इस दीन दुनिया को छोड़ कर तुम,
पुरानी रस्में तोड़ के देखो।
ये जो पुरानी रूढ़ियाँ हैं,
तुम्हारे पैरों की बेड़ियाँ हैं।
इन बेड़ियों को कुछ ढीला करके,
खुली हवा में साँस ले के देखो।
निकल के ऊँची इमारतों से,
कभी तो मेड़ों पर चल के देखो।
छोड़ कर के कागज़ी गुलों को,
असल फूल को कभी छू के तो देखो।
छोड़ कर के पुरानी आदत,
कभी लीक से हट के चल के देखो।
कभी तो बिजली की रोशनी से,
तुम चाँदनी में जा कर तो देखो।
कभी परम्परा को तोड़ कर तुम,
खुद अपना रास्ता बना के देखो।
उठा रखा है सर पर जो तुमने,
ये जो दुनिया का बोझ सारा,
कभी पटक गर गिरा दो इसको,
ये बोझ हल्का कर के तो देखो।
कभी तो थोड़ा मुस्कराओ,
गगन है अपना, उठ कर तो देखो।
शहर की गलियों से दूर जाकर,
कभी पहाड़ों पर चढ़ के तो देखो।
कभी तो प्रिय के नयनों में प्यारे,
तुम भी तो नयना लगा के देखो।
कभी तो अपनी बीरानगी में,
सुहाने सपने सँजो के देखो।
बहार आयेगी फिर ज़िन्दगी में,
तुम उसको थोड़ा बुला के देखो।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...४ फरवरी २००६
4 comments:
Aapkee kavita mein hridya ko jhakjhor kar dene waalee pukaar hai. Ek nimantran hai maaya ke pardey se nikal kar yathaarth ka anubhav karney ka. Bahut sundat rachna hai hai. Humko bahut pasand aayee.
अनुराग जी,
आपको मेरी कवितायें अच्छी लगीं, यह सुन कर अच्छा लगा। बहुत बहुत धन्यवाद। आगे भी पढ़ते रहिये, इसी तरह। शुभकामनाओं सहित।
aapki kavitayen mujhe behad pasand aayin ..khaas karke .."Bulakar Dekho"..kaafi sacchai bhari kavita hian - Anjaan :)
अनजान जी,
प्रोत्साहन के लिये धन्यवाद। ऐसी ही कृपा बनय्र रखिए।
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