१। ब्लागिंग के गुण बहुत हैं, ब्लागिंग सुख की खान।
देश देश के मित्र गण, होवत बन्धु समान।।
ब्लागिंग के अवगुण बहुत, ब्लागिंग दुःख की खान।
देश देश के दुष्ट गण, झुलसावत हैं प्रान।।
२। ब्लागिंग के सुख बहुत हैं, सुनौ जोरि कै कान।
सुन्दर सुन्दर कमेन्ट पढ़ि, फूलत नाहिं समान।।
ब्लागिंग के दुःख बहुत हैं, सुनौ जोरि कै कान।
क्या कमेन्ट बिन मिले ही, निकरि जायँगे प्रान।।
३। निंदा वाली कमेन्ट यदि, डारि गयो है कोय।
तौ डिलीट करि देव यहिं, मन माँ क्षोभ न होय।।
४। ('ग़म का फसाना किसको सुनायें' की तर्ज पर)
ब्लागिंग के दुःख किसको सुनायें।
टूटा हुआ दिल किसको दिखायें।। (blatantly plagiarized)
तेरा भला हो ओ पढ़ने वाले, खोटी खरी तू मुझको सुनाये।
क्या आयेगा कभी दिल वाला, जिसको हमारा ब्लाग सुहाए।।
..... लक्ष्मीनारायण गुप्त
...... जनवरी २००६
At present, this blog is set up to publish my Hindi poems and accept comments from the readers. Some contributions from others are also published from time to time. Laxmi N. Gupta
Sunday, January 29, 2006
Wednesday, January 25, 2006
कामना (भारतीय गणतंत्र दिवस,२६ जनवरी २००६, के अवसर पर)
कामना है जन्म लूँ मैं
भारत भूमि के हर प्रान्त में।
जान लूँ क्यूँ धड़कता है
संवेदन यह गहरा बंग में।
जोश से मर्दानगी
क्यों फड़कती पंजाब में।
फड़कती हैं शौर्य से क्यों
ये मराठों की भुजायें।
कौन से प्राचीनतम उद्गार
जो प्रस्फुटित होते तमिल में।
गुर्जरों के रक्त में ही
क्यों भरा व्यापार कौशल।
ज्यों भरा बंगालियों के
खून में साहित्य कौशल।
कौन सा जादू भरा
कर्नाटकी संगीत में।
कौन से अरमान सोये
सतपुड़ा की घाटियों में।
कौन अभिलाषा जगी है
मालवा की माटियों में।
देश में कोणार्क के
उमड़तीं क्या संवेदनायें।
कह रहीं क्या विजयनगरी के
खंडहर पर उड़ती हवायें।
जान लूँ किस प्रेरणा से गीत गाये
सुब्रह्मण्यम भारती ने
कामना है जन्म लूँ मैं
भारत भूमि के हर प्रान्त में।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
भारत भूमि के हर प्रान्त में।
जान लूँ क्यूँ धड़कता है
संवेदन यह गहरा बंग में।
जोश से मर्दानगी
क्यों फड़कती पंजाब में।
फड़कती हैं शौर्य से क्यों
ये मराठों की भुजायें।
कौन से प्राचीनतम उद्गार
जो प्रस्फुटित होते तमिल में।
गुर्जरों के रक्त में ही
क्यों भरा व्यापार कौशल।
ज्यों भरा बंगालियों के
खून में साहित्य कौशल।
कौन सा जादू भरा
कर्नाटकी संगीत में।
कौन से अरमान सोये
सतपुड़ा की घाटियों में।
कौन अभिलाषा जगी है
मालवा की माटियों में।
देश में कोणार्क के
उमड़तीं क्या संवेदनायें।
कह रहीं क्या विजयनगरी के
खंडहर पर उड़ती हवायें।
जान लूँ किस प्रेरणा से गीत गाये
सुब्रह्मण्यम भारती ने
कामना है जन्म लूँ मैं
भारत भूमि के हर प्रान्त में।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
Sunday, January 22, 2006
मन के महल
मन ने सारे महल बनाये
मन ने सारे मन्दिर।
मन की ही है माया सारी
मन की सारी मुश्किल।।
मन ने सारा धन उपजाया
मन की सारी महिमा।
मन की पूजा सब जग करता
मन की सारी गरिमा।।
मन में ही ईमान भरा है
मन की बेईमानी।
मन की बात मान कर के नर
करता है मनमानी।।
मन के सारे खेल हैं प्यारे
मन के सब मतवाले।
मन की माला फेर फेर कर
मन ही मन मुस्का ले।।
मन ही राजा, मन ही परजा
मन ही करता शासन।
मन का ही व्यापार ये सारा
मन से सारे बन्धन।।
मन के ही हैं मारग सारे
मन की ही है मंज़िल।
मन की मौसीक़ी है सारी
मन की ही है महफ़िल।।
मन की मादकता है सारी
मन की सारी मदिरा।
मन की ही हैं मौजें सारी
मन की सारी द्विविधा।।
मन सागर ही भव सागर है
ऐसा जब कोई जाना।
मन की मदिरा उतर जाए तब
हो जाता दीवाना।।
इस दीवानेपन की मस्ती
कभी न उतरे भाई।
इस मस्ती में ही मीरा का
मनमोहन है, भाई।।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...22 जनवरी 2006
मन ने सारे मन्दिर।
मन की ही है माया सारी
मन की सारी मुश्किल।।
मन ने सारा धन उपजाया
मन की सारी महिमा।
मन की पूजा सब जग करता
मन की सारी गरिमा।।
मन में ही ईमान भरा है
मन की बेईमानी।
मन की बात मान कर के नर
करता है मनमानी।।
मन के सारे खेल हैं प्यारे
मन के सब मतवाले।
मन की माला फेर फेर कर
मन ही मन मुस्का ले।।
मन ही राजा, मन ही परजा
मन ही करता शासन।
मन का ही व्यापार ये सारा
मन से सारे बन्धन।।
मन के ही हैं मारग सारे
मन की ही है मंज़िल।
मन की मौसीक़ी है सारी
मन की ही है महफ़िल।।
मन की मादकता है सारी
मन की सारी मदिरा।
मन की ही हैं मौजें सारी
मन की सारी द्विविधा।।
मन सागर ही भव सागर है
ऐसा जब कोई जाना।
मन की मदिरा उतर जाए तब
हो जाता दीवाना।।
इस दीवानेपन की मस्ती
कभी न उतरे भाई।
इस मस्ती में ही मीरा का
मनमोहन है, भाई।।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...22 जनवरी 2006
Tuesday, January 17, 2006
जीवन का संगीत
जीवन का संगीत बज रहा अविरल, अक्षुण्ण,
तुम भी इसमें अपनी तान मिला दो।
कान्हा का यह रास चल रहा निशि-दिन,
तुम भी इसमें अपने कदम मिला दो।
"रस ही है परमात्मा," कहती है श्रुति,
आस्वादन में इसके अपना चित्त रमा दो।
भिन्न नहीं जगदीश्वर कोई इस जगती से,
इस जग के अर्चन की अपनी वृत्ति बना लो।
नहीं बहो प्रतिकूल जगत की इस गंगा के,
इस गंगोदक से ही अपनी प्यास बुझा लो।
"ईशावास्यं इदं सर्वम्," वेदवाक्य यह,
इस कथनी को तुम अब अपना चरित बना लो।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...१७ जनवरी २००६
तुम भी इसमें अपनी तान मिला दो।
कान्हा का यह रास चल रहा निशि-दिन,
तुम भी इसमें अपने कदम मिला दो।
"रस ही है परमात्मा," कहती है श्रुति,
आस्वादन में इसके अपना चित्त रमा दो।
भिन्न नहीं जगदीश्वर कोई इस जगती से,
इस जग के अर्चन की अपनी वृत्ति बना लो।
नहीं बहो प्रतिकूल जगत की इस गंगा के,
इस गंगोदक से ही अपनी प्यास बुझा लो।
"ईशावास्यं इदं सर्वम्," वेदवाक्य यह,
इस कथनी को तुम अब अपना चरित बना लो।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...१७ जनवरी २००६
Friday, January 13, 2006
मैं और तुम, एक प्रेमगीत
७ जनवरी को हमारी शादी के ३१ वर्ष हुए। यह कविता मेरी पत्नी रानी के लिये हैः
मैं चातक हूँ, तुम स्वाती हो।
मैं दीपक हूँ, तुम बाती हो।।
मैं बड़वानल की ज्वाला हूँ।
तुम कालिन्दी की धारा हो।।
मैं हिमगिरि का उच्च शिखर हूं।
तुम उस गिरि की गहराई हो।।
मैं समीर हूँ, तुम तरंग हो।
क्यों न सखी, हम अन्तरंग हों।।
मैं गुलाब हूँ, तुम सुगंध हो।
तुम मेरे जीवन का सुख हो।।
मेरे मन के मरुथल में प्रिय।
सुन्दरि, तुम इक रसधारा हो।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...१३ जनवरी २००६
मैं चातक हूँ, तुम स्वाती हो।
मैं दीपक हूँ, तुम बाती हो।।
मैं बड़वानल की ज्वाला हूँ।
तुम कालिन्दी की धारा हो।।
मैं हिमगिरि का उच्च शिखर हूं।
तुम उस गिरि की गहराई हो।।
मैं समीर हूँ, तुम तरंग हो।
क्यों न सखी, हम अन्तरंग हों।।
मैं गुलाब हूँ, तुम सुगंध हो।
तुम मेरे जीवन का सुख हो।।
मेरे मन के मरुथल में प्रिय।
सुन्दरि, तुम इक रसधारा हो।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...१३ जनवरी २००६
Monday, January 09, 2006
हम क्या करें?
हम तो अपना कलाम लिखते हैं
तुम्हें ग़र न भाये, तो हम क्या करें?
हम तुम्हारे दर पे सर झुकाते हैं
तुम रहमत न बख़्शो तो, हम क्या करें?
हम पराये हैं तो पराये हैं
तुम अपना न मानो तो, हम क्या करें?
हम हमेशा तुम्हें बुलाते हैं
तुम ग़र न आओ तो, हम क्या करें?
हम अपने दिल की बात करते हैं
तुम सुनते नहीं हो तो, हम क्या करें?
हम तो जब भी क़रीब आते हैं
तुम दूर हटते हो तो, हम क्या करें?
हम तो तुम से ही इश्क करते हैं
तुम हम को न चाहो तो, हम क्या करें?
हम तो तुम पे ही नज़्में लिखते हैं
तुम पढ़ते नहीं हो तो, हम क्या करें?
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...९ जनवरी २००६
तुम्हें ग़र न भाये, तो हम क्या करें?
हम तुम्हारे दर पे सर झुकाते हैं
तुम रहमत न बख़्शो तो, हम क्या करें?
हम पराये हैं तो पराये हैं
तुम अपना न मानो तो, हम क्या करें?
हम हमेशा तुम्हें बुलाते हैं
तुम ग़र न आओ तो, हम क्या करें?
हम अपने दिल की बात करते हैं
तुम सुनते नहीं हो तो, हम क्या करें?
हम तो जब भी क़रीब आते हैं
तुम दूर हटते हो तो, हम क्या करें?
हम तो तुम से ही इश्क करते हैं
तुम हम को न चाहो तो, हम क्या करें?
हम तो तुम पे ही नज़्में लिखते हैं
तुम पढ़ते नहीं हो तो, हम क्या करें?
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...९ जनवरी २००६
Wednesday, January 04, 2006
वसुधैवकुटुम्बकम्
सन्त: नहीं कोई मेरा इस दुनिया में दुश्मन।
इसलिये मेरे लिये वसुधैवकुटुम्बकम्।।
असन्त: मार दूँ सबको मेरे जो दुश्मन।
तो मेरे लिये भी वसुधैवकुटुम्बकम्।।
ब्राह्मण: वैसे तो मेरे लिये वसुधैवकुटुम्बकम्।
बिटिया की शादी के लिये ब्राह्मणेवकुटुम्बकम्।।
(ब्राह्मण की जगह अपनी मनोवांछित जाति या समूह प्रतिस्थापित (substitute) करें.)
नेता: थ्योरी में मेरे लिये वसुधैवकुटुम्बकम्।
प्रैक्टिस में मेरा वोट बैंक ही मेरा कुटुम्बकम्।।
दलित नेता: खाक कहते हो वसुधैवकुटुम्बकम्।
मनुवादियों के जीते जी कैसे वसुधैवकुटुम्बकम्।।
कट्टर मुसलमान: बकवास है वसुधैवकुटुम्बकम्।
काफ़िरों के रहते कैसे वसुधैवकुटुम्बकम्।।
कट्टर हिन्दू: आदर्श की बात है वसुधैवकुटुम्बकम्।
जब तक मुसलमान हैं, कैसे होगा वसुधैवकुटुम्बकम्।।
ईरानी अयातुल्ला: अमरीकी शैतान जब तक है मौजूद।
वसुधैवकुटुम्बकम् हरग़िज़ नहीं मंज़ूर।।
कट्टर ईसाई: ग़लत है कहना वसुधैवकुटुम्बकम्।
ईसा को मानने वाले ही मेरा कुटुम्बकम्।।
एन आर आई: अपनी परम्परा का ध्यान रखते हैं।
चाट खाते हैं, चाय पीते हैं।।
मन्दिरों को चन्दा देकर,
बालकों के नाम के प्लैक लगवाते हैं।
बिटिया यदि करती विधर्मी से विवाह
तिरस्कार करके कहते हैः
भाड़ में जाये वसुधैवकुटुम्बकम्।।
फ्रान्सीसी उद्योगपति: एसबेस्टस के जहाज को तोड़ेंगे भारत में
क्योंकि मानते हैं हम वसुधैवकुटुम्बकम्।
मध्यवर्गी भारतीय: छोड़ के अपनी संस्कृति को
पश्चिम का करते हैं अन्धानुकरण।
क्योंकि ऐसा कहते हैं दिलोजान से हम
कि इसी में है वसुधैवकुटुम्बकम्।।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...४ जनवरी २००६
इसलिये मेरे लिये वसुधैवकुटुम्बकम्।।
असन्त: मार दूँ सबको मेरे जो दुश्मन।
तो मेरे लिये भी वसुधैवकुटुम्बकम्।।
ब्राह्मण: वैसे तो मेरे लिये वसुधैवकुटुम्बकम्।
बिटिया की शादी के लिये ब्राह्मणेवकुटुम्बकम्।।
(ब्राह्मण की जगह अपनी मनोवांछित जाति या समूह प्रतिस्थापित (substitute) करें.)
नेता: थ्योरी में मेरे लिये वसुधैवकुटुम्बकम्।
प्रैक्टिस में मेरा वोट बैंक ही मेरा कुटुम्बकम्।।
दलित नेता: खाक कहते हो वसुधैवकुटुम्बकम्।
मनुवादियों के जीते जी कैसे वसुधैवकुटुम्बकम्।।
कट्टर मुसलमान: बकवास है वसुधैवकुटुम्बकम्।
काफ़िरों के रहते कैसे वसुधैवकुटुम्बकम्।।
कट्टर हिन्दू: आदर्श की बात है वसुधैवकुटुम्बकम्।
जब तक मुसलमान हैं, कैसे होगा वसुधैवकुटुम्बकम्।।
ईरानी अयातुल्ला: अमरीकी शैतान जब तक है मौजूद।
वसुधैवकुटुम्बकम् हरग़िज़ नहीं मंज़ूर।।
कट्टर ईसाई: ग़लत है कहना वसुधैवकुटुम्बकम्।
ईसा को मानने वाले ही मेरा कुटुम्बकम्।।
एन आर आई: अपनी परम्परा का ध्यान रखते हैं।
चाट खाते हैं, चाय पीते हैं।।
मन्दिरों को चन्दा देकर,
बालकों के नाम के प्लैक लगवाते हैं।
बिटिया यदि करती विधर्मी से विवाह
तिरस्कार करके कहते हैः
भाड़ में जाये वसुधैवकुटुम्बकम्।।
फ्रान्सीसी उद्योगपति: एसबेस्टस के जहाज को तोड़ेंगे भारत में
क्योंकि मानते हैं हम वसुधैवकुटुम्बकम्।
मध्यवर्गी भारतीय: छोड़ के अपनी संस्कृति को
पश्चिम का करते हैं अन्धानुकरण।
क्योंकि ऐसा कहते हैं दिलोजान से हम
कि इसी में है वसुधैवकुटुम्बकम्।।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...४ जनवरी २००६
Sunday, January 01, 2006
आनन्द
सरग न होइ नरक बिन सन्तौ, द्वेष बिना नहिं रागा।
दु:ख बिना सुख सम्भव नाहीं, आशा बिना निराशा।।
विद्या बिना अविद्या नाहीं, ज्ञान बिना अज्ञाना।
बिना कुमति के सुमति न होई, भाखैं वेद पुराना।।
बिन अधरम के धरम न होई, पुन्नि न होय बिन पापा।
बिना मलिन के स्वच्छ न होई, गुन नाहीं बिन दोषा।।
नीचे के बिन ऊँच न होई, कमल नहीं बिन कीचा।
बिन रावण के राम न होई, किशन नहीं बिन कंशा।।
बिना मरन जीवन नहिं होई, लाभ नहीं बिन हानी।
"लक्ष्मीगुप्त" कहैं, सुनौ सन्तौ, बिन बन्धन के मुक्ती।।
इन द्वन्दन ते जगत बना है, माया कै सब रचना।
माया के ऊपर जब उठिहौ, मिलिहैं श्री भगवाना।।
ई मिलना माँ विरह न होई, मिले आप से आपा।
ई अनन्द माँ द्वन्द न होई, मिटिहैं सब सन्तापा।।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...१ जनवरी २००६
दु:ख बिना सुख सम्भव नाहीं, आशा बिना निराशा।।
विद्या बिना अविद्या नाहीं, ज्ञान बिना अज्ञाना।
बिना कुमति के सुमति न होई, भाखैं वेद पुराना।।
बिन अधरम के धरम न होई, पुन्नि न होय बिन पापा।
बिना मलिन के स्वच्छ न होई, गुन नाहीं बिन दोषा।।
नीचे के बिन ऊँच न होई, कमल नहीं बिन कीचा।
बिन रावण के राम न होई, किशन नहीं बिन कंशा।।
बिना मरन जीवन नहिं होई, लाभ नहीं बिन हानी।
"लक्ष्मीगुप्त" कहैं, सुनौ सन्तौ, बिन बन्धन के मुक्ती।।
इन द्वन्दन ते जगत बना है, माया कै सब रचना।
माया के ऊपर जब उठिहौ, मिलिहैं श्री भगवाना।।
ई मिलना माँ विरह न होई, मिले आप से आपा।
ई अनन्द माँ द्वन्द न होई, मिटिहैं सब सन्तापा।।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...१ जनवरी २००६
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