Tuesday, September 27, 2005

सम्राट और भिखारी

प्राचीन भारत की एक यह कहानी
एक सम्राट के पास आया एक भिखारी
हाथ में लिये था भिक्षा का कलश
नेत्रों में थी इक विलक्षण झलक

भिक्षुक बोला हे प्रतापी सम्राट
पूरी कर दो इस भिखारी की आस
भर दो यह मेरा भिक्षा पात्र
इसकी रिक्तता से मुझे अति सन्ताप

सम्राट बोला भिक्षु बस इतनी सी बात
भरवाता हूं तुम्हारा भिक्षा पात्र
क्या भरना चाहोगे इस पात्र में श्रमण
हीरे, जवाहरात, मणि, माणिक या कंचन

भिक्षु बोला राजन् कुछ भी भर दीजिये
कूड़े या कंचन की परवाह न कीजिये
खाली बस न रहे पात्र तनिक भी
अभिलाषा पूरी करिये यह मन की

सम्राट ने अपने अनुचरों को बुलाया
पात्र को मोतियों से भरने का आदेश सुनाया
पाठको हुआ तब यह अद्भुत चमत्कार
पात्र भरने के सब प्रयत्न हुये बेकार

भरते भरते रिक्त पात्र में मणि मोती
समा गयी राजा की सारी सम्पत्ती
सम्राट ने फिर की भिक्षु से विनय
श्रमण बताइये इस पात्र का रहस्य

लाये हो कहाँ से यह मायावी बर्तन
किसने बनाया है यह अन्तहीन भाजन
भिक्षु बोला राजन् नहीं इसमें कुछ रंजिश
मानव मन में जो और और की हविश
चिर लालायित जिससे मानव का मन
बनाया उसीसे यह अन्तहीन भाजन

लक्ष्मीनारायण गुप्त
२७ सितम्बर २००५

Thursday, September 22, 2005

हम हिन्दी वाले

हिन्दी को बनायेंगे राष्ट्रभाषा, हम हिन्दी वाले
यू एन में दिलायेंगे हिन्दी को मान्यता, हम हिन्दी वाले

बच्चों को भेजेंगे अंग्रेज़ी स्कूल में, हम हिन्दी वाले
हिन्दी पढ़ेंगे वहाँ वे अंग्रेज़ी माध्यम से, हम हिन्दी वाले

हिन्दी भाषी बच्चों को हिन्दुस्तानी इतिहास अंग्रेज़ी में पढ़ायेंगे
हम हिन्दी वाले
झगड़ा शुरू करके हिन्दी में, अन्त करेंगे उसे अंग्रेज़ी में
हम हिन्दी वाले

गौरव का विषय है हमारा हिन्दी का अज्ञान
हम हिन्दी वाले
मेरा बच्चा केवल हिन्दी में कमजोर है, कहते बड़े फख्र से
हम हिन्दी वाले

बोल नहीं पाता मैं अब ठीक से हिन्दी, कहते बड़े गर्व से
हम हिन्दी वाले
लिख नहीं पाता मैं अब हिन्दी में चिट्ठी, कहते बड़ी शान से
हम हिन्दी वाले

लक्ष्मीनारायण गुप्त
२२ सितम्बर २००५

Saturday, September 17, 2005

एक पत्ती

एक पत्ती जो अचानक बाग में तरु से गिरी
तुमने समझा यह निरर्थक मात्र इक पत्ती भली

जाने न तुम कि रहस्य जग का एक पत्ती में छिपा
देख सकते हो इसी में पूर्ण तरु की आत्मा

एक पत्ती जो अभी असहाय महि पर पड़ी है
बादलों में छा रही थी यह पवन की गोद में

तरू खड़ा जिस भूमि पर उस भूमि ने पाला इसे
राज़ मालुम हैं इसे सब बादलों के, भूमि के

एक पत्ती यह अगर होती नहीं संसार में
तरु नहीं होता नहीं होती हवा
नाचती थी मोद से पत्ती यह जिसकी गोद में

भूमि जिस पर वृक्ष यह है अति सघनता से खड़ा
इस एक पत्ती के बिना अस्तित्व इसका नहीं था

हो नहीं सकते थे वे बादल जिन्हें इसने छुआ
हो नहीं सकते थे तुम जिसकी नज़र में पत्ती गिरी
बिन तुम्हारे विश्व की सम्भावना सम्भव नहीं

लक्ष्मीनारायण गुप्त
१७ सितम्बर २००५

Tuesday, September 13, 2005

चार रसगुल्ले

जब पहुँचे ससुराल में पंडित रामाधार
साली की इक बात पर हँसे मूसलाधार

हँसे मूसलाधार जब पंडित रामाधार
साली कहे खिलाइये रसगुल्ले अब चार

साली की यह बात सुन पंडित रामाधार
पहुँच गये कुछ क्षणों में भीमसेन भंडार

भीमसेन भंडार से रसगुल्ले ले चार
लौटे फिर ससुराल को पंडित रामाधार

रसगुल्ले खाकर प्रसन्न हुई साली
पंडित के गालों पर लगादी अधरों की लाली

पहुँचे घर जब शाम को पंडित रामाधार
पत्नी की इक दृष्टि ने कर दिया बंटाढार

ग्रद्ध दृष्टि पत्नी की पड़ी जब गालों पर
पसीना आगया पंडित की पेशानी पर

बोले प्रिये, ऐसे नहीं देखो
पत्नी बोली आइने में मुँह देखो

आइना देख कर पंडित घबराये
खिसिया कर ये दीन वचन फरमाये

बोले डार्लिंग नहीं मेरी गलती है
मेनका तुम्हारी बहन बड़ी चंचल है

पत्नी बोली, मियाँ तुम्हारी यह हरकत
प्रायश्चित के बिना नहीं छूटोगे हजरत

पलट के अभी तुम तुरन्त जाओ
भीमसेन भंडार से चार रसगुल्ले लाओ

लक्ष्मीनारायण गुप्त
१३ सितम्बर २००५

Monday, September 12, 2005

गणेश जी का महाभारत लेखन

महाभारत के एक लाख श्लोकों की मानस-रचना हो चुकी थी
किन्तु वेद-व्यास जी को बड़ी चिन्ता हो रही थी।
कौन लेखन करेगा इस विशाल साहित्य का
साधारण लिपिक के लिये ये मामला नहीं बस का।
इसी उधेड़बुन में व्यास जी पड़े थे
तभी घूमते फिरते नारद जी आन पड़े थे।
सुन कर व्यास जी की कहानी
नारद जी ने कहा सुनिये मेरी ज़बानी।
अभी मैं कैलाश से लौट रहा हूँ
पार्वतीनन्दन गणेश से मिल कर आ रहा हूँ।
यदि मिल जाये आपको लिपिक गजानन जैसा
सरल हो जायेगा काम महाभारत लेखन का।
व्यास जी ने किया जैसे ही गजानन का ध्यान
क्षण मात्र में ही प्रकट हो गये गणेश भगवान।
गणेश जी ने कहा, सुना है आपको एक लिपिक की तलाश
बन्दा हाज़िर है आपकी सेवा में मुनिराज।
लेकिन एक शर्त आप मेरी सुन लीजिये
मुझे इन्तज़ार करने का मौका न दीजिये।
यदि मेरी लेखनी को कभी रुकना पड़ेगा
तो महाभारत लेखन का काम अधूरा रहेगा।
व्यास जी ने कहा एक शर्त मेरी भी सुनिये
बिना अर्थ समझे आप कुछ भी न लिखिये।
जितनी जल्दी व्यास जी श्लोक बोलते थे
उतनी ही जल्दी गणेश जी उसे लिख डालते थे।
बीच बीच में व्यास जी एक कठिन श्लोक बोल देते थे
जब तक गणेश जी उसे समझते थे
व्यास जी दो चार नये श्लोक बना लेते थे।
श्रोताओ इस तरह हुआ महाभारत का लेखन
सुना है आपने यह चरित्र अति पावन।

लक्ष्मीनारायण गुप्त
१२ सितम्बर २००५

Saturday, September 10, 2005

घास, प्रेम और तत्वज्ञान

पूज्य पिता जी बोले यों
पुत्र आज तुम गुम सुम क्यों
काटी नहीं है तुमने यह घास
प्रापर्टी वैल्यू का होगा अब लास

पिताजी अब आपसे क्या छिपाना
लड़की एक मिलीथी अति हसीना
हँसी है उसकी इतनी अभिराम
राचेस्टर में आया ज्यों आइस स्टार्म

दाँतों की उसकी सफेदी है यों
बफेलो में जैसी गिरती है स्नो
नयन बने हैं उसके ऐसे बाँके
लगते हैं जैसे खरबूजे की फाँकें

गर्दन है उसकी पतली लचीली
पार्क में बहती ज्यों क्रीक गर्वीली
बाल हैं उसके ऐसे काले काले
स्मोक स्टैक के धुयें के रंग वाले

बोलती है जब यह कन्या सुकुमार
मेरे तन मन में आजाती है बहार
दिल में उसने कर दिया है एक सुराख
निकल रही है जिससे मुहब्बत बेतहाश

पिताजी बोले पुत्र मुझे पूरा विश्वास
घास काटने से दिल होजाता है बिल्कुल साफ
पुत्र मैंने भी बहुत बेले हैं पापड़
घास काटने से बड़ी प्रेम की कोई दवा नहीं बेहतर

पिताजी बोले सुनो यह पुराना इतिहास
टीन एज का प्रेम है जैसे वसन्त की घास
ज्यों वसन्त की घास अप्रैल में लहलहाती है
अगस्त की गर्मी में बिल्कुल सूख जाती है

थम न सकेगा प्रेम तुम्हारा इसी तरह यह
उतर जायगा चन्द दिनों में यह अति निश्चय
चान्स यह भी तो है पुत्र जरा सोचो
घास भी न डाले कन्या यह तुमको

पिताजी बोले पुत्र यह पुरानी कहानी
वैसम्पायन जी ने सुनायी थी सूत जी को जबानी
प्रेम के चक्कर से रहो तुम दूर
नारद जी की कथा बड़ी है मशहूर

बन्दर बनके हुयी बहु हँसी
प्रियतमा मन की मिली नहीं तब भी
नल दमयन्ती ने भी यही आजमाया
प्रेम के चक्कर ने बहुत भरमाया

बाद के कवियों ने भी यही गाया
रोमियो और जुलियट ने अति कष्ट पाया
शीरी फरहाद की भी यही दशा
हीर और राँझा की बड़ी दुर्दशा

मानो अब पुत्र तुम मेरी यह बात
होगा तत्वज्ञान जब काटोगे घास
घास काटते हुये करो ऐसा ध्यान
घास के साथ हो प्रेम का भी व्यवधान

घास काटने का है ऐसा माहात्म्य
काटे जो प्रेम से मिटें सारे सन्ताप
घास योग की कुछ महिमा ही ऐसी
समझे जो इसे उसे मोहे न उर्वशी

-----लक्ष्मीनारायण गुप्त
९ सितम्बर २००५

Wednesday, September 07, 2005

लाला दीनदयाल का अमेरिका निवास

कुछ दिन अमरीका रहे लाला दीनदयाल
पुत्र मनोहरदास से बोले कर कुछ ख्याल

बुरा न मानो पुत्र अगर मैं कुछ कह जाऊँ
अमरीका के रहन सहन की बात चलाऊँ

गाड़ी अपनी है सही पुत्र बड़ी यह बात
शोफ़र नहीं लगा सके तुम कैसे, हे तात

बर्तन धोने के यहाँ साधन विविध प्रकार
महरी नहीं लगा सके क्यों तुम बरखुरदार

वैकुअम क्लीनर की शोभा बड़ी न्यारी
नौकरों की कमी लेकिन खटकती है भारी

माली नहीं लगा सके पुत्र मनोहरदास
पी एच डी के बाद भी स्वयं काटते घास

स्वयं काटते घास पुत्र तुम आफिस जाते
चपरासी भी नहीं वहाँ पर जिससे चाय मँगाते

नहीं मिलती हैं यहाँ पर खस्ता कचौरी
नहीं मिल पाती हैं पान की भी गिलौरी

चलते नहीं यहाँ पर पुत्तर रिक्शे ताँगे
जा सकते हैं नहीं कहीं बिन राइड माँगे

बोले दीनदयाल सबर्ब में बसें न चलतीं
डाउन टाउन में जीवन की सामत आती

रास तुम्हें ही आये, पुत्र यह जीवन विकट
मेरे लिये तो मँगवादो एअरइन्डिया से टिकट

-----लक्ष्मीनारायण गुप्त
७ सितम्बर २००५

Saturday, September 03, 2005

जीवन सफल बना दो

(एक आधुनिक भक्त की निष्कपट प्रार्थना)

जीवन सफल बना दो, प्रभु जी

जीवन प्यारा है सबर्ब का
मुझ को सुलभ करा दो प्रभु जी
एक कोलोनियल भवन भव्य सा
लांग आइलैन्ड में दिलवा दो प्रभु जी
एक बड़ा सा लान हो जिसमें
सन्तरी सहित दिला दो प्रभु जी
जीवन सफल-----

कन्ट्रीक्लब की सदस्यता भी
मुझको अब दिलवा दो, प्रभु जी
डाज पुरानी हुयी प्रभु जी
मर्सेडीज बेन्ज़ दिला दो, प्रभु जी
या फिर प्रभु जी बहुत दिनों से आँख लगी है जैगुआर पर
मेरे कर लगवा दो, प्रभु जी
जीवन सफल-----

नौका एक यंत्र संचालित, जलक्रीड़ा करने को
मुझको अब मिलवा दो, प्रभु जी
ग्रीष्म भवन इक सागर तट पर
जल्दी से बनवा दो, प्रभु जी
किसी हसीन शोख कन्या से
परिचय भी करवा दो, प्रभु जी
जीवन सफल----

जैगुआर से शैर करेंगे
लास वेगास जायेंगे, प्रभु जी
शकुनी सी कुशलता जुयें में
अब मुझको सिखला दो, प्रभु जी
या फिर मेरे नाम बड़ी सी
लाटरी इक खुलवा दो, प्रभु जी
जीवन सफल----

इतना सब यदि कर दोगे तो
वादा मैं करता हूँ, प्रभु जी
सत्यदेव की सुन्दर गाथा
मन्दिर में करवाऊँ, प्रभु जी
और साधु बनिये की माफिक
भूल नहीं जाऊँगा, प्रभु जी
जीवन सफल----


लक्ष्मीनारायण गुप्त
३ सितम्बर २००५

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