(सभी को दिवाली की शुभ कामनायें।)
तुम दिवाली में दीपक जलाते रहो
अँधेरा मिटे, न मिटे, साथियो
जुगनुओं की तरह तुम टिमटिमाते रहो
रात काली रहे तो रहे, साथियो
तुम दिवाली.......
सितारों की तरह झिलमिलाते रहो
चाँद निकले, न निकले मेरे साथियो
प्रेम की वर्तिका तुम जलाते रहो
प्रिय आयें न आयें, मेरे साथियो
तुम दिवाली में दीपक......
नृत्य करते हुये तुम थिरकते रहो
प्रिय की वीणा बजे, न बजे, साथियो
पतवार नैया की अपनी चलाते रहो
तट आये, न आये, मेरे साथियो
तुम दिवाली में दीपक......
कदम पे कदम तुम बढ़ाते रहो
राह मीलों पड़ी तो पड़ी, साथियो
निज डगर पर हमेशा ही चलते रहो
कोई साथी मिले, न मिले, साथियो
तुम दिवाली में दीपक....
स्वाद जीवन का लेते रहो तुम सदा
चाहे कड़वा या मीठा, मेरे साथियो
प्रेम के गीत तुम गुनगुनाते रहो
कोई प्रेमी मिले न मिले, साथियो
तुम दिवाली में दीपक....
..लक्ष्मीनारायण गुप्त
२८ अक्टूबर २००५
At present, this blog is set up to publish my Hindi poems and accept comments from the readers. Some contributions from others are also published from time to time. Laxmi N. Gupta
Friday, October 28, 2005
Wednesday, October 26, 2005
नारी
नाचती है मरघट में जो कराल काली
वही है प्रियतमा मधु अधरों वाली
मोहन की राधा, वही मजनूँ की लैला
रोमियो की जुलियट और राम की सीता
पूर्णिमा है वही और अमावस्या काली
पूर्ण करती है वही मनोरथ सारे
चूर्ण करती है वही अरमान सारे
जननी है वही माँ अन्नपूर्णा
सजनी है वही अन्तःकक्ष की प्यारी
वही है नर्तकी रंगशाला की शोभा
विषकन्या भी वही, वही है माताहारी
नाचती है जो सदाशिव के शव पर
सती होती है वही पति की चिता पर
--लक्ष्मीनारायण गुप्त
२६ अक्ठूबर २००५
वही है प्रियतमा मधु अधरों वाली
मोहन की राधा, वही मजनूँ की लैला
रोमियो की जुलियट और राम की सीता
पूर्णिमा है वही और अमावस्या काली
पूर्ण करती है वही मनोरथ सारे
चूर्ण करती है वही अरमान सारे
जननी है वही माँ अन्नपूर्णा
सजनी है वही अन्तःकक्ष की प्यारी
वही है नर्तकी रंगशाला की शोभा
विषकन्या भी वही, वही है माताहारी
नाचती है जो सदाशिव के शव पर
सती होती है वही पति की चिता पर
--लक्ष्मीनारायण गुप्त
२६ अक्ठूबर २००५
Thursday, October 20, 2005
कहाँ है तू
कोयल की कूक में
पपीहे की हूक में
बसन्त बयार में
तूफानी घोर रव में
हिमगिरि के हिम में
ज्वालामुखी की लपट में
उषा की लालिमा में
रात्रि की कालिमा में
योगी के योग में
भोगी के भोग में
छिपा है तू ही अतल की गहराई में
और हिमालय की चोटी में
वीणा के सुरों में
तोपों के गर्जन में
बुद्ध की करुणा में
अणुबम के ध्वंश में
कुमारी के कौमार्य में
कामिनी के कटाक्ष में
सुखियों के नन्दन में
दुखियों के क्रन्दन में
आम की मृदुता में
नीम की कटुता में
रमा है तू ही कृष्ण के रास में
और शंकर के ताण्डव में
--लक्ष्मीनारायण गुप्त
२० अक्टूबर २००५
पपीहे की हूक में
बसन्त बयार में
तूफानी घोर रव में
हिमगिरि के हिम में
ज्वालामुखी की लपट में
उषा की लालिमा में
रात्रि की कालिमा में
योगी के योग में
भोगी के भोग में
छिपा है तू ही अतल की गहराई में
और हिमालय की चोटी में
वीणा के सुरों में
तोपों के गर्जन में
बुद्ध की करुणा में
अणुबम के ध्वंश में
कुमारी के कौमार्य में
कामिनी के कटाक्ष में
सुखियों के नन्दन में
दुखियों के क्रन्दन में
आम की मृदुता में
नीम की कटुता में
रमा है तू ही कृष्ण के रास में
और शंकर के ताण्डव में
--लक्ष्मीनारायण गुप्त
२० अक्टूबर २००५
Monday, October 17, 2005
एक पत्ती (द्वितीय दर्शन)
एक पत्ती जो अचानक बाग में तरु से गिरी
भूमि पथ पर अब पड़ी है यह निबल, निसहाय सी।
था सँजोया कभी इक डाली ने इसको नाज़ से
चन्द्र किरणों ने किया स्पर्श इसका लाड़ से।
था प्रभाकर की प्रभा ने कभी देखा इसे मनुहार से
काली बदली ने कभी नहलाया इसको जतन से।
मन्द शीतल पवन ने चूमा था इसको प्यार से
एक भौंरे ने किया गुंजार इसके पास में।
एक कोयल ने कभी गाया था पंचम निकट में
एक शिशु की उँगलियों ने कभी सहलाया इसको पुलक से।
आज पृथ्वी पर पड़ी है किन्तु कोई शोक का कारण नहीं
खाद बन कर पेड़ का पोषण करेगी यह सही।
लक्ष्मीनारायण गुप्त
१७ अक्टूबर २००५
भूमि पथ पर अब पड़ी है यह निबल, निसहाय सी।
था सँजोया कभी इक डाली ने इसको नाज़ से
चन्द्र किरणों ने किया स्पर्श इसका लाड़ से।
था प्रभाकर की प्रभा ने कभी देखा इसे मनुहार से
काली बदली ने कभी नहलाया इसको जतन से।
मन्द शीतल पवन ने चूमा था इसको प्यार से
एक भौंरे ने किया गुंजार इसके पास में।
एक कोयल ने कभी गाया था पंचम निकट में
एक शिशु की उँगलियों ने कभी सहलाया इसको पुलक से।
आज पृथ्वी पर पड़ी है किन्तु कोई शोक का कारण नहीं
खाद बन कर पेड़ का पोषण करेगी यह सही।
लक्ष्मीनारायण गुप्त
१७ अक्टूबर २००५
Wednesday, October 12, 2005
नेता जी का चरित्र
एक दिन भरी सभा के बीच
किसी ने लगाया लांछन
कि नेता जी का चरित्र
तो बड़ा अपवित्र है।
नेता जी बोले, " नहीं जी
मेरा चरित्र तो
गंगाजल की तरह
पवित्र है।"
दूर नहीं थी
गंगा जी की धारा
तो महँगू ले आया जल
भर कर एक लोटा।
दिखा कर
नेता जी से बोला
पवित्र भले ही हो लेकिन
यह जल गंदा बहुत है।
शायद आपका
चरित्र भी ऐसा ही
पवित्र भले ही हो लेकिन
गंदा बहुत है।
लक्ष्मीनारायण गुप्त
१२ अक्टूबर २००५
किसी ने लगाया लांछन
कि नेता जी का चरित्र
तो बड़ा अपवित्र है।
नेता जी बोले, " नहीं जी
मेरा चरित्र तो
गंगाजल की तरह
पवित्र है।"
दूर नहीं थी
गंगा जी की धारा
तो महँगू ले आया जल
भर कर एक लोटा।
दिखा कर
नेता जी से बोला
पवित्र भले ही हो लेकिन
यह जल गंदा बहुत है।
शायद आपका
चरित्र भी ऐसा ही
पवित्र भले ही हो लेकिन
गंदा बहुत है।
लक्ष्मीनारायण गुप्त
१२ अक्टूबर २००५
Friday, October 07, 2005
जीवन का कारण
खिलते हैं फूल,
चहकती हैं चिडियाँ।
बहता है पवन,
प्रवाहित हैं नदियाँ।
लहलहाती है घास,
चमकता है सूरज।
जलती है ज्वाला,
चमकती है बिजली।
गिरती है बरफ,
होती है वृष्टि।
पूँछना है व्यर्थ,
है इनका क्या कारण।
होता है यह सब,
केवल होने के कारण।
हर क्षण, प्रति पल,
होता जीवन नवीन।
मानव तू ही क्यों,
इतना गमगीन।
सृष्टि झूमती है सभी,
सर्वथा अकारण।
मानव ही पूँछता,
क्यों जीवन का कारण?
लक्ष्मीनारायण गुप्त
७ अक्टूबर २००५
चहकती हैं चिडियाँ।
बहता है पवन,
प्रवाहित हैं नदियाँ।
लहलहाती है घास,
चमकता है सूरज।
जलती है ज्वाला,
चमकती है बिजली।
गिरती है बरफ,
होती है वृष्टि।
पूँछना है व्यर्थ,
है इनका क्या कारण।
होता है यह सब,
केवल होने के कारण।
हर क्षण, प्रति पल,
होता जीवन नवीन।
मानव तू ही क्यों,
इतना गमगीन।
सृष्टि झूमती है सभी,
सर्वथा अकारण।
मानव ही पूँछता,
क्यों जीवन का कारण?
लक्ष्मीनारायण गुप्त
७ अक्टूबर २००५
Saturday, October 01, 2005
युग को दो वरदान
युग को दो वरदान मिले हैं, ऐटम और महात्मा गाँधी।
एक ओर विध्वंस गरजता
एक ओर वाणी कल्याणी,
भेद मात्र है लय, जीवन का,
दोनों की विपरीत कहानी,
देखें कौन विजयश्री पाये,
ऐटम याकि महात्मा गाँधी
युग को दो वरदान-----
मैं बढ़ जाऊँ, मिटे विरोधी,
ऐटम का सिद्धान्त यही,
बढ़ बापू की वाणी कहती,
ए विध्वंसक नहीं नहीं,
बढ़ कर स्वयं शत्रु को वल दो,
करते घोष महात्मा गाँधी
युग को दो वरदान-----
क्रूर शक्ति से दो गोलों की,
काँप रही है जगती सारी,
और विषमता में उलझी है
विकल मनुजता की सुकुमारी,
देखें कौन अश्रु हर सकता,
ऐटम याकि महात्मा गाँधी।
युग को दो वरदान-----
एक ओर ऐटम विभीषिका,
एक ओर ठिठका सा मानव,
एक ओर सर्वोदय की ध्वनि,
एक ओर शोषण का दानव,
देखें क्या गाँधी के सपने
रोके अपकर्षों की आँधी।
युग को दो वरदान-----
रावण की लंका पर चढ़ कर,
लाँघ क्रूर हिंसा की खाँई,
सत्य शान्ति का प्रबल अस्त्र ले,
गरज रही बापू की वाणी,
ऐटम विजयी या कि अहिंसा,
जिसने हिंसा की गति बाँधी।
युग को दो वरदान----
सत्यनारायण गुप्त, 'कुमुद'
बहराइच, उत्तरप्रदेश, भारत
यह कविता कुछ वर्ष पूर्व मेरे बड़े भाई श्री सत्यनारायण गुप्त ने लिखी थी। स्पष्ट है कि इसका संदेश अभी भी उतना ही ज्वलंत है जैसा तब था। मैं इसे गाँधी जी के पुण्य जन्म दिवस २ अक्तूबर २००५ के सम्मान में प्रकाशित कर रहा हूं।
लक्ष्मीनारायण गुप्त
१ अक्टूबर २००५
एक ओर विध्वंस गरजता
एक ओर वाणी कल्याणी,
भेद मात्र है लय, जीवन का,
दोनों की विपरीत कहानी,
देखें कौन विजयश्री पाये,
ऐटम याकि महात्मा गाँधी
युग को दो वरदान-----
मैं बढ़ जाऊँ, मिटे विरोधी,
ऐटम का सिद्धान्त यही,
बढ़ बापू की वाणी कहती,
ए विध्वंसक नहीं नहीं,
बढ़ कर स्वयं शत्रु को वल दो,
करते घोष महात्मा गाँधी
युग को दो वरदान-----
क्रूर शक्ति से दो गोलों की,
काँप रही है जगती सारी,
और विषमता में उलझी है
विकल मनुजता की सुकुमारी,
देखें कौन अश्रु हर सकता,
ऐटम याकि महात्मा गाँधी।
युग को दो वरदान-----
एक ओर ऐटम विभीषिका,
एक ओर ठिठका सा मानव,
एक ओर सर्वोदय की ध्वनि,
एक ओर शोषण का दानव,
देखें क्या गाँधी के सपने
रोके अपकर्षों की आँधी।
युग को दो वरदान-----
रावण की लंका पर चढ़ कर,
लाँघ क्रूर हिंसा की खाँई,
सत्य शान्ति का प्रबल अस्त्र ले,
गरज रही बापू की वाणी,
ऐटम विजयी या कि अहिंसा,
जिसने हिंसा की गति बाँधी।
युग को दो वरदान----
सत्यनारायण गुप्त, 'कुमुद'
बहराइच, उत्तरप्रदेश, भारत
यह कविता कुछ वर्ष पूर्व मेरे बड़े भाई श्री सत्यनारायण गुप्त ने लिखी थी। स्पष्ट है कि इसका संदेश अभी भी उतना ही ज्वलंत है जैसा तब था। मैं इसे गाँधी जी के पुण्य जन्म दिवस २ अक्तूबर २००५ के सम्मान में प्रकाशित कर रहा हूं।
लक्ष्मीनारायण गुप्त
१ अक्टूबर २००५
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