अनुभूतियों के सन्दर्भ
जीवन के प्रवाह में अनुभूतियों के
सन्दर्भ खो जाते हैं।
सन्दर्भ के सम्बल से पली अनुभूतियाँ
सन्दर्भरहित होकर तिरोहित हो जाती हैं,
शरद ऋतु के बादलों की तरह।
छोड़ जाती हैं केवल
कसकें, मुस्कानें खट्टी और मीठी।
छूट जाती हैं फिर कसकें और मुस्कानें भी,
रह जाती हैं केवल उनकी स्मृतियाँ।
स्मृतियाँ भी फिर खो जाती हैं,
रह जाती है केवल स्मृतियों की स्मृति।
अन्ततः रह जाती है केवल एक खटक,
एक अभाव कि कुछ खो गया है।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त



