिये करता था। कोई उसकी बातों पर कोई खास ध्यान नहीं देता था। हमारी दुकान में वह पिता जी को हिन्दी में लिखे बाइबल के ट्रैक्ट दे जाता था। इन पुस्तकों द्वारा मुझे ईसाई धर्म के बारे में पता चला। जब तक मैं मछलियों और रोटियों की कहानी तक पहुँचा, मैं समझ गया कि ईसाइयों का चमत्कार, वास्तव में चमत्कार होता है और हिन्दुओं का चमत्कार अंधविश्वास।

तीन

कभी कभी जब मैं पूरे दिन पढ़ाई के बाद थका होता था पिता जी के साथ बैलगाड़ी में लौटता था। कभी कभी जब पिता जी मौज में होते थे, कुछ कविता, कहानी, छंद इत्यादि सुनाते थे। प्रस्तुत है एक बानगीः

१। मरै बैल गरियार मरै ओ अड़ियल टट्टू
मरै कर्कशा नारि, मरै ओ खसम निखट्टू
बाम्हन सोइ मरि जाय, हाथ लै मदिरा प्यावै
पुत्र सोई मरि जाय जो कुल को दाग लगावै
बेनियाव राजा मरै तबहिं नींद भरि सोइये
बैताल कहैं विक्रम सुनौ एते मरे न रोइये

२। हाड़न को पिंजरा जो बनो रँग डोरिन ते विधना ने सँवारो
आँखिन की खिरकी जो लगीं मन मन्दिर माँहि बनौ है दुआरो
ताही में आप विराजति हैं सब जानत हैं सब जाननहारो
जान को देत अजान को देत जहान को देत सो तोहूँ को देहैं
का मन सोच करै मन मूरख सोच करै कछु आज न देहैं

३। गंगा जी की महिमा
ब्रह्मा ने बनाई, शिवशंकर पास आई, भागीरथ ने पाई, वाके कुल को निस्तारा है
राम जी नहावैं, ध्यान शंभू जी लगावैं, वेद ब्रह्मा जी बखानैं, ज्ञानपोथी में विचारा है
कहैं भोला अधीन मारैं पापी बीन बीन हाथ में लिये कटारा है
मातु गंगे की धारा है कि पाप काटिबे को आरा है

चार
गर्मियों में तरबूज़ आते थे। हर बाज़ार के दिन मौसम में बाज़ार से पिता जी तरबूज़ ज़रूर लाते थे, टाँकी लगवा के बढ़िया लाल। सभी को गाड़ी लौटने का इन्तज़ार रहता था कि अब तरबूज़ कटेगा। घर के हिस्सों को बच्चों में बाँट दिया जाता था कि कौन कहाँ के बीज उठायेगा। बीजों को सुखा कर छील कर उनका गूदा खाया जाता था या फिर मेरी माँ उनका पाग या लड्डू बनाती थीं।

---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---१३ अप्रैल २००६

Tuesday, April 11, 2006

कभी तो उसने

कभी तो उसने हमारी बात की होगी।

कभी तो आँख उसकी भी रोयी होगी।

सोच कर पुरानी बातों को उसने भी,

साँस लम्बी भरी होगी।

कभी तो हमारी यादों में,

नींद उसकी भी खुली होगी।

लगी है आग दिल में जो,

आँच उस तक गई होगी।

कभी तो मेरे दिल के बवंडर की,

हवा उस तक गई होगी।

कभी तो हमारे ख़्वाबों की,

याद उस ने भी करी होगी।

हम तो जीते हैं बड़ी मुश्किल से,

मुश्किलें उस को भी पड़ी होगी।

देख करके सुनहरी वादियों को,

टीस उस के भी उठी होगी।

उस के क़हक़हों में भी यारो,

झलक इक अश्क की रही होगी।



...लक्ष्मीनारायण गुप्त

...२८ मार्च २००६

Saturday, April 08, 2006

कौन है सबसे सुकुमार

बचपन में मेरी माँ यह कहानी सुनाती थीं। सात सखियाँ हैं जो एक से एक ज्यादा नाज़ुक हैं। उनमें होड़ लगी है कि सब से अधिक सुकुमार कौन है। अब सुनियेः

मैं सुकुआर कि तू सुकुआर
सात सखिन माँ को सुकुआर

पहिल सखी उठि बोली यों:

१। एक रहा पोस्ता का दाना
नौ दिन पीसा दस दिन छाना
सींक बोरि कै चीखी खीर
नौ दिन मरी पेट की पीर

मैं सुकुआर कि तू सुकुआर
सात सखिन माँ को सुकुआर

दुसरि सखी उठि बोली यों:

२। इमली की जड़ ते उड़ी पतंग
ताकी हवा लगी मोरे अंग
जो ना देती झटक किंवार
तो उड़ि जाती कोस हजार

मैं सुकुआर कि तू सुकुआर
सात सखिन माँ को सुकुआर

तिसरि सखी उठि बोली यों:

३। मोरी पड़ोसन कूटे धान
ताकी भनक परी मोरे कान
वे रँड़ियाँ असकै छरीं
कि मोरे हाथन छाला परे

मैं सुकुआर कि तू सुकुआर
सात सखिन माँ को सुकुआर

चौथि सखी उठि बोली यों:

४। सपने पहिरे लहर पट्वार
आधा अंग छीलिगा म्वार

मैं सुकुआर कि तू सुकुआर
सात सखिन माँ को सुकुआर

बाकी तीन सखियों ने क्या कहा, मुझे याद नहीं है। यदि किसी ने यह कहानी सुनी है तो अवश्य लिखें। यह नाज़ुकता का थीम यूनीवर्सल लगता है। बरसों पहले यहाँ अमरीका में एक संगीत-नाटक देखा था, "Once Upon a Mattress." उसमें इक राजकुमारी एक बिस्तरे पर जिसमें १५-२० मैट्रेसें पड़ी हुईं हैं सोती है। उसको रात भर नींद नहीं आ पाती है क्योंकि सबसे नीचे वाली मैट्रेस के नीचे एक मटर का दाना पड़ा हुआ है।

...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...८ अप्रैल २००६

Thursday, April 06, 2006

घाघ-२

डा० जगदीश व्योम जी से मालूम हुआ कि घाघ कन्नौज के पास सराय घाघ नामक एक जगह के रहने वाले थे। सुश्री मंजु भटनागर से कुछ और कहावतों का पता चलाः

उत्तम खेती, मध्यम बान.निषिध चाकरी भीख निदान .(1)

गोबर,मैला, नीम की खली. इनसे खेती दूनी फली. (2)

धान, पान अरू केरा, तीनों पानी के हैं चेरा .(3)

तरकारी है तर-कारी, या में पानी की अधिकारी. (4)

करिया बादर जी डरवावै, भूरा बादर पानी लावै. (5)

मुझे भी दो और कहावतें याद आयीं:

१। कलियुग में दो भगत हैं बैरागी औ ऊँट।
इक तुलसी बन काटहीं, इक कर पीपर ठूँठ।।

पीपर = पीपल

२। साँझै ते परि रहतीं खाट
परी भँड़ेहरि बाराबाट।
घरु आँगन सब घिन घिन होय
घग्घा गहिरे देव डुबोय।।

भँड़ेहरि = घर की वह कोठरी जहाँ पर गृहस्थी का सामान जैसे दाल, चावल, आटा आदि मिट्टी के बर्तनों में रखे जाते हैं।

डा० व्योम और भटनागर जी को धन्यवाद।

...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...६ अप्रैल २००६

Tuesday, April 04, 2006

दिल की बात

दिल की बात दिल में ही रह जाती है,

बात अनकही रह जाती है।

कहना चाहते हैं जब दिल की बात,

ज़बान बन्द सी हो जाती है।

जज़्बात घेरते हैं जब घुमड़ते बादलों जैसे,

आँसुओं की बरसात क्यों हो जाती है?

रिश्ता नहीं है कोई दिल का ज़बान से,

ज़बान में दिल की आवाज़ नहीं आती है।

दिल में जो कसमकस थी वैसी ही है,

अभी भी उसमें ग़ुबार कुछ बाकी हैं।

बाकी हैं ज़िन्दगी के चन्द रोज़ अभी,

दिल की कहने को अभी चन्द रोज़ बाकी हैं।



...लक्ष्मीनारायण गुप्त

...२७ मार्च २००६

Saturday, April 01, 2006

घाघ भड्डरी

घाघ भड्डरी अकबर के समकालीन थे और वर्तमान कानपुर के पास कहीं रहते थे। इनकी मौसम और अन्य विषयों के बारे में कहावतें इस इलाके के ग्रामीण क्षेत्रों में आम लोगों की ज़बान पर होती हैं। इनके जीवन के बारे में मुझे अधिक ज्ञान नहीं है किन्तु इनका दाम्पत्य जीवन अवश्य सुखी रहा होगा जैसा कि निम्नलिखित कहावतों से लगता हैः

१। अरहर की दाल औ जड़हन का भात
गागल निंबुआ औ घिउ तात
सहरस खंड दहिउ जो होय
बाँके नयन परोसैं जोय
कहैं घाघ तब सबही झूठा
उहाँ छाँड़ि इहवैं बैकुन्ठा।

२। ऊँचि अटारी मधुर बतास
कहैं घाघ घर ही कैलाश।

यह भी लगता है कि इनका बाद का जीवन सुखी नहीं था जैसा कि निम्न कविता से लगता हैः

३। इक तो बसैं सड़क पर गाँव
दूजे बड़ेन बड़ेन माँ नाँव
तीजे भये दरब ते हीन
घग्घा ई हैं विपता तीन।

घाघ की मौसम से सम्बन्धित कुछ कहावतें सुनियेः

४। जै दिन जेठ चलै पुरवाई
तै दिन सावन धूरि उड़ाई।

५। सूकबार की बादरी रहै सनीचर छाय
ऐसा बोलै भड्डरी बिन बरसे ना जाय।

६। दिन माँ बादरु राति तरैयाँ
हाय दइउ तुम काह करैयाँ।

घाघ ने विभिन्न जातियों के बारे में भी विचार व्यक्त किये हैं। आज की बोली में उन्हें equal opportunity offender कहेंगे। कुछ बानगी लीजियेः

७। घाघ बात अपने मन गुनहीं
ठाकुर भगत न मूसर धनुहीं।

८। आंबा नींबू बानिया गर दाबै रस देंय
कायथ कूकुर कट्टहा मुर्दाहूँ से लेंय।
( कट्टहा महापात्र ब्राह्मण को कहते हैं जो मरघट में मुर्दा जलाने के पहले दान लेता है।)

९। बाम्हन कुत्ता हाथी
ई नहीं जाति के साथी।

१०। ई दुनिया माँ तीन कसाई
खटमल पिस्सू बाम्हन भाई।

११। जौ अहीर पिंगल पढ़ै तऊ तीन गुन हीन
बोलिबो, उठिबो, बैठिबो लियो विधाता छीन।

घाघ स्वयं जाति के ब्राह्मण थे।

इस कहावत में बताया गया है कि अच्छे बैल के क्या गुण हैं:

१२। नीला कंधा, बैंगन खुरा
कबहुँ न निकरै बर्धा बुरा।
और अब यह भी सुनियेः
१३। सुथना पहिरे हर ज्वातें औ पौला पहिन निरावैं
कहैं घाघ ई तीनौं भकुआ सर बोझा औ गावैं।
सुथना पैजामे का दूसरा नाम है। हर हल का अपभ्रंश है जिससे ज़मीन जोती जाती है। पौला क्या है, मुझे नहीं पता। निराने का मतलब फसल की weeding से है।

अब निम्न कहावत का आनन्द लीजिये और इसी के साथ यह लघु निबंध समाप्त होता हैः

१४। बिन बेसन के घोरैं कढ़ी
बिन बैलन के जोतैं लढ़ी
बिन भैयन के जूझैं जंग
बिन मिर्चन के घोरें भंग
न उनके कढ़ी
न उनके लढ़ी
न उनके जंग
न उनके भंग।

उम्मीद है कि पाठकों ने इस होली पर कुछ भंग पी होगी यदि असली नहीं तो कविता की ही सही। अरे भाई, बच्चन जी ने पूरी मधुशाला लिख डाली लेकिन वे tea-totaller थे।

Disclaimer: यह सब उद्धरण स्मृति से लिये हैं इसलिये ग़लतियाँ हो सकती हैं। जिन कविताओं में घाघ का नाम नहीं है वे किसी और की भी हो सकती हैं।

Acknowledgement: बचपन में अपने बड़े भाई (जो उस समय इंटर में थे और मैं चौथी में) की एक हिन्दी की सहायक पुस्तक "कानपुर के कवि" पढ़ी थी। उस पुस्तक में घाघ कवि के ऊपर एक अध्याय था। मेरा घाघ के बारे में जो ज्ञान है उसी पुस्तक से है। यह पुस्तक अब मेरे पास नहीं है। जो कुछ लिखा है स्मृति से लिखा है।

...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...१ अप्रैल २००६