Tuesday, March 21, 2006

अपनी मंजिल

अपनी मंजिल जाने कितनी आगे है।

इस द्रुत गति से जीता जीवन,
साँस न देती साथ देह का,
गति इतनी कि यंत्र मानव है इसमें,
गति अणु युग की मूल मान्यता,
जीवन रस बन गया गरल, न जाने क्या आगे है।
अपनी मंजिल....

मिटता प्यार तनाव सुगम प्रसरित है,
हृदय, हृदय में दूरी है पृथकत्व है,
यह अपनी कृति यंत्र हमें ही मेटती,
सोता विवेक, दे सके कौन गुरु मंत्र है,
जन पदार्थ-मद पीने में कितना आगे है।
अपनी मंजिल....

यंत्रों की धड़ धड़ में जीवन,
होता जाता है यंत्र सदृश,
मानव का मूल्य घिसा जाता,
है कृष्ण पक्ष के चन्द्र सदृश,
शोषण में पोषक ही सबसे आगे है।
अपनी मंजिल....

...सत्यनारायण गुप्त 'कुमुद'

2 comments:

Udan Tashtari said...

लक्ष्मी जी
अदभुत रचना है.
बधाई.
समीर लाल

Laxmi N. Gupta said...

समीर जी,

कुमुद जी की तरफ से और मेरी तरप से भी आपको धन्यवाद।