मज़हब और शोर का बड़ा गहरा रिश्ता है
सुनाऊँ मैं आपको बयाँ यह सच्चा है।
कई साल बाद मैं अमेरिका से भारत पहुँचा
ससुराल में साली सलहजों ने बड़े प्रेम से रक्खा।
गर्मी का मौसम था छत पर बिस्तरा बिछाया
नींद गहरी आयी, शीतल मंद, सुगंध पवन आया।
इक सुनहरे सपने में हम हो रहे थे निहाल
कि एक बुलंद आवाज़ आयी सत् श्री अकाल।
पता चला पड़ोसी सरदार जी भक्तिविभोर हो रहे थे
अपनी खुली छत पर सवेरे तीन बजे अकालपुरुष से आत्मनिवेदन कर रहे थे।
अगले दिन का ऐसा कार्यक्रम था
बहन के गाँव जाने का यह दिन था।
वहाँ भी दीदी जीजा ने किया बड़ा स्वागत
आने की खुशी में दे डाली एक दावत।
मज़हब ने फिर दुःख दिया रात में
सवेरे चार बजे लाउडस्पीकर से अजान की आवाज़ आयी जोर से।
आने लगीं फिर कव्वालियाँ जोर शोर से
नींद का खात्मा और चिड़चिड़ेपन की शुरुवात हुयी वेग से।
अगले दिन कानपुर जाना था एक मित्र के पास
सोचा आज तो गुजरेगी चैन से रात।
मित्र के घर के सामने खुला मैदान था
वहीं पर चारपाई डाल के सोने का विधान था।
किन्तु फिर वही हुआ जो होना था
पड़ोस में हो रहा देवी का जगरता था।
चौथी रात मैंने अपने गाँव में बिताई
छोड़ दिया अपने को राम सहारे भाई।
सुनहरी रात में मच्छर भिनभिना रहे थे
लगा जैसे वे भी भजन कर रहे थे।
मच्छर लेकिन एक गलती कर रहे थे
प्रभु के कानों की जगह मेरे कानों मे गा रहे थे।
मच्छरी सराउनड साउन्ड से हो सराबोर
आर्त ध्वनि से चीखा, बचाओ मच्छरों से हे नन्दकिशोर।
मेरी पुकार में इतनी आर्तता न थी भाई
रेंग सके प्रभु के कान पर जूँ भी भाई।
किन्तु मेरी चीख ने कैसी दुश्मनी निभाई
पड़ोसी नन्दू पहलवान की नींद खुला आई।
लाठी लेकर वह तुरन्त आया
गुस्से से हमारा दरवाजा खटखटाया।
बड़ी भाभी ने आकर दरवाजा खोला
नन्दू उनसे कुछ नरम होकर बोला।
भाभी ने कहा, नन्दू जी बुरा नहीं मानिये
देवर जी तेज़ बुखार में कुछ बड़बड़ा रहे थे, यह सच मानिये।
सवेरे जागने पर मुझे कुछ ऐसा इलहाम हुआ
सारे धर्मों का निचोड़ मैंने जान लिया।
यह गूढ़ तत्व नहीं किसी को बताया है
किन्तु आप पाठकगण मेरे परम मित्र हैं, इससे फरमाया है।
मित्रो, मेरी बात को परम सत्य मानो
सर्व धर्म निष्कर्ष है कोलाहल, ऐसा मानो।
जितना ही भीषण तुम्हारा चीत्कार होगा
उतना ही अधिक प्रभु को तुमसे प्यार होगा।
लक्ष्मीनारायण गुप्त
अगस्त २००५