इस ज़िन्दगी
इस ज़िन्दगी की हम परवाह क्यूँ करें,
मौत आने का इन्तज़ार क्यूँ करें?
बीत जायेगी यह रात भी लमहा लमहा,
सुबह के तारे की हम चाह क्यूँ करें?
आ रहे होंगे वे आहिस्ता आहिस्ता,
हम उनके आने का इन्तज़ार क्यूँ करें?
वे गुनहगार हैं तो मुझे परवा क्या,
हम उनके गुनाहों का हिसाब क्यूँ करें?
जलते ही रहते हैं परवाने शमा पर,
वे मेरे मरने पर फिर आह क्यूँ भरें?
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...२८ दिसम्बर २००५



