इस ज़िन्दगी की हम परवाह क्यूँ करें,
मौत आने का इन्तज़ार क्यूँ करें?
बीत जायेगी यह रात भी लमहा लमहा,
सुबह के तारे की हम चाह क्यूँ करें?
आ रहे होंगे वे आहिस्ता आहिस्ता,
हम उनके आने का इन्तज़ार क्यूँ करें?
वे गुनहगार हैं तो मुझे परवा क्या,
हम उनके गुनाहों का हिसाब क्यूँ करें?
जलते ही रहते हैं परवाने शमा पर,
वे मेरे मरने पर फिर आह क्यूँ भरें?
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...२८ दिसम्बर २००५
At present, this blog is set up to publish my Hindi poems and accept comments from the readers. Some contributions from others are also published from time to time. Laxmi N. Gupta
Wednesday, December 28, 2005
Monday, December 26, 2005
नव वर्ष २००६ का अभिनन्दन
बज रहा है तार सप्तक, माँ भारती के गीत गाओ।
एक रसधारा बहाओ, गुनगुनाओ, मुस्कराओ।
मधुर कलरव कर रहे, उन पंछियों सा सुर बनाओ।
जो गया है बीत, उस पुराने साल की यादें सजाओ।
जो अभी आया नवेला, उसे सर आँखों बिठाओ।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
एक रसधारा बहाओ, गुनगुनाओ, मुस्कराओ।
मधुर कलरव कर रहे, उन पंछियों सा सुर बनाओ।
जो गया है बीत, उस पुराने साल की यादें सजाओ।
जो अभी आया नवेला, उसे सर आँखों बिठाओ।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
Thursday, December 22, 2005
रहस्य
जानते हो रहस्य क्या है
सुन्दरी के सौन्दर्य का
शूर के शौर्य का
नर्तकी के नृत्य का
गायक के गान का
फूल की महक का
फल की मिठास का
विदूषक के हास्य का
और कवि के काव्य का?
नहीं जानते हो, मैं बताता हूँ
रहस्य यह गूढ़
किन्तु अति साधारण
होता है यह सब
केवल प्रेम के कारण।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...२२ दिसम्बर २००५
सुन्दरी के सौन्दर्य का
शूर के शौर्य का
नर्तकी के नृत्य का
गायक के गान का
फूल की महक का
फल की मिठास का
विदूषक के हास्य का
और कवि के काव्य का?
नहीं जानते हो, मैं बताता हूँ
रहस्य यह गूढ़
किन्तु अति साधारण
होता है यह सब
केवल प्रेम के कारण।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...२२ दिसम्बर २००५
Thursday, December 15, 2005
मस्ती
मिट न सके जो जीवन भर तक,
मोहन ऐसी मस्ती दे दो।
चढ़ी रहे जो अन्तिम क्षण तक,
मोहन, ऐसी मदिरा दे दो।
कभी न खाली जो हो पाये,
प्यारे, ऐसा प्याला दे दो।
मीरा ने पी ली थी जैसी,
प्रियतम वैसी हाला दे दो।
सच्चा क्या है, झूठा क्या है,
ज्ञान पंडितों को तुम दे दो।
मुझको तो हे प्रियतम प्यारे,
प्रेमातुर मतवाला कर दो।
मृदु और कटु का भेद मिटे अब,
ऐसी बेपरवाही दे दो।
सभी सहन कर जाऊँ उफ़ बिन,
ऐसी मुझे सुदृढ़ता दे दो।
मिट न सके जो जीवन भर तक,
मोहन ऐसी मस्ती दे दो।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...१५ दिसम्बर २००५
मोहन ऐसी मस्ती दे दो।
चढ़ी रहे जो अन्तिम क्षण तक,
मोहन, ऐसी मदिरा दे दो।
कभी न खाली जो हो पाये,
प्यारे, ऐसा प्याला दे दो।
मीरा ने पी ली थी जैसी,
प्रियतम वैसी हाला दे दो।
सच्चा क्या है, झूठा क्या है,
ज्ञान पंडितों को तुम दे दो।
मुझको तो हे प्रियतम प्यारे,
प्रेमातुर मतवाला कर दो।
मृदु और कटु का भेद मिटे अब,
ऐसी बेपरवाही दे दो।
सभी सहन कर जाऊँ उफ़ बिन,
ऐसी मुझे सुदृढ़ता दे दो।
मिट न सके जो जीवन भर तक,
मोहन ऐसी मस्ती दे दो।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...१५ दिसम्बर २००५
Thursday, December 08, 2005
मन लागो मेरो यार
मन लागो मेरो यार सबर्बिया माँ
राइडरमोवर का सुख सन्तौ दुर्लभ बहुत नगरिया माँ
भोरहिं ते साँझै तक मित्रौ शापिंग कर गैलरिया माँ
गोल्फ खेलन माँ सबु दिन बीतै कन्ट्रीक्लब की बगिया माँ
मन लागो मेरो यार...
कोमल तन की सुघर मेहरियाँ रहतीं सबै सबर्बिया माँ
चंचल नैनन वाली गोरियाँ चितवत रहैं सबर्बिया माँ
नाचैं, गावैं, भाव बतावैं बारन और किलबिया माँ
मन लागो मेरो यार....
सबै सुखन की सुबिधा ह्याँ पै काहे रहत नगरिया माँ
पढ़ैं, लिखैं कै सुबिधा बढ़िया लरिकन के स्कूलन माँ
ब्याँचौ आपन भवन पुरनवा अब बसि रहौ सबर्बिया माँ
मन लागो मेरो यार...
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...८ दिसम्बर २००५
राइडरमोवर का सुख सन्तौ दुर्लभ बहुत नगरिया माँ
भोरहिं ते साँझै तक मित्रौ शापिंग कर गैलरिया माँ
गोल्फ खेलन माँ सबु दिन बीतै कन्ट्रीक्लब की बगिया माँ
मन लागो मेरो यार...
कोमल तन की सुघर मेहरियाँ रहतीं सबै सबर्बिया माँ
चंचल नैनन वाली गोरियाँ चितवत रहैं सबर्बिया माँ
नाचैं, गावैं, भाव बतावैं बारन और किलबिया माँ
मन लागो मेरो यार....
सबै सुखन की सुबिधा ह्याँ पै काहे रहत नगरिया माँ
पढ़ैं, लिखैं कै सुबिधा बढ़िया लरिकन के स्कूलन माँ
ब्याँचौ आपन भवन पुरनवा अब बसि रहौ सबर्बिया माँ
मन लागो मेरो यार...
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...८ दिसम्बर २००५
Thursday, December 01, 2005
पत्थर में राम
पत्थर में राम नहीं हैं मूरख, राम तो तेरे चित में।
तेरे चित के राम से मिल कर, राम हुये पत्थर में।
राम हुये पत्थर में, कमल कीचड़ से निकला।
परस राम पद पत्थर से, निकली थी अहिल्या।
सुन्दरता तन में नहीं मूरख, सुन्दरता तेरे मन में।
तेरे मन की सुन्दरता से, सुन्दरता हुयी तन में।
सुन्दरता हुयी तन में, सीप से मोती निकला।
काले कोयले की खदान से, हीरा निकला।
जग में राम नहीं हैं मूरख, राम हैं तेरे चित में।
तेरे चित के राम से मिल कर, राम हुये सारे जग में।
सारे जग में राम, राम में जग हैं सारे।
राम चित्त में तेरे, तू ही राम है प्यारे।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...१ दिसम्बर २००५
तेरे चित के राम से मिल कर, राम हुये पत्थर में।
राम हुये पत्थर में, कमल कीचड़ से निकला।
परस राम पद पत्थर से, निकली थी अहिल्या।
सुन्दरता तन में नहीं मूरख, सुन्दरता तेरे मन में।
तेरे मन की सुन्दरता से, सुन्दरता हुयी तन में।
सुन्दरता हुयी तन में, सीप से मोती निकला।
काले कोयले की खदान से, हीरा निकला।
जग में राम नहीं हैं मूरख, राम हैं तेरे चित में।
तेरे चित के राम से मिल कर, राम हुये सारे जग में।
सारे जग में राम, राम में जग हैं सारे।
राम चित्त में तेरे, तू ही राम है प्यारे।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...१ दिसम्बर २००५
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