Tuesday, March 28, 2006

अतिथि सत्कार का माहात्म्य

(सत्या और ज्योत्सना मेरे परम मित्र हैं। एक बार ज्योत्स्ना के यहाँ मेहमानों का ताँता लगा हुआ था। उनका हौसला बढ़ाने के लिये यह कविता आल्हा-छंद में लिखी थी।)

एक न जावै, दूजो आवै,
तिसरो दहरी पर मँड़राय।
देख के गत ये महमानों की,
ज्योत्स्ना गईं सनाका खाय।
सत्या ने जब यह गत देखी,
चाय का पानी दिया चढ़ाय।
चाय पिलाके कानपूर की,
पान बनारसी दिया खिलाय।
ज्योत्स्ना में तब फुर्ती आई,
औ रग रग में गई समाय।
उठीं तड़क्के गजरदम्ब वो,
सैकड़ों मठरी दईं बनाय।
पाँच तरह की बनी मिठाई,
षट रस व्यंजन की भरमार।
घड़ी न बीती न पल गुजरा,
सब पकवान हुये तय्यार।
खाना खाया मेहमानों ने,
कीरत जर्सी तक हो जाय।
कीरत फैली देश देश में,
सब कोई रेसिपी रहे मँगाय।
सत्या कम्प्यूटर पर बैठे,
सारे रेसिपी दिये छपाय।
देस्कटाप से हुआ प्रकाशन,
पुस्तक देश देश बिक जाय।
ऐसी बिक्री भारी होगई,
दोनों मालामाल होइ जाँय।
अतिथि देवता की पूजा का,
भारी महातम दियो सुनाय।
इस आल्हा को सुनै प्रेम से,
उसका भाग्य तुरत खुल जाय।

लक्ष्मीनारायण गुप्त

Saturday, March 25, 2006

एक लोक गीत

बचपन में मेरी माँ ने यह गीत सुनाया था। कल्पना करिये कि सड़क पर एक मेढकी बैठी है और उसकी तरफ एक हाथी तेजी से आ रहा है। सड़क के किनारे एक बबूल का पेड़ है जिस पर एक गिरगिट बैठा है। इन पात्रों के बीच यह सम्वाद होता हैः

मेढकीः बड़े बड़े कान मलंगत आवैं,
दूरी रहेसु मोह का कचरेसु ना ।
(बड़े बड़े कान हिलाते हुए आने वाले दूर रह, मुझे कुचल नहीं देना)

हाथीः नाक की नकटी, कानन चपटी तू नकटी का कचरै को?
(ये नकटी नाक और चपटे कानों वाली तुझ नकटी को कौन कुचल रहा है?)

मेढकीः बँबुर चढ़े गिरधारी भैया द्याखो का हम नकटी हन?
(बबूल पर चढ़े गिरधारी भैया, देखो क्या मैं नकटी हूँ)

गिरगिटः बैठी रहो तुम राम की भगतिन भकुअन के मुँह लगती हौ?
(ये राम की भक्तिन, तुम (आराम) से बैठो, भकुओं के मुँह क्यों लगती हो?)

अब आप मुझ से पूछेगे कि आप जैसे sophisticated लोगों को मैं यह बच्चों की कहानी क्यों सुना रहा हूँ। तो मै आपको इस के दो applications बताऊँगा। अगर आप नेता हैं तो स्वयं को हाथी, जनता को मेढकी और गिरगिट को पत्रकार मान सकते हैं। अगर आप कवि या लेखक हैं तो स्वयं को हाथी और आलोचकों को मेढकी और गिरगिट मान सकते हैं। यदि आप आलोचक है तो इसका उल्टा कर सकते हैं। ये उदाहरण हैं, बाकी आप स्वयं अपनी कल्पना दौड़ाइये।

लक्ष्मीनारायण गुप्त
२५ मार्च २००६

Thursday, March 23, 2006

दो लघु कवितायें

पाखंड

सोच रहा हूँ मैं हुई, मति मेरी ही मन्द।
या फिर सच है जगत में, बढ़ा बहुत पाखंड।
बढ़ा बहुत पाखंड, झूठ एक कला होगया।
माला जपता पेशकार भी, रिश्वतखोर होगया।
'लक्ष्मीगुप्त' सुजान कहें तुम ऐसा करना।
रिश्वत ज्यादा जब पगार से मिले, नौकरी तब ही करना।

भारतीय गणतंत्र

विद्यमान हैं बहुत से जग में शासन तंत्र।
सबसे अधिक विचित्र पर भारतीय गणतंत्र।
भारतीय गणतंत्र में जातियाँ हुईं अबैध।
क्यों फिर बढ़ता जारहा जाति पाँति का भेद?
आरक्षण से बढ़ रहा जाति पाँति का यंत्र।
रक्षा उसकी कर रहा भारतीय गणतंत्र।

लक्ष्मीनारायण गुप्त

Tuesday, March 21, 2006

अपनी मंजिल

अपनी मंजिल जाने कितनी आगे है।

इस द्रुत गति से जीता जीवन,
साँस न देती साथ देह का,
गति इतनी कि यंत्र मानव है इसमें,
गति अणु युग की मूल मान्यता,
जीवन रस बन गया गरल, न जाने क्या आगे है।
अपनी मंजिल....

मिटता प्यार तनाव सुगम प्रसरित है,
हृदय, हृदय में दूरी है पृथकत्व है,
यह अपनी कृति यंत्र हमें ही मेटती,
सोता विवेक, दे सके कौन गुरु मंत्र है,
जन पदार्थ-मद पीने में कितना आगे है।
अपनी मंजिल....

यंत्रों की धड़ धड़ में जीवन,
होता जाता है यंत्र सदृश,
मानव का मूल्य घिसा जाता,
है कृष्ण पक्ष के चन्द्र सदृश,
शोषण में पोषक ही सबसे आगे है।
अपनी मंजिल....

...सत्यनारायण गुप्त 'कुमुद'

Friday, March 17, 2006

श्रम का गौरव

अमरीका के रहन सहन की महिमा गहरी
मर्द काटते घास, औरतें बन गईं महरी।

बड़े घरों की कन्यायें बैठी रहती थीं जो धरे हाथ पे हाथ
अमरीका में करती हैं वो खुद गराज को साफ।

झाड़ू लगाते थे जिनके घरों में नौकर
वो ही चलाती हैं यहाँ पर वैकुअम क्लीनर।

पति-पत्नी की चाय बनाता था वहाँ पर नौकर
पत्नी की चाय यहाँ बनाता है शौहर।

भारत में जब यात्रा करते थे
चार चार सूटकेस कुली पर लादते थे।

अमरीका में जब जाते परदेस
उठाने पड़ते खुद ही अपने सूटकेस।

अमरीका है यारो बड़ा विचित्र देश
प्लम्बर और डाक्टर की तनख्वाह है एक।

श्रम का गौरव अमरीकी जानते हैं
भारतीय श्रम को श्रद्धांजलि चढ़ाते हैं।

...लक्ष्मीनारायण गुप्त

Monday, March 13, 2006

कुछ शेर

१। प्यार नहीं प्यार का इज़हार ही करिए।
इश्क नहीं इश्क का बहाना ही करिए।
बसर हो जाएगी ज़िन्दगी इस बहाने,
इस बहाने का पर्दाफास न करिए।

२। छलते रहो शौक से जितना चाहो,
बताने की कोई ज़रूरत नहीं है।
यक़ीन गहरा है इस जालसाज़ी पर,
फँसने दो सच की ज़रूरत नहीं है।

३। प्यार नहीं प्यार का वादा कर लो,
धोख़ये मुहब्बत में तनिक इज़ाफा कर लो।
बीत जाएगी अपनी ज़िन्दगी रंगीनी से,
अपने चिलमन का रंग ज़रा और भी गहरा कर लो।

४। काम क्या आयेगी सच्चाई तेरी,
मेरी हसरतों के रंग मिट जायेंगे।
पिलाता रह झूठी मुहब्बत के प्याले,
तेरी महफ़िल में ऐसे कद्रदाँ कब आयेंगे?

५। मेरे मालिक सचाई अपने पास रख ले ले,
मुझे तो चन्द हसीन से धोख़े दे दे।
रात कट जायेगी सहारे धोख़ों के,
अस्लियत तू अपने पास रख ले।

...लक्ष्मीनारायण गुप्त

Thursday, March 09, 2006

अजब उदासी

ये कैसी अजब उदासी है
दिलोदिमाग में जो हावी है

जो हमें प्यार करने की कसम खाते हैं
हमारे अरमानों का ख़ून करते हैं

मारके हमारे जिगर में ख़ंजर
दर्द कैसा है वो पूछते हैं

जो हमारे हर क़दम को ग़लत कहते हैं
वो ख़ाक हमसे प्यार करते हैं

जिनकी हर अदा में बेवफ़ाई है
बदक़िस्मती, लौ उन से ही लगाई है

या खुदा होगा क्या इसका अंजाम
सोचते हैं हम सुबह और शाम

...लक्ष्मीनारायण गुप्त

Tuesday, March 07, 2006

होली त्यौहार है

होली त्यौहार है जीवन और जीने का
होली त्यौहार है देवाधिदेव का
भोलेनाथ हैं जो उन महादेव का
भाँग की मस्ती का, ठंडाई की चुस्की का
हास परिहास का, आमोद प्रमोद का

होली त्यौहार है राग और रंग का
अबीर गुलाल का, मेल मिलाप का
व्यंग्य विनोद का, केलि किलोल का

होली त्यौहार है अनाज की बालियों का
उपलों की माला का, गुड़ की गोझियों का

होली त्यौहार है प्रह्लाद और विष्णु का
होलिकादहन का, हिरण्यकसिपु मर्दन का
दुष्टों के दलन और भक्तों के रक्षण का

होली त्यौहार है शिव और शक्ति का
प्रियतम और प्रियतमा के मधुर मिलन का
लास का, नृत्य का, परम रहस्य का

होली त्यौहार है कान्हा और राधा का
बरसाने के रास में नाचती गोपियों का

होली त्यौहार है जन साधारण का
मानवों और देवों का, भूत पिशाचों का
जवानी के जोश का, मद की मदहोशी का
मोहन की मुरली का, शंकर के डमरू का
फागुन के फागों का, वसन्त बयार का

होली त्यौहार है जीवन और जीने का

...लक्ष्मीनारायण गुप्त

Saturday, March 04, 2006

प्रभु का अधुनातन (up-to-date) सन्देश गोपियों के प्रति

(यह एक व्यंग्य कविता है। मेरा अभिप्राय किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं है।)

ऊधव बोले, गोपियो, प्रभु अब रासलीला
नहीं, राकलीला करते हैं।
नाचते, गाते और गिटार बजाते हैं।
उनकी सहचरियाँ अब गोपी नहीं
ग्रुपी कहलाती हैं।
स्वेच्छा से प्रभु के पड़ाव पर आती हैं
और अपना तन मन समर्पित कर जाती हैं।
ये निःस्वार्थ प्रेमिकायें और
किसी चीज़ की अपेक्षा नहीं करती हैं।
प्रभु का सन्देश है, गोपियो, कि यह
पुराना मामला अब सेटल ही कर लो।
फूटी हुई मटकियों के बदले में
कार्निंग का उत्तम वेयर ले लो।
माखन जो मैंने चुराया था,
उसकी एवज़ में अमुल के जितने चाहो
उतने शेयर ले लो।
मथुरा से मैं बम्बई आगया था
जो द्वारका के पास है
फिर लन्दन में और अब
न्यू यार्क में निवास है
ब्रज में आने का नहीं
मुझको अवकास है।
मेरी मानो गोपियो अब
ऐसा कर लो,
लालू, मुलायम, शरद जैसे
स्वजातीय बन्धुओं से
मित्रता कर लो, उन्हीं से मेरे आशीर्वाद
के साथ जनता की सेवा
के बहाने सारी प्रभुता पा लो।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त

Thursday, March 02, 2006

आशा के स्नेहिल बन्धन

सोचा करता दिवस रैन क्यों मैं ने तुम से प्यार किया था,
क्यों सस्मित अपने अन्तर की शान्ति तुम्हीं पर वार दिया था,
तुम न मिलीं थी सुख था तब अब मिलन मुझे दुख मूल बन गया,
हा परिवर्तन प्रणय सिंधु का पंकज मुझको शूल बन गया,
स्मृति के क्षण विकल वेदनाओं का स्रजन किया करते।
आशा के स्नेहिल बन्धन ही संघर्षों को जन्म दिया करते।

दोष स्वयं को दूँ या तुमको जिसने मुझको प्यार सिखाया,
प्रबल प्रीति के आकर्षण से मुझको अपने निकट बुलाया,
यद्यपि जल मिस तव नेत्रों में प्रकट विरह आख्यान अँका था,
पढ़ न सका था मैं अन्तर में मिलने का अरमान घना था,
आत्म विस्मरण के क्षण विरहा के कण सँजो लिया करते।
आशा के....

जलती मरु पर जल की आशा मम मन मृग को है भरमाती,
मृग मरीचिका रेख कुरँग को लक्ष्मण चाप रेख बन जाती,
चलता जाता हाँफ हाँफ कर गिरता पुनः सँभलता जाता,
जी भर पीने की आशा से जीवन भर प्यासा रह जाता,
आशा भरे भाव अन्तर के जीवन भर आँसू बन ढरते।
आशा के....

मृग को जल से प्यार मुझे है तुमसे प्यारे,
एक जनम की याद अभी तक हूँ उर धारे,
जीवन की सुनसान डगर में डग मग पग थर्राते,
चला आ रहा हूँ शूलों पर मैं हँसते मुस्काते,
इसी आश से पुष्प सदा शूलों के मध्य बसा करते।
आशा के स्नेहिल बन्धन ही संघर्षों को जन्म दिया करते।

....सत्यनारायण गुप्त 'कुमुद'

Wednesday, March 01, 2006

मिट गए

जो कभी अपने नहीं थे
वे पराए हो गए।
आँख खुलते ही
हमारे ख़्वाब सारे मिट गए।

आँख खुलते ही
हमारे भरम सारे मिट गए।
लुत्फ़ जो थे ज़िन्दगी के
वे अचानक मिट गए।

हम तो सोते ही भले थे
जागने से क्या मिला?
ख़्वाब का मंज़र सुघर था
समझते थे अस्ल था।

अस्लियत मालुम हुई
अरमान सारे मिट गए।
तुमको क्या मालूम कि
हम अस्लियत में मिट गए?

...लक्ष्मीनारायण गुप्त

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