सम्राट और भिखारी
प्राचीन भारत की एक यह कहानी
एक सम्राट के पास आया एक भिखारी
हाथ में लिये था भिक्षा का कलश
नेत्रों में थी इक विलक्षण झलक
भिक्षुक बोला हे प्रतापी सम्राट
पूरी कर दो इस भिखारी की आस
भर दो यह मेरा भिक्षा पात्र
इसकी रिक्तता से मुझे अति सन्ताप
सम्राट बोला भिक्षु बस इतनी सी बात
भरवाता हूं तुम्हारा भिक्षा पात्र
क्या भरना चाहोगे इस पात्र में श्रमण
हीरे, जवाहरात, मणि, माणिक या कंचन
भिक्षु बोला राजन् कुछ भी भर दीजिये
कूड़े या कंचन की परवाह न कीजिये
खाली बस न रहे पात्र तनिक भी
अभिलाषा पूरी करिये यह मन की
सम्राट ने अपने अनुचरों को बुलाया
पात्र को मोतियों से भरने का आदेश सुनाया
पाठको हुआ तब यह अद्भुत चमत्कार
पात्र भरने के सब प्रयत्न हुये बेकार
भरते भरते रिक्त पात्र में मणि मोती
समा गयी राजा की सारी सम्पत्ती
सम्राट ने फिर की भिक्षु से विनय
श्रमण बताइये इस पात्र का रहस्य
लाये हो कहाँ से यह मायावी बर्तन
किसने बनाया है यह अन्तहीन भाजन
भिक्षु बोला राजन् नहीं इसमें कुछ रंजिश
मानव मन में जो और और की हविश
चिर लालायित जिससे मानव का मन
बनाया उसीसे यह अन्तहीन भाजन
लक्ष्मीनारायण गुप्त
२७ सितम्बर २००५



