अतिथि सत्कार का माहात्म्य
(सत्या और ज्योत्सना मेरे परम मित्र हैं। एक बार ज्योत्स्ना के यहाँ मेहमानों का ताँता लगा हुआ था। उनका हौसला बढ़ाने के लिये यह कविता आल्हा-छंद में लिखी थी।)
एक न जावै, दूजो आवै,
तिसरो दहरी पर मँड़राय।
देख के गत ये महमानों की,
ज्योत्स्ना गईं सनाका खाय।
सत्या ने जब यह गत देखी,
चाय का पानी दिया चढ़ाय।
चाय पिलाके कानपूर की,
पान बनारसी दिया खिलाय।
ज्योत्स्ना में तब फुर्ती आई,
औ रग रग में गई समाय।
उठीं तड़क्के गजरदम्ब वो,
सैकड़ों मठरी दईं बनाय।
पाँच तरह की बनी मिठाई,
षट रस व्यंजन की भरमार।
घड़ी न बीती न पल गुजरा,
सब पकवान हुये तय्यार।
खाना खाया मेहमानों ने,
कीरत जर्सी तक हो जाय।
कीरत फैली देश देश में,
सब कोई रेसिपी रहे मँगाय।
सत्या कम्प्यूटर पर बैठे,
सारे रेसिपी दिये छपाय।
देस्कटाप से हुआ प्रकाशन,
पुस्तक देश देश बिक जाय।
ऐसी बिक्री भारी होगई,
दोनों मालामाल होइ जाँय।
अतिथि देवता की पूजा का,
भारी महातम दियो सुनाय।
इस आल्हा को सुनै प्रेम से,
उसका भाग्य तुरत खुल जाय।
लक्ष्मीनारायण गुप्त



