बहुरुपिया
झुरमुठों के बीच जो मुस्का रहा
इन्द्रधनु के रँगों में जो रम रहा
रंगशाला में वही है रंगरलियाँ भर रहा
और सप्तक के सभी सुर गा रहा
वही कारागार में दु:ख पा रहा
और फाँसीघर में फाँसी चढ़ रहा
जो अभी शिशु रूप में था पालने में सो रहा
वही मरघट में चिता पर जल रहा
वही मन्दिर का पुजारी है बना
जाके मस्जिद में वही मुल्ला बना
राजमन्दिर की नवोढ़ा सुघर शहज़ादी वही
और जनपथ की मलिन भूखी भिखारिन भी वही
बनके हिन्दू मन्दिरों को गढ़ रहा
तुर्क बनके फिर उन्हीं को ढह रहा
यह वही नटवर जो वृन्दावन में था
है वही हरफ़न जो हरकत कर रहा
मोहिनी बन दैत्यों को छल रहा
और शिव बन कर हलाहल पी रहा
वही रावण बन सिया को हर रहा
राम बन करके उसे फिर बध रहा
राम बन कर के निठुर जो, सिय की परीक्षा ले रहा
द्रौपदी का चीर करुणामय वही बढ़वा रहा
बनके अणुबम प्राणियों को हन रहा
बनके गाँधी शान्ति फिर फैला रहा
इस फ़रेबी का यक़ीं कोई नहीं
रूप अगणित बहुरुपिया यह निशिदिन धर रहा
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...२२ नवम्बर २००५



