Thursday, June 22, 2006

दो लोक-कथायें

ये कहानियाँ मेरी माँ सुनाती थीं।

बड़ों की बात
एक बार एक जंगल में एक बाघ रहता था। वह जब भी शिकार मार के लाता था और खाने के पहले नदी में मुँह धोने जाता था, कोई जानवर शिकार का सबसे अच्छा भाग चुरा ले जाता था। बाघ बहुत नाराज़ था लेकिन उसे पता नहीं था कि क्या करा। उसी जंगल में एक लोमड़ी रहती थी। उसने बाघ से कहा कि यह सियार की करतूत है और वह बाघ को सियार की माँद तक पहुँचा सकती है। यह तय हुआ कि लोमड़ी आगे आगे चलेगी और उसकी पूँछ बाघ की टाँग से बँधी होगी। इस तरह चलते चलते जब वे सियार की माँद के करीब आये, सियार ने उन्हें आते देख कर अपनी पत्नी को आवाज़ लगाई, "चन्द्रवदनी, बच्चे क्यों रो रहे हैं?" पत्नी ने जवाब दिया, "सिंघपछाड़, इन्हें बासी बाघ का मांस नहीं पसन्द आ रहा है, ताज़ा माँग रहे हैं।" सियार ने कहा, "बच्चों को चुप करो। एक बाघ को लोमड़ी मौसी से लाने को कहा था। वे उसे ला रही हैं।" इतना सुनते ही बाघ की सिट्टी पिट्टी गुम हो गई और वह पीछे भागने लगा। लोमड़ी ने बहुत समझाया कि यह सियार ही है, बस गीदड़-भबकी दे रहा है लेकिन बाघ नहीं माना। लोमड़ी की पूँछ इस खींचातानी में टूटते टूटते बची। किसी तरह जब छूटी, तब लोमड़ी ने सोचाः "न बड़ों की बात करते, न खिंचते खिंचते फिरते।"

कोरी की भविष्यवाणी
एक कोरी महाशय अपनी ससुराल गए। दरवाजे को बन्द देखा लेकिन बाहर से ही ज़ीना था, छत पर जाने के लिये। चढ़कर आँगन की मुँड़ेर से देखा कि उनकी सास बड़े बना रही हैं और पहला बड़ा टेढ़ा बना है। फिर वे नीचे उतर के आये और दरवाज़ा खटखटाया। सास ने दरवाज़ा खोल कर पूछा कि आप कब से इन्तज़ार कर रहे थे। उन्होंने कहाकि वे "पहले टेढ़े" के समय पर आये थे। सास बहुत प्रभावित हुईं और सारे गाँव में खबर फैल गई कि कोरी का दामाद बड़ा जान-पाँड़े है। यह खबर राज-दरबार तक पहुँची। अवसर की बात कि रानी का नौलखा हार चोरी हो गया था। कोरी को बुला के कहा गया कि २४ घंटे में हार का पता लगाओ या मौत की सज़ा मिलेगी। गर्मियों के दिन थे। रात को छत पर सोने का प्रबन्ध था। सोने के पहले कोरी ने गाया, " आव आव सुखनिंदिया, भोरहें राजा कटावैं मुड़िया।" बगल की जुड़ी हुई छत से सुखनिंदिया ने जो रानी की दासी थी और जिसने हार चुराया था, यह गीत सुना और वह तुरन्त भागती हुई कोरी के पास आई और अपना अपराध कबूल करके जान की भिक्षा माँगने लगी। कोरी ने किसी तरह राजा से पैरवी कर उसकी जान बचवाई। अब तो कोरी के नक्शे हो गए। रोज़ राज-दरबार जाने लगे। एक दिन जब कोरी साहब दरबार में थे, नाई राजा की दाढ़ी बनाने की तैयारी में अपना उस्तरा तेज़ कर रहा था। कोरी को तुकबन्दी का शौक था तो उसने गाया, " काहे का तुम उलटौ, पलटौ, घिसौ लगाऔ पानी, जौनि बात है तुम्हरे मन माँ तौनि बात हम जानी।" यह सुनते ही नाई कोरी के पैरों पड़ कर जान की भीख माँगने लगा। हुआ क्या कि राजा के खिलाफ़ षड़यंत्र था और नाई राजा का गला काटने वाला था। नाई और सारे षड़यंत्रकारी पकड़े गये। राजा ने इनाम-स्वरूप कोरी को अपनी बेटी ब्याह दी और आधा राज्य दे दिया।

...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...22 जून 2006

2 comments:

ई-छाया said...

काफी पहले कुछ मिलता जुलता सा सुना था, याद कराने के लिये धन्यवाद।
मतलब कोरी साहब की दो पत्नियाँ हो गईं। :)

Laxmi N. Gupta said...

e-shadow जी,

टिप्पणी के लिये धन्यवाद। कोरी साहब राजा हो गये तो दो क्या जितनी रानियाँ चहें, रख सकते हैं।