Wednesday, November 22, 2006

ज्वार की रोटी और बथुए का साग

जैसे पंजाबी खाने में मक्की की रोटी और सरसों का साग है वैसे ही हमारे क्षेत्रीय खाने में ज्वार की रोटी और बथुए का साग है। एक कहावत हैः
"जोन्डी की रोटी, साग बथुआ, नकल करै दहिजार नथुआ।"
जोन्डी = ज्वार, दहिजार = दाढ़ीजार

ज्वार की रोटी आटे को हाथ से थपथपा कर पतली और गोलाकार कर के तवे पर सेंकते हैं। इस आटे को बेलन से बेलना बहुत मुश्किल है। इस रोटी को पनेथी भी कहते हैं जैसे बेली हुई रोटी को बेली। पुराने समय के लोग समझते थे कि बेली रोटी स्वास्थ्य के लिये अच्छी नहीं होती। जब बहू ने बेली रोटियाँ ससुर को खिलानी शुरू कीं तो ससुर ने कहाः "सब हड्डी पसुरी निकरि परीं, उइ बेलि बेलि सब बेलि दिहिन।"

यह कहानी मैंने अपने गाँव के बुज़ुर्गों से सुनी थी। एक बार गाँव में कोई अंग्रेज़ अफसर रात में रुका। अब समस्या हुई कि इसे खाने को क्या दिया जाय। बहुत सोच बिचार कर उसे ज्वार की रोटी को गरम दूध में डाल कर, चीनी मिला कर दिया गया। अफसर ने खाने की बहुत तारीफ की और कहा कि इतना बढ़िया खाना उसने कभी नहीं खाया था।

अब फिर ज्वार की रोटी और बथुए के साग की तरफ चलते हैं। हमारे यहाँ का साग पंजाबी साग की तरह पिसा हुआ नहीं होता। साक को पतला पतला काट कर, थोड़ी सी अरहर की दाल के साथ और आटे के आलन के साथ बनाया जाता है तथा लहसुन का छौंक लगाया जाता है। बथुआ न हो तो पालक, चौलाई, सुकसा या पथरचटे के साथ भी बनाया जा सकता है। ये सभी चीज़ें खाए ३५-४० वर्ष हो चुके। सुकसा सुखाए हुए चने के साग को कहते हैं। सुकसे की याद से एक और कहावत याद आती है। इसमें बताया गया है कि किन किन चीज़ों को किन महीनों में त्याग देने से वैद्य घर नहीं आता हैः

"चैते गुड़, बैसाखे तेल
जेठे पन्थ, असाढ़े बेल
सावन सुकसा, भादौं मही
क्वार करेला, न कातिक दही
अगहन जीरा, पूसै धना
माघै मिश्री, न फागुन चना
जो यह बारह देय निभाय
ता घर वैद्य कबौं न जाय।"

इसके सत्य का मुझे कोई ज्ञान नहीं है। जो इसका परीक्षण करना चाहते हों, अपने खतरे पर करें।

आज इतना ही।

...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...२२ नवम्बर २००६

6 comments:

अनूप शुक्ला said...

तीस-चालीस साल हो गये आपको सुखसा खाये.आ जाइये एक बार भारत फ़िर से इसे खाने के लिये.

Udan Tashtari said...

भूख लगवाये दिये हो, चलो शुक्ल जी के यहाँ खाया जाये, बुला जो रहे हैं, कबहूं चलिहो, बतावा जाहि. बाह रे बाह, क्या याद दिलवाये हो!!!

Anonymous said...

गुप्ताजी,ऐसे लेख हृदय को हर्षित कर देते हैं ।
ग्रामीण महिलाएँ खेतों में बथुए का साग खोंटती है और अपने फाड़ों में रखती जाती हैं । बिसरी यादें ताजा हो गईं ।

संजय बेंगाणी said...

आपका स्वागत तो हम भी करने को तैयार है, चाहें तो राजस्थानी भोजन बाजरे की रोटी, केरीया-सांगरी का साग बनवा कर तैयार रखे.

Jitendra Chaudhary said...

Laxmi bhai,
aapki ek post hai
फिर क्या होगा उसके बाद

Iski taareekh dekhiyega jara, isko correct kariya, iski taarikh agle saal ki hai.

Laxmi N. Gupta said...

अनूप जी, समीर जी, प्रभाकर जी, संजय जी, जीतू जी,

धन्यवाद। समीर जी का ख़्याल अच्छा है लेकिन शुक्लाइन जी के लिये कुछ बढ़िया तोहफा ले के चलना होगा क्योंकि जहाँ तक मेरा अन्दाज़ है बथुए या सुकसे का साग वही बनाएँगी शुकुल जी नहीं। इसके बाद संजय के यहाँ धावा मारा जाय। हम बुज़ुर्गों के साथ जीतू भी चलेंगे। प्रभाकर जी "फाड़" क्या होता है? बताइएगा, मुझे पता नहीं है। आप सभी ऐसे ही कृपा बनाए रखिए।