इक अँधेरी राह पर
मैं चल रहा हूँ।
एक दीपक लघु
कहीं पर जल रहा है,
ज्योति जिसकी मुझ
तलक पहुँची नहीं है।
प्रेरणा की किरण मेरे
हृदय में जागी नहीं है।
कौन से बाजे बजाऊँ?
किन सुरों में आज गाऊँ?
कौन से दीपक जलाऊँ?
मैं किसे माला चढ़ाऊँ?
मैं यही सब प्रश्न
लेकर जी रहा हूँ।
कौन पथ पर आ रहा है,
मैं कहाँ पलकें बिछाऊँ?
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...२३ अगस्त २००६
6 comments:
लक्ष्मी जी
बहुत सुंदर और गहरे भाव हैं...दार्शनिक पुट लिये यह रचना अच्छी लगी.
बधाई
-समीर लाल
समीर जी,
बहुत धन्यवाद।
कौन से बाजे बजाऊँ?
किन सुरों में आज गाऊँ?
कौन से दीपक जलाऊँ?
मैं किसे माला चढ़ाऊँ?
बढ़िया लगा। कामना है कि सवालों के जवाब मिल जायें।
अनूप जी,
धन्यवाद कि आप मेरे ब्लाग पर आये और आपको कविता पसन्द आई।
लक्ष्मी जी ,
यह आपके अकेले की दुविधा नहीं है. प्रारम्भ से ही यह मानव का बुनियादी सवाल रहा है . ऋग्वेद का ऋषि/कवि भी तो बार-बार यही कहता है : 'कस्मै देवाय हविषा विधेम'
हम और आप किस खेत की मूली हैं . मन के भाव लिखते रहिये .
प्रियंकर जी,
टिप्पणी के लिये धन्यवाद। सही कह रहे हैं, आप। ये प्रश्न इन्सान युगों से पूछ रहा है।
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