Tuesday, February 28, 2006

अनुभूतियों के सन्दर्भ

जीवन के प्रवाह में अनुभूतियों के
सन्दर्भ खो जाते हैं।
सन्दर्भ के सम्बल से पली अनुभूतियाँ
सन्दर्भरहित होकर तिरोहित हो जाती हैं,
शरद ऋतु के बादलों की तरह।
छोड़ जाती हैं केवल
कसकें, मुस्कानें खट्टी और मीठी।
छूट जाती हैं फिर कसकें और मुस्कानें भी,
रह जाती हैं केवल उनकी स्मृतियाँ।
स्मृतियाँ भी फिर खो जाती हैं,
रह जाती है केवल स्मृतियों की स्मृति।
अन्ततः रह जाती है केवल एक खटक,
एक अभाव कि कुछ खो गया है।

...लक्ष्मीनारायण गुप्त

Sunday, February 26, 2006

कितना जटिल

कितना जटिल हुआ जाता है,
अब जीवन का ताना बाना।
कितनी विघटन की पवृत्तियाँ,
जन जन अन्तर में जागी हैं,
आज हमारे परिवारों में,
प्रचलित विघटन परिपाटी है,
केवल स्वार्थ, शक्ति जीवित हैं,
है सब का जाना पहिचाना।
कितना•••।

सब स्वतंत्र हो परम निरंकुश,
वैभव की इस दौड़भाग में,
हाँफ हाँफ कर जिये जा रहे,
विस्मय की इस धूप छाँव में,
द्वेषबिन्दुओं से भीगा है,
जन जीवन का ताना बाना।
कितना•••।

स्वार्थ अलंकृत मानव मन पर,
छाये भौतिकता के बादल,
ये पदार्थ के खल अन्वेषण,
झनकायें शंकर की पायल,
कितनी ज्वाल भरे जाता है,
यह अणु युग का अश्वत्थामा।
कितना•••।

सत्यनारायण गुप्त ‘कुमुद’

(यह कई साल पुरानी कविता मेरे बड़े भाई सत्यनारायण गुप्त 'कुमुद' की लिखी हुई है। वे अवकाशप्राप्त हैं और बहराइच में निवास करते हैं।)

Thursday, February 23, 2006

मुर्गों का ज़ुकाम

कुछ मुर्गों को ज़ुकाम की बीमारी क्या हुई।
कोटि कोटि कुक्कुटों के जीवन की सामत आगई।।

मुर्गों का ज़ुकाम कहीं लोगों को न हो जाए।
सरकारी मंत्री यह सोच कर घबड़ाए।।

जारी हुआ फिर यह भीषण फरमान।
मुर्गारहित मुल्क को करने का दारुण अभियान।।

प्राचीन काल में परसुराम ने किया था महि को क्षत्रियरहित।
सरकार करेगी इस मुल्क को मुर्गारहित।।

हाय गए सब चिकेन करी, टिक्का तन्दूरी।
मुर्गमुसल्लम के बिना ज़िन्दगी हुई अधूरी।।

आमलेट के साथ भी करते हम सन्तोष।
लेकिन अब वह भी नहीं, कैसे हो परितोष।।

भारत ने इस विश्व को दिये बहुत उपहार।
मुर्गा उनमें एक है, पंडित कहें विचार।।

इस मुर्गारहित मुल्क में क्यों विकल रागिनी बजती।
मुर्गापालक के दिल में वेदना असीम गरजती।। (प्रसाद जी की आत्मा मेरी धृष्टता माफ करे)

इक दिन फिर मुर्गों का ज़माना आएगा। (बालीवुड ट्यून)
कुकड़ूँकूँ के नाद से नभमण्डल छाएगा।।

पश्चिम भारत का पुराना ऋण अवश्य चुकाएगा।
कुछ विलायती मुर्गे भारत भिजवाएगा।।

देशी मुर्गों का वलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा।
देश का हर मुर्गा विलायती हो जाएगा।।

(जैसे पहले He में She शामिल होता था वैसे ही मुर्गे में मुर्गी शामिल समझें।)

...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...२३ फरवरी २००६

Sunday, February 19, 2006

चमचागीरी

राजनैतिक चमचागीरी

एक नेता हैं, बीसियों चमचे हैं
जो कहते हैं कि आपसे बड़ा
नेता, विचारक या सुधारक
न कभी हुआ है, न होगा।
नेता खुश होते हैं
चमचे घूस का साधन करते हैं
नेता को जनता से घूस मिलती है
चमचों को पद मिलते हैं
जनता का काम होता है
इसी को तो सर्वोदय कहते हैं।

साहित्यिक चमचागीरीः
दो कवि मिलते हैं
किसी में कोई खास प्रतिभा नहीं है।
एक दूसरे की वर्जिश करते हैं
पीठ सहलाते हैं।
पहला दूसरे की प्रशंसा में
दो पृष्ठ का लेख लिखता है।
कुछ महीने बाद दूसरा पहले की
प्रशस्ति में चार पृष्ठ का
लेख प्रकाशित करता है।
अब प्रकाशक सोचते हैं
कि अरे हमने गलती की
इन महान प्रतिभाओं को
न पहचान के।
फिर क्या दो फिसड्डी कवि
महाकवि बन जाते हैं।

लक्ष्मीनारायण गुप्त
जनवरी २००६

Thursday, February 16, 2006

परमात्मा

परमात्मा फैला है ओस की बूँदों पर,
वही है डाल पर बैठा हुआ पंछी।
वही है मानव हृदय की करुणा,
रसिकों का रस और नवशिशु की हँसी।
बिराजता है वही कदम्ब की छाया में,
राधा की राह में बजाता हुआ बंशी।
ढूँढ़ रहे थे तुम जिसे मन्दिर की प्रतिमा में,
भिखारी बन द्वार पर बैठा था वही।
रामेश्वरम के लिये जो पानी था काँवर में,
नामदेव ने पिलाया था तड़पते गधे को वही।
सहयात्रियों के विरोध पर बताया था,
प्यासा था ईश्वर गधे के रूप में यहीं।
प्रतिमा जीवन्त होती है प्राणप्रतिष्ठा से,
जीवित को प्राणप्रतिष्ठा की ज़रूरत नहीं।
पूजते जो प्रतिमा को, ठुकरा कर जीवित को,
पायेंगे कैसे परमात्मा को कभी?
पाया है जिसको युग युग में सन्तों ने,
कण कण में, घट घट में, परमात्मा वही।

...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...१९ जनवरी २००६

Saturday, February 11, 2006

कचरे में हीरा

कभी कभी कचरे के अन्दर हीरा मिल जाता है, मित्रो।
कभी कभी गुदड़ी के अन्दर लाल सिला होता है, मित्रो।
दु:ख भरे जीवन के अन्दर सुख की भी घड़ियाँ आती हैं,
बिना दु:ख के उन घड़ियों का स्वाद नहीं आता है, मित्रो।
अन्धकार से भरे भवन में दीपशिखा जब आ जाती है,
तब प्रकाश की एक किरण से, अन्धकार कटता है, मित्रो।
काली काली रात अँधेरी जब आती है,
तभी प्रेमियों के मिलने का अवसर आ पाता है, मित्रो।
काले बादल आसमान में जब छाते हैं,
कभी कभी उनके पीछे ही चाँद छिपा होता है, मित्रो।
जब गहरे बादल आते हैं, गरज गरज कर छा जाते हैं,
विद्युत का प्रकाश तब सहसा चकाचौंध करता है, मित्रो।
हम तलाश करते रहते, जीवन भर जिसकी,
वही हमारे दिल के अन्दर छिपा हुआ मिलता है, मित्रो।

...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...१३ जनवरी २००६

Tuesday, February 07, 2006

प्रेमिका के गुण

प्रत्यक्षा,

आपका हुक्म सर आँखों पर। तो ये हैं आठ गुण जो मेरी प्रेमिका में होने आवश्यक हैं:

१। ना काली हो ना गोरी हो, मेरी बीवी के रंग वाली हो।
२। ना मोटी हो ना पतली हो, बस संतुलित तनु वाली हो।
३। ना नाटी हो ना लम्बी हो, मेरी बीवी के कद वाली हो।
४। ना गरीब हो ना अमीर हो, बस खाते पीते घर वाली हो।
५। बातूनी हो, न चुप्प रहे, बस ठीक बोलने वाली हो।
६। उलझन में डाले नहीं मुझे, वह सुलझे दिमाग वाली हो।
७। मैं प्रेम करूँ केवल उससे, मेरे इश्क में वह मतवाली हो।
८। ग़र बात सही अब सुननी हो, वह मेरी ही घर वाली हो।

अब आठ लोग टैग करने के लिये कहाँ से लाऊँ; सब तो टैग हो चुके। Sorry.

लक्ष्मी

Saturday, February 04, 2006

बुला के देखो

इस दीन दुनिया को छोड़ कर तुम,
पुरानी रस्में तोड़ के देखो।
ये जो पुरानी रूढ़ियाँ हैं,
तुम्हारे पैरों की बेड़ियाँ हैं।
इन बेड़ियों को कुछ ढीला करके,
खुली हवा में साँस ले के देखो।
निकल के ऊँची इमारतों से,
कभी तो मेड़ों पर चल के देखो।
छोड़ कर के कागज़ी गुलों को,
असल फूल को कभी छू के तो देखो।
छोड़ कर के पुरानी आदत,
कभी लीक से हट के चल के देखो।
कभी तो बिजली की रोशनी से,
तुम चाँदनी में जा कर तो देखो।
कभी परम्परा को तोड़ कर तुम,
खुद अपना रास्ता बना के देखो।
उठा रखा है सर पर जो तुमने,
ये जो दुनिया का बोझ सारा,
कभी पटक गर गिरा दो इसको,
ये बोझ हल्का कर के तो देखो।
कभी तो थोड़ा मुस्कराओ,
गगन है अपना, उठ कर तो देखो।
शहर की गलियों से दूर जाकर,
कभी पहाड़ों पर चढ़ के तो देखो।
कभी तो प्रिय के नयनों में प्यारे,
तुम भी तो नयना लगा के देखो।
कभी तो अपनी बीरानगी में,
सुहाने सपने सँजो के देखो।
बहार आयेगी फिर ज़िन्दगी में,
तुम उसको थोड़ा बुला के देखो।

...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...४ फरवरी २००६