Tuesday, November 22, 2005

बहुरुपिया

झुरमुठों के बीच जो मुस्का रहा
इन्द्रधनु के रँगों में जो रम रहा

रंगशाला में वही है रंगरलियाँ भर रहा
और सप्तक के सभी सुर गा रहा

वही कारागार में दु:ख पा रहा
और फाँसीघर में फाँसी चढ़ रहा

जो अभी शिशु रूप में था पालने में सो रहा
वही मरघट में चिता पर जल रहा

वही मन्दिर का पुजारी है बना
जाके मस्जिद में वही मुल्ला बना

राजमन्दिर की नवोढ़ा सुघर शहज़ादी वही
और जनपथ की मलिन भूखी भिखारिन भी वही

बनके हिन्दू मन्दिरों को गढ़ रहा
तुर्क बनके फिर उन्हीं को ढह रहा

यह वही नटवर जो वृन्दावन में था
है वही हरफ़न जो हरकत कर रहा

मोहिनी बन दैत्यों को छल रहा
और शिव बन कर हलाहल पी रहा

वही रावण बन सिया को हर रहा
राम बन करके उसे फिर बध रहा

राम बन कर के निठुर जो, सिय की परीक्षा ले रहा
द्रौपदी का चीर करुणामय वही बढ़वा रहा

बनके अणुबम प्राणियों को हन रहा
बनके गाँधी शान्ति फिर फैला रहा

इस फ़रेबी का यक़ीं कोई नहीं
रूप अगणित बहुरुपिया यह निशिदिन धर रहा

...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...२२ नवम्बर २००५

Thursday, November 17, 2005

टर्की आरती

(अमेरिकन शुक्रगुजारी (Thanksgiving) के त्योहार पर)

ॐ जय टर्की देवी।

जो खावैं, फल पावैं,
भूख मिटे उनकी।
प्राण तेरे जावैं,
फिक्र नहीं उसकी।
ॐ जय टर्की देवी।

करुण कहानी तेरी,
हम कैसे गावैं?
तेरे बलिदानों का,
पार कहाँ पावैं।
ॐ जय टर्की देवी।

फ्रैंकलिन की इच्छा थी,
तू बने राष्ट्रीय पक्षी।
विधि की विडम्बना ऐसी,
कि राष्ट्र हुआ तेरा भक्षी।
ॐ जय टर्की देवी।

जान तुम्हारी लेकर,
करे दुनिया शुक्रगुजारी।
सहन करो हे देवी,
यह घोर कृतघ्नता भारी।
ॐ जय टर्की देवी।

तेरी यह महिमा,
जो कोई जन गावे।
कष्ट मिटें सारे,
वाँछित फल पावे।
ॐ जय टर्की देवी।

...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...१७ नवम्बर २००५

Wednesday, November 09, 2005

खुद की पहचान

एक शेर का बच्चा था, जो भूल गया था वन में राह।
भेड़ों का एक झुन्ड मिल गया, जिससे उसको मिली पनाह।।

भेडों के संग रहता था वह, भेड़ों के संग चरता था।
और ज़रूरत पड़ने पर वह, भेड़ों सा मिमियाता था।।

जंगल में रहता था मित्रो, शेर एक जो अति खूँखार।
उसके आक्रमण से भेड़ों में, तुरत मच गया हाहाकार।।

भागीं भेड़ें द्रुत गति से जब, शेर का बच्चा भी तब भाग चला।
नज़र शेर की पड़ते ही उसने, मिमिया करके शोर करा।।

चकित हुआ तब शेर, अरे यह तो अपना ही बन्धू है।
भेड़ों के संग भेड़ बना, यह बड़ा मामला दुष्कर है।।

भागा शेर बड़ी तेजी से, बच्चे को फिर पकड़ लिया।
सभय हुआ तब बच्चा, उसने मिमिया करके शोर किया।।

बोला शेर स्नेह से उससे, अरे तू ऐसे क्यों मिमियाता है।
पता नहीं है है तुझको लेकिन, मेरा तुझसे नाता है।।

बच्चा बोला दीन वचन, क्षमा करो अब मुझको नाथ।
बड़े सुख से रहता था मैं, खाता रहता निशि दिन घास।।

किन्तु शेर ने पकड़ा उसको, चला एक दरिया के पास।
बोला अभी कराता हूँ मैं, तुझसे तेरी ही पहचान।।

उस दरिये में बच्चे को जब, दोनों के प्रतिबिम्ब दिखे।
अचरज से उस बच्चे के तब, हो गये सारे रोम खड़े।।

तभी शेर ने एक गोश्त की, बोटी उसको पकड़ाई।
बोला मैं तो शाकाहारी, गोश्त नहीं खाता भाई।।

तभी शेर ने जबरन उसके, मुँह में बोटी को ठूँस दिया।
दौड़ा खून रगों में उसकी, कुछ शेरपने का भास हुआ।।

शेरपने का भास हुआ, उसने खुद को पहचाना था।
तभी शेर की माफिक, बच्चा पहली बार दहाड़ा था।।

--लक्ष्मीनारायण गुप्त
९ नवम्बर २००५

Saturday, November 05, 2005

उसका रूप

जिसका कोई रूप नहीं है, सारे रूप उसी के हैं।
जिसका कोई धाम नहीं है, सारे धाम उसी के हैं।

जिसका कोई नाम नहीं है, सारे नाम उसी के हैं।
जिसका कोई काम नहीं है, सारे काम उसी के हैं।

जिसका वैभव है यह सारा, वह सर्वथा अकिंचन है।
जिसका चिन्तन दुनिया करती , वह चिन्तन के बाहर है।

कभी न जन्मा जो इस जग में, सारे जन्म उसी के हैं।
कभी मृत्यु भी पास न आयी, सारे मरण उसी के हैं।

जिसने एक भी शब्द न बोला, सारे शब्द उसी के हैं
जिसने कभी न कलम उठायी, सारे लेख उसी के हैं।

उसका नमन करें हम कैसे, चरण नहीं जब उसके हैं?
उसका नमन करें हम कैसे, सारे चरण उसी के हैं?

--लक्ष्मीनारायण गुप्त
५ नवम्बर २००५

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