Wednesday, August 31, 2005

एक गज़ल

अब हमारे पास क्यों तुम आ रहे हो
दे के फिर झूठा सहारा क्यों हमें तरसा रहे हो

क्यों खड़े होते हो आके आड़ में तुम
देख के मेरी तरफ मुस्का रहे हो

दूर ही जाना है तो जाओ शौक से
क्यों हमें तुम इस कदर भरमा रहे हो

हम जियें या मरें तुम को वास्ता क्या
चैन की बंशी बजाते जा रहे हो

हमें भी अब आगयी है समझ इतनी
तुम हमें पागल ज़रूर बना रहे हो

बन के पागल हम तुम्हारे नाम की माला जपें
तुम हमारा दिल दुखाते जा रहे हो

है अभी भी वक्त गर तुम वाकई में पास आते
क्यों नहीं यह भरम तुम सच्चा बनाने आ रहे हो

---लक्ष्मीनारायण गुप्त

Tuesday, August 30, 2005

प्रौढ़ प्रणय निवेदन

उम्र अब साठ की हो रही है
तबीयत किन्तु रसिकों सी मचल रही है

मैंने कहा प्रिये हो जाओ बाहुपाश में बद्ध
उसने कहा आपकी तोंद कर रही है मेरी गति अवरुद्ध

मैंने कहा सुन्दरी क्यों न हम काम-केलि करें
उसने कहा आप अपनी उम्र का लिहाज़ करें

मैंने कहा तुम्हारी हँसी में दामिनी दमकती है
उसने कहा आपकी चाँद भी चमकती है

मैंने कहा प्रिये तुम्हारी चाल हिरनी सी है
उसने कहा आपकी टाँगें बगले सी हैं

मैंने कहा प्यारी सुनाओ एक गाना
उसने कहा बाज़ार से सब्ज़ी लेते आना

मेंने कहा तुम्हारे तन से आती है सुगन्ध
उसने कहा बुढ़ापे से आपकी बुद्धि है मन्द

मैंने कहा मेरे मन में उमंगें फड़कती हैं
उसने कहा मेरी तो हड्डियाँ कड़कती हैं

मैंने कहा मेरे मन में अनंग मचल रहा है
उसने कहा मेरा तो मुआ सर दुख रहा है

लक्ष्मीनारायण गुप्त
अगस्त २००५

Sunday, August 28, 2005

मज़हब और शोर का रिश्ता

मज़हब और शोर का बड़ा गहरा रिश्ता है
सुनाऊँ मैं आपको बयाँ यह सच्चा है।

कई साल बाद मैं अमेरिका से भारत पहुँचा
ससुराल में साली सलहजों ने बड़े प्रेम से रक्खा।

गर्मी का मौसम था छत पर बिस्तरा बिछाया
नींद गहरी आयी, शीतल मंद, सुगंध पवन आया।

इक सुनहरे सपने में हम हो रहे थे निहाल
कि एक बुलंद आवाज़ आयी सत् श्री अकाल।

पता चला पड़ोसी सरदार जी भक्तिविभोर हो रहे थे
अपनी खुली छत पर सवेरे तीन बजे अकालपुरुष से आत्मनिवेदन कर रहे थे।

अगले दिन का ऐसा कार्यक्रम था
बहन के गाँव जाने का यह दिन था।

वहाँ भी दीदी जीजा ने किया बड़ा स्वागत
आने की खुशी में दे डाली एक दावत।

मज़हब ने फिर दुःख दिया रात में
सवेरे चार बजे लाउडस्पीकर से अजान की आवाज़ आयी जोर से।

आने लगीं फिर कव्वालियाँ जोर शोर से
नींद का खात्मा और चिड़चिड़ेपन की शुरुवात हुयी वेग से।

अगले दिन कानपुर जाना था एक मित्र के पास
सोचा आज तो गुजरेगी चैन से रात।

मित्र के घर के सामने खुला मैदान था
वहीं पर चारपाई डाल के सोने का विधान था।

किन्तु फिर वही हुआ जो होना था
पड़ोस में हो रहा देवी का जगरता था।

चौथी रात मैंने अपने गाँव में बिताई
छोड़ दिया अपने को राम सहारे भाई।

सुनहरी रात में मच्छर भिनभिना रहे थे
लगा जैसे वे भी भजन कर रहे थे।

मच्छर लेकिन एक गलती कर रहे थे
प्रभु के कानों की जगह मेरे कानों मे गा रहे थे।

मच्छरी सराउनड साउन्ड से हो सराबोर
आर्त ध्वनि से चीखा, बचाओ मच्छरों से हे नन्दकिशोर।

मेरी पुकार में इतनी आर्तता न थी भाई
रेंग सके प्रभु के कान पर जूँ भी भाई।

किन्तु मेरी चीख ने कैसी दुश्मनी निभाई
पड़ोसी नन्दू पहलवान की नींद खुला आई।

लाठी लेकर वह तुरन्त आया
गुस्से से हमारा दरवाजा खटखटाया।

बड़ी भाभी ने आकर दरवाजा खोला
नन्दू उनसे कुछ नरम होकर बोला।

भाभी ने कहा, नन्दू जी बुरा नहीं मानिये
देवर जी तेज़ बुखार में कुछ बड़बड़ा रहे थे, यह सच मानिये।

सवेरे जागने पर मुझे कुछ ऐसा इलहाम हुआ
सारे धर्मों का निचोड़ मैंने जान लिया।

यह गूढ़ तत्व नहीं किसी को बताया है
किन्तु आप पाठकगण मेरे परम मित्र हैं, इससे फरमाया है।

मित्रो, मेरी बात को परम सत्य मानो
सर्व धर्म निष्कर्ष है कोलाहल, ऐसा मानो।

जितना ही भीषण तुम्हारा चीत्कार होगा
उतना ही अधिक प्रभु को तुमसे प्यार होगा।

लक्ष्मीनारायण गुप्त
अगस्त २००५

Friday, August 26, 2005

हिन्दी का महाकवि

मुझ से मिलिये मैं हूँ हिन्दी का महाकवि
आचार्य कहते हैं लोग मुझे ऐसी मेरी जनता में छवि

मातृभाषा की निशि-दिन सेवा करता हूँ
सरकारी अभिनन्दन ग्रन्थ की आशा रखता हूँ

हिन्दी का कवि हूँ, अंग्रेज़ी पढ़ाता हूँ
महत्वपूर्ण लोगों से अंग्रेज़ी ही बोलता हूँ

हो रहा है मेरे ग्रन्थों पर शोधकार्य
माध्यमिक परीक्षा में मेरी शैली पूँछी जाती है आर्य

मेरी महिमा गाते हैं पत्र-पत्रिकायें
छुटभैये कवि चलते हैं दायें और बायें

मिलता है कभी कभी कवि कोई ऐसा पागल
नहीं है जो मेरी प्रतिभा का कायल

पार लगेगी कैसे इन मूर्खों की नैया
मेरे चरणों में जब तक नहीं बैठेंगे भैया

आत्मप्रशंसा की मुझे किंचित है आदत
आशा है आपको थी सुनने की फुरसत

..लक्ष्मीनारायण गुप्त
२६ अगस्त २००५

Thursday, August 25, 2005

वृन्दावन

प्रस्तुत है कृष्ण जन्माष्टमी के उपलक्ष परः

चल मन अब उस वृन्दावन में
माधव के उस कुंज भवन में
प्यारी की बस एक झलक में
केशव के केशों की लट में
पागल खुद को तू उलझा दे
चल मन------

बरसेंगे जब मेहा रिमझिम
नाचेगी जब राधा हँसती
फिर कदम्ब तरु के नीचे से
मोहन की उभरेगी वंशी
रस की इस मीठी धारा का
पान करे मन वृन्दावन में
चल मन-----

माधव के मद भरे नयन हैं
राधा की मधुमय चितवन है
तान रसीली वंशी की है
रुनझुन पायल की है
ये सब हैं जिस वृन्दावन में
चल मन-----

मोर नाचते हैं प्यारी संग
ताल दे रहे हैं कपोत गण
यह स्वर्णिम संगीत जहाँ है
कालिन्दी का कूल जहाँ है
बनकुसुमों की बास जहाँ है
मधुरस की बरसात जहाँ है
चल मन-----

लक्ष्मीनारायण गुप्त
२५ अगस्त २००५

दो पुरुषार्थ

शास्त्रों ने कहा, हैं चार पुरुषार्थ
धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, जग में विख्यात
फिलहाल प्रभु, काम और अर्थ की कामना
धर्म और मोक्ष की है बाद में सम्भावना

जैसे मिली थी प्रभु, नल को दमयन्ती और राम को सीता
सत्यवान को सावित्री और अगस्त्य को लोपा
वैसे प्रभु दिलाओ मुझे पत्नी कोमलांगी
सीता और सावित्री जैसे सती साध्वी

साथ में ही प्रभु यदि एक प्रेमिका मिल जाये
सोने में जैसे सोहागा लग जाये
जैसे मिलायी थी प्रभु भीम से हिडिम्बा और अर्जुन से उलूपी
वैसे ही मिलादो प्रभु मुझसे भी एक प्रेयसी
मिलायी थी प्रभु जैसे विश्वामित्र से मेनका और क्लिंटन से मोनिका
वैसे ही मिलवा दो प्रभु मुझसे भी एक प्रेमिका

जैसे दिया था प्रभु कुबेर को पुष्पक विमान
इच्छा है मेरी कि अपना हो वायुयान
वायुमान में बैठ कर बजायें हम वंशी
साथ में बैठी हो प्रभु अपनी एक प्रेयसी

इच्छा है प्रभु कि अपना हो याट
खायें हम जिसमें बैठकर चाट
साथ में हों कुछ घनिष्ठ यार दोस्त
चल रहा हो कुछ जामों का दौर
इतनी कृपा करो हे पुरुष अकाल
अनन्त सप्लाई में हो जानीवाकर लाल

....लक्ष्मीनारायण गुप्त
२४ अगस्त २००५

Tuesday, August 23, 2005

अँधेरा

वेद पुराण बाइबल और कुरान
करते सब रोशनी की महिमा का गान
अँधेरे का सभी करते असम्मान
नहीं इनको इसके महत्व का ज्ञान

अँधेरे में सारे रंग होते हैं
अँधेरे में सपने सतरंग होते हैं
अँधेरे में साँसों के तार बजते हैं
अँधेरे में प्रेमी अन्तरंग होते हैं

अँधेरी रात में भीषण वृष्टि होती है
जल ही जल से धरा आप्लावित होती है
गहन अँधेरे में आते हैं कृष्ण
अपनाते हैं वे अँधेरे का रंग

अँधेरे में आते हैं घनश्याम
अँधेरी हैं राधा की लटें अभिराम
अँधेरी रात में तब अभिसार होता है
अँधेरे में बड़ा चमत्कार होता है

अँधेरा ढकता नगर का मलिन अंचल
अँधेरा रखता नग्न बदनों की लाज
अँधेरा लाता थकी आँखों में नींद
अँधेरा देता नयी ऊर्जा को जन्म

अँधेरा विस्मय अँधेरा अज्ञान
अँधेरे से ही उपजता सारा ज्ञान
अँधेरा सभी कौतुकों का मूल
विश्व इस मूल से निकला हुआ फूल

कभी अँधेरे को गहराई से देखो
उसकी सलोनी सलवटों को देखो
बैठ कर करो कभी अँधेरे में ध्यान
अँधेरे के रंगों का होगा तब भान

....लक्ष्मीनारायण गुप्त
२३ अगस्त २००५

Monday, August 22, 2005

बड़े कमाल की बात



बड़े कमाल की यह बात हो रही है
भारत में दोमुखी प्रगति हो रही है।
अंग्रेज़ी भाषा की धाक बढ़ रही है
हिन्दी चलचित्रों की माँग बढ़ रही है।
एक ओर कृत्रिम उपग्रह बन रहे हैं
दूसरी ओर मेहतर मल उठा रहे हैं।
निजीकरण का कहीं जोर चल रहा है
पेप्सी में पेस्टीसाइड पड़ रहा है।
देखिये नित नये भवन बन रहे हैं
सड़कों पर कचरे के ढेर लग रहे हैं।
एक ओर नया चमचमाता अस्पताल बन रहा है
दूसरी ओर एड्स बेतहाशा बढ़ रहा है।
आउटसोर्सिंग की बड़ी धूम हो रही है
पार्वती देवी पैट्रीशिया बन रही हैं।
एक तरफ हम पश्चिमीकरण करते हैं
दूसरी तरफ नववधुओं को ज़िन्दा जलाते हैं।
कान्वेन्ट स्कूलों की माँग बढ़ रही है
विश्व हिन्दू परिषद की साख बढ रही है।
एक तरफ बेतहाशा अंग्रेज़ियत बढ़ रही है
दूसरी तरफ हिन्दुत्व की शान बढ़ रही है।

लक्ष्मीनारायण गुप्त
22 अगस्त २००५

Saturday, August 20, 2005

कविगोष्ठी में तालियाँ



कहीं पर एक कविगोष्ठी हो रही थी
जोर से तालियों की गड़गड़ाहट हो रही थी।
एक सज्जन को जिन्हें थोड़ा सा जुकाम हो रहा था
इन तालियों का दौर बिलकुल नहीं जम रहा था।
कयोंकि वे सीरियस किस्म के इन्सान थे
और अपनी सीरियस कमाई के पैसे
तालियों जैसी गैरसीरियस चीज़ों पर नहीं बरबाद करना चाहते थे।
उन्होंने संयोजक जी को ढूँढ़ कर कहा कि
आप ये तालियाँ तुरन्त बन्द करवाइये
और फौरन कुछ कवितायें सुनवाइये।
अच्छा हो कि आप तालियाँ बिलकुल ही बन्द करा दीजिये।
श्रोताओं से कहिये कि यदि उन्हें दाद ही देनी है
तो कवि जी के घर पर जाकर तालियाँ बजाइये
या उनको डाक से भेजिये यह समाचार
कि आपकी कविता वाकई में थी मज़ेदार।
संयोजक ने कहा, भाई डाक तो बहुत देर से पहुँचती है।
सीरियस श्रोता ने सलाह दी कि भाई
फैक्स से या फोन से तालियाँ भिजवा दीजिये
और आजकल तो ईमेल भी है।
मध्यान्तर के बाद जब फिर कविगोष्ठी शुरू हुयी
संयोजक जी ने यह ताली विरोधी घोषणा की
कि कविगोष्ठी एक सीरियस बिज़नेस है
इसमें तालियाँ पीटना बड़ी बचकानी आदत है।
अगर आप को दाद ही देनी हो तो
याद रख के कवि जी के घर पर जाकर तालियाँ बजाइये
या उनको तालियाँ फोन पर बजाकर सुना दीजिये
या तालियों की तस्वीर ईमेल से भेज दीजिये।
इस घोषणा के दस मिनट बाद
तीन श्रोता और चार कवि अभी भी
सीरियस कविगोष्ठी का आनन्द ले रहे थे।
एक कवि रचना सुना रहे थे
और छै लोग बैठे ऊँघ रहे थे।

लक्ष्मीनारायण गुप्त
20 अगस्त 2005

Thursday, August 18, 2005

एक बूँद



एक बूँद से बह सकती है रस की गंगा
एक पुष्प से हो सकता है प्रभु का पूजन।

एक ओस की बूँद बन गयी मोती
एक व्यंग्य बन गया महाभारत का कारण।

एक बुद्ध से जागी सारे जग की करुणा
एक कृष्ण की वंशी से सारा जग मोहित।

एक भगीरथ के द्वारा सब कुल का तारण
एक दशानन बना पूर्ण कुल क्षय का कारण।

एक प्रेम की चितवन से तन मन आल्हादित
एक द्वेष की दृष्टि बढ़ाती है दुःख दारुण।

एक सूर्य की किरणों से सब विश्व प्रकाशित
एक मदन की मादकता से सब जग मोहित।

एक ज्ञान की किरण मिटाती सारी जड़ता
एक दीप से जल सकते हैं सारे दीपक।

एक अनाहत ध्वनि से उपजीं सारी ध्वनियाँ
एक ॐ की महिमा से बन गये शास्त्र सब।

एक डली से मिट्टी की खुलते सब भेद मही के
एक बुद्ध की सम्बोधी से बुद्ध सभी बन सकते।

लक्ष्मीनारायण गुप्त
१८ अगस्त २००५

Monday, August 15, 2005

स्वतंत्रता दिवस २००५

आज भीतर भावना जागी हुयी है
आज कवि की कल्पना जागी हुयी है
आज कुछ सपने सुहाने आ रहे हैं
आज हम फिर गीत गाने जा रहे हैं।

आज भारत भूमि में इक नव सवेरा
इक नई शुरुआत में है देश मेरा
कई दशकों की पुरानी नींद इस की खुल रही है
महक ताज़ी नव प्रसूनों की हमें अब आ रही है।

कुछ नई ध्वनियाँ सुनाई दे रही हैं
गीत ये कुछ नव पुरातन गा रही हैं
आज इक नव ताल सुन कर थिरकता है पैर मेरा
नये अरमानों से भरा है हृदय मेरा।

लक्ष्मीनारायण गुप्त
१५ अगस्त २००५

Saturday, August 13, 2005

माया के गर्भ से



माया के गर्भ से ही जन्मता है बुद्ध
कोयले से बना है चमकता हुआ हीरा।
पहाड़ों की कठोर, स्थिर चट्टानों से
द्रवित होती है तरल सरिता की धारा।
भोगी में ही योगी बनने का कौशल
संसारी में ही संन्यासी बनने की क्षमता।
रत्नाकर ही केवल बन सकता वाल्मीकि
क्रौन्चवध के बिना कैसे बनती आदि कविता।
अजामिल से ही है नारायण की महिमा
गजेन्द्रमोक्ष के लिये है ग्राह की आवश्यकता।
घनघोर, काले बादलों के बीच से ही
निकलती है चमचमाती हुयी चपला।

लक्ष्मीनारायण गुप्त
अगस्त २००५

Wednesday, August 10, 2005

एक व्यंग्य की कविता



एक बार की बताऊँ, तुमको मित्रो
एक व्यंग्य की कविता छपवानी थी हमको।

कविता लिख कर जतन से बहुत आस के साथ
बड़े प्रेम से भेज दी सम्पादक के पास।

बीत गया कुछ वक्त जब मिला नहीं कुछ हाल
बिजली वाली डाक (email) से पूछा हाल-हवाल।

पूछा हाल-हवाल, यार, जब पता न पाया
सम्पादक की चिट्ठी पाकर मज़ा न आया।

सम्पादक ने कहा वैसे कविता तो सोणी है
अंग्रेज़ी शब्दों ने इसकी शोभा कुछ छीनी है।

इस पत्रिका का कुछ अपना स्तर है
अंग्रेज़ी शब्दों का इसमें नहीं स्वागत है।

मैने लिखा, यार, संशोधन कर दूँगा
पत्रिका के पाखंड की इज्ज़त रख लूँगा।

(ज़ाहिर है कि आखिरी पंक्ति मैंने केवल अपने आप से कही, सम्पादक को नहीं भेजी। कविता तो अभी भी प्रकाशित करानी थी, ना।)

लक्ष्मीनारायण गुप्त
१० अगस्त २००५

Monday, August 08, 2005

इन्द्र-मद-भंग



प्राचीन काल की है यह कथा
वृत्रासुर एक महादैत्य था
कर रक्खा था देवताओं की नाक में दम
हो रही थी उससे त्रिलोकी विकल

वृत्रासुर ने किया यह अनुमान
अखिल विश्व में हो मेरा ही विधान
धारण करके उसने अति विशाल रूप
विश्व के जल को किया अवरुद्ध

नरलोक, सुरलोक, नागलोक मेँ
त्राहि, त्राहि मच गई सारे जगत मेँ
देख करके प्राणियों की यह दशा
इन्द्र के मन में हुई अति व्यथा

करने को जीव दुःख का निवारण
शचिपति ने किया महावज्र धारण
पहुँचे जहाँ पर था सुमेरु पर्वत
कर रखा था जिसको दैत्य ने आवृत्त

किया बार ऐसा उदर में उसके
एक ही बार मेँ छूट गये सारे छक्के
प्रवाहित हुआ फिर से जग में निर्मल जल
सुखी अति हुये सभी सुर, असुर, मानव

स्वर्ग में हुआ उल्लास भारी
नाचीं सभी अप्सरायें बारी बारी
इन्द्र के मन में आया अभिमान
नहीं है मुझसे कोई योद्धा महान

देवराज को हुआ उत्साह गहन
बनवाने लगे एक अद्भुत राजभवन
बनाते प्रतिदिन एक नयी योजना
विश्वकर्मा, देवशिल्पी अति खिन्नमना

विश्वकर्मा को हुई अति थकान
पहुँचे जहाँ पर थे श्री भगवान्
बोले प्रभु आज कल्याण करो मेरा
देवराज को बड़े मद ने है घेरा

बनवा रहे हैं एक असम्भव राजभवन
मिलती नहीं मुझे साँस लेने की फुरसत
बोले प्रभु अब तुम करो नहीं चिन्ता
मैं करूँगा तुम्हारी इन्द्र से रक्षा

इन्द्रसभा में हो रहा था मेनका का नृत्य
देख रहे थे देवगण होकर मुग्ध
सहसा प्रकट हुआ एक तेजस्वी ऋषि बालक
सहम के थम गई मेनका की पायल

इन्द्र ने उठ के किया बालक का स्वागत
अर्घ्य देकर किया ऋषि पुत्र को आसन
बोले फिर कैसे आना हुआ महाराज
क्या सेवा मैं कर सकता हूँ आज

बालक ने कहा सुनिये हे वृत्रसूदन
सुना है बनवा रहे हैँ आप एक बड़ा राजभवन
हो रही है इस राजभवन की बड़ी चर्चा
विश्वकर्मा के चमत्कारों की प्रशंसा

हुये हैं पहले भी बहुतेरे इन्द्र
बहुत सारे विश्वकर्मा भी हुये प्रसिद्ध
नहीं बना सका कोई मन्दिर ऐसा
जैसा महेन्द्र होगा भवन यह आपका

इन्द्र बोले पुत्र तुम इतने कम उमर
दूध के दाँत भी टूटे नहीं मगर
कैसे जानते हो बताओ यह जरा
इन्द्रों और विश्वकर्माओं की यह परम्परा

बालक हँसा तब एक अद्भुत हँसी
बोला इन्द्र आप समझे नहीं
कश्यप मुनि जो तुम्हारे थे पिता
उनसे था मेरा निजी वास्ता

कश्यप के पिता थे जो मुनि मरीचि
उनसे भी मेरी जानकारी थी कुछ
मरीचि के पिता जो पितामह ब्रह्मा
उनका भी मुझसे था परिचय हुआ

जानता हूँ मैं उन विष्णु को कुछ
नाभि से जिनकी निकले ब्रह्मा जी खुद
महाप्रलय में भी मैं था उपस्थित
विश्व सारा होता तब महाविश्णु में स्थित

महाप्रलय, योगनिद्रा, और फिर स्रजन
कालचक्र यह चलता रहता निरन्तर
कल्पना करो महाविष्णु का विराट रूप
एक एक रोम से लगे कोटि कोटि विश्व

प्रति विश्व में हैं एक ब्रह्मा और एक इन्द्र
कौन करेगा इनकी गिनती देवेन्द्र
कर सको कुछ तुम समय का अनुमान
समझाऊँ तुम्हें मैं युगों का विधान

एक चतुर्युगी में लगभग तैतालीस लाख मानव वर्ष
इकहत्तर चतुर्युगी तक एक इन्द्र का वर्चस्व
उक्त समय का एक होता मनवन्तर
जिसके बाद होता है इन्द्र का पदान्तर

अट्ठाइस मनवन्तर का एक कल्प होता
एक रात-दिन जिसमें ब्रह्मा का बीता
एक सौ आठ साल का ब्रह्मा का जीवन
गणना करें अब इन्द्रों की बुध जन

बालुका के कणों का गिनना है सम्भव
किन्तु इन्द्रों की संख्या करना असम्भव
इतने में बालक ने भूमि पर देखा
चल रही थी एक चींटियों की रेखा

देख के बालक को आई हँसी
इन्द्र के मुँह की लार भी सूखी
हँसते हैं आप क्यों महामनस्वी
इन्द्र की विनय देखते ही बनती

बालक ने कहा पूछो नहीं आप
जानके होगा भयानक सन्ताप
इन्द्र भी अड़ गये मैं नहीं सुनूँगा
भेद यह जान के ही रहूँगा

बालक ने कहा यदि नहीं मानोगे तुम
खोलना पड़ेगा यह भेद अति निर्मम
देख रहे हो चींटियों की कतार
हर एक इनमें से इन्द्र था किसी काल

प्रकट हुये इतने में एक तपस्वी
रखे हुये सिर पर एक उल्टी टोकरी
शरीर पर थी केवल एक लँगोटी
योग तेज से चमक रही थी देह उनकी

छाती पर था एक बालों का चकत्ता
रोम रह गये थे उस पर कुछ ही अलबत्ता
ब्रह्म तेज से चमक रहा था आनन
पधारे हों स्वयं ही जो श्री चतुरानन

इन्द्र ने उठ के किया उनका स्वागत
आदर से अपने निकट ही दिया आसन
इन्द्र बोले मैं कुछ समझ नहीं पाया
कौतूहल है देख के आप की अद्भुत काया

तपस्वी बोले नहीं कोई अचरज की बात
लोमष है मेरा नाम सुनिये सुरराज
समझ के इस देह को क्षणभंगुर
नहीं किया मैंने कभी जीवन में संग्रह

उल्टी टोकरी का काम यही अच्छा
सूर्य और वर्षा से तनु की सुरक्षा
लोमों का दाग जो देखते हैं आप
बताता हूँ इसका भी इतिहास

हर एक इन्द्र का जब होता है पतन
हो जाता एक रोम का उन्मूलन
झड़ जायेंगे जब सारे रोम श्रीमन्त
हो जायेगी तब मेरी जीवन-लीला अन्त

देख के बालक और मुनि का यह प्रसंग
इन्द्र का हुआ सम्पूर्ण मद भंग
आँखें बंद करके कर रहे थे अनुमान
बालक और तापस दोनों हुये अन्तर्धान

इन्द्र ने फिर विश्वकर्मा को बुलाया
क्षमा माँग के बड़ा पारितोषिक दिलाया
समझे फिर इन्द्र अपनी भी महत्ता
देश और काल के सन्दर्भ में उसे रक्खा

इन्द्र को उपजा अतुलित वैराग्य
शची से बोले मैं दूँगा सब त्याग
ध्यान करूँगा मैं केवल हरि चरणों का
फीका हुआ अब यह सुख शासन का

सुन करके इन्द्र की यह बात
करने लगीं इन्द्राणी विलाप
सोचा खोई अब पति की मति
बुलवाये तुरंत ही ऋषि ब्रहस्पति

देवगुरु ने दी इन्द्र को यह शिक्षा
वैराग्य की तुम करो नहीं इच्छा
वैराग्य का भी आयेगा समय
कर्तव्य अभी नहीं तुम्हारा है यह

कमल दल पर जैसे गिरता है जल
गिर जाता है बिना किये दल को लिप्त
निरासक्त होकर करो सभी कर्म
देवेश तुम्हारा अब यही धर्म

राग द्वेष से तुम करके वियोग
निर्लिप्त होकर भोगो सभी भोग
धर्म, अर्थ, काम और फिर मोक्ष
ये सारे हैं जीवन के लक्ष्य

....लक्ष्मीनारायण गुप्त
८ अगस्त २००५


Sunday, August 07, 2005

नारद मोह निवारण




श्रोताओ सुनो यह पुरानी कहानी
नारद जी थे एक मुनि बड़े ज्ञानी
सालों तक की घनघोर तपस्या
सोच लिया माया का कट गया पत्ता

सोचते ही ऐसे हुआ यह गुमान
जिससे उपजा यह भयानक अज्ञान
माया को चुनौती देने का किया ध्यान
मन की गति से पहुँचे जहाँ थे श्री भगवान

प्रभु बोले नारद कैसे आना हुआ आज
कैसा है सारा मृत्युलोक का समाज
नारद जी बोले प्रभु जानते हैं आप
छाया मृत्युलोक में आपकी माया का प्रताप

किन्तु प्रभु सुनिये बड़े काम की बात
इस दास पर माया न कर सकेगी हाथ साफ
नारद जी बोले प्रभु मेरा यह अन्तर
कामनाशून्य जैसे बिल्कुल हो ऊसर

वासना का नहीं उग सकता इसमें जर्म
हार जायगी मुझसे आपकी माया यह निर्मम
मुझसे टकराके आपकी माया यह ऐसी
खम्भा नोचेगी जैसे खिसियायी बिल्ली

प्रभु बोले नारद तुम उड़ाओ न खिल्ली
माया कभी नहीं बैठेगी बनके भीगी बिल्ली
गलती करोगे करके मायाको अन्डरएस्टीमेट
कर सकती है यह आपका पूरा मटियामेट

नारद जी बोले प्रभु बकते हैं आप
दम है अगर तो दिखाओ कुछ हाथ
अन्तर है मेरा एकदम निष्पाप
माया की सफलता का नहीं कोई यहाँ चान्स

प्रभु बोले नारद चलो चलें भ्रमण को
क्षीरसागर से होरही बड़ी बोरियत मुझको
चलते चलते आगया एक मरुथल
प्रभु बोले नारद अब चलना बड़ा मुश्किल

लग रही है वत्स मुझको बड़ी प्यास
आगे जाकर करो तुम जल की तलास
लेआओ मेरे लिये कमंडलु भर पानी
नारद तुम तो हो महा विज्ञानी

नारद जी चले थोड़ा सा ही आगे
देखा एक बड़ा सा महल है सामने
द्वार पे जाकर बजायी तब घंटी
नवयुवती निकली एक अति सुन्दरी

नारद जी बोले सुमुखि तुम्हारा क्या नाम
तुम्हारे रूप का हूँ मैं चिर गुलाम
युवती बोले प्रभु अन्दर पधारिये
कृपा करके मेरे माँ बाप से मिलिये

श्रोताओ नारद जी की होगयी शादी
मियाँ, बीवी, बच्चे सभी पूरी बरबादी
बारह साल तक चला यह चक्कर
बाढ़ एक तब आयी भयंकर

बह गया नारद जी का सारा परिवार
मन में उनके व्यथा होरही अपार
इतने में आयी यह कानों में आवाज़
नारद जी क्या आगये लौटके आप

चौंक कर नारद ने उठायी जब आंख
विस्मय से मुख खुल गया अपने आप
न देखा कहीं भी एक बूँद जल
तप रहा था कठिन धूप से मरुथल

आवाज़ आयी फिर नारद सुनते हो क्या
तीस मिनट से मैं बैठा हूँ यहाँ
आशा है ले आये मेरे लिये पानी
वत्स हो रही क्यों ऐसी हैरानी

...लक्ष्मीनारायण गुप्त
७ अगस्त २००५

Saturday, August 06, 2005

त्रिपुरसुन्दरी


नृत्य निरन्तर हो रहा है सृष्टि में
नाच रही है जिसके प्रेम में हर कली
भावना भक्ति की भरी है कण कण में
प्रेम के उसी के परिपूरित है मही।
भक्त भजते हैं, कविगण यश गाते हैं
सँवारती है उसी के रूप को सुन्दरी।
हर द्रुम में, हर तरु में, हर वन में
हर घर में, हर नगर में, हर समय नाचती है वही।
मंडन में, खंडन में, सम्वाद में, विवाद में,आवेश में, उन्मेष में, रोष में, तोष में,
तन में और मन में है हृदयेश्वरी वही।
अधरों में, पलकों में, सुन्दरी के घूँघट में
अधखुली आँखों की खुमारी भी वही।
पास पड़ोस में, और दूर देश में,
कान्हा की वंशी में और राधा के नूपुर में
व्याप्त है उस त्रिपुरसुन्दरी की छवी।

Friday, August 05, 2005

यदा यदा का वचन



(यह कविता १५ अगस्त सन् ९४ में लिखी थी। पिछले कुछ वर्षों में भारत में जो प्रगति हुयी है, उसको देख कर कहा जा सकता है कि यह प्रार्थना कुछ हद तक सुनी गई है।)

फिर से वृन्दावन में मोहन तुम को रास रचाना होगा।
सूखी कालिन्दी की धारा इसमें जल फिर भरना होगा।
वृन्दावन की धरती सूखी इसे हरित फिर करना होगा।
सूख गये हैं हृदय मनुज के उन्हें सजल फिर करना होगा।
नये कंश चाणूर बहुत से उन्हें दलित फिर करना होगा।
प्रेम और करुणा का फिर से वातावरण बनाना होगा।
पांचाली के वसन खींचता क्रूर दरिद्रता का दु:शासन, केशव चीर बढ़ाना होगा।
अगर नहीं तो लोग कहेंगे, प्रभु तुमको भी शकुनी के झूठे पाँसों ने जीता होगा।
पुण्यभूमि में भरतखंड की मोहन कब तुम फिर आओगे?
इसकी चिर पीड़ा को कान्हा हल्का क्या तुम कर पाओगे?
भारत माता की माटी को हरा भरा फिर कर पाओगे?
सूखे हृदयों को क्या तुम मोहन रस आप्लावित कर पाओगे?'
यदा यदा' का वचन करोगे पूरा कैसे, इस विनती को केशव तुम यदि ठुकराओगे?

-----लक्ष्मीनारायण गुप्त
५ अगस्त २००५

Thursday, August 04, 2005

वन्दना


मंगल हो सभी द्विपदधारियों का
चतुष्पदों का भी हो कल्याण
कामना यही है मेरी प्रभु
सभी प्राणियों को मिले अभयदान।

सुखी हों सभी पूर्व दिशावासी
पश्चिमवासियों को न हो कोई क्लेश
उत्तर और दक्षिण में रहते जो प्राणी
करो उनका भी प्रभु मंगलमय देश।

थलचरों का प्रभु करो कल्याण
जलचरों को भी सुख हो महान
नभचरों का जीवन भी आनन्दमय हो
सम्पूर्ण सृष्टि का हो मंगल विधान।

जीवगण करें परस्पर सहयोग
स्वहित से बढ़ कर हो परहित का जोर
दोष शान्त हों विश्व के सारे
ऐसा हो नया मानवता का भोर।

नहीं माँगता प्रभु मैं वैभव इस जग का
वांक्षित नहीं है स्वर्ग का भी सुख
प्रदान करो प्रभु मुझे ऐसा सामर्थ्य
हल्का कर सकूँ कुछ मैं पीड़ितों का दुख।

भगवन् तुम्हारे नाम हैं अनेक
बहु विधियों से होती तव पूजा
संकीर्ण मन के हैं बहुत जन
नाम-रूप के इस वेष में फँस जाते हैं बहुधा।

प्राचीन ऋषियों ने समझाया था यह रहस्य
देकर के यह मनोहर उपमा
एकत्रित होकर जल सभी नदियों का
जाता है एक ही सिन्धु में जैसा।

वैसे ही यह सारे विभिन्न पन्थ
आखिर में सभी पहुँते तेरे ही पास
मूल तू ही इन सभी प्राणियों का
कर रहे ये सब तेरी ही तलाश।

हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई और सिख
तेरी महिमा ही गाते सब सिद्ध
किसी भी नाम से जब पुकारता तुझे नर
पाता है तेरी अनुकम्पा तुरन्तर।

सभी पन्थों पर जो करता विश्वास
धर्मसहिष्णुता का जो समर्थक है आप
प्रभु तुम उस पर होते हो तुष्ट
भगवद्गीता का यह मत परिपुष्ट।

ब्रह्म एक है जो अनादि और अनन्त
माया के बल से हुआ बहुवन्त
स्रजन किया सारे विश्व का ऐसे
मकड़ी ने तन्तु निकाला स्वतनु से जैसे।

जग यह सारा तुझ में ही स्थित
कार्य सब विश्व करता है तवहित
सभी वस्तुओं का तू ही आदि अन्त
कृपा कर अब मुझ पर भगवन्त।

सभी प्राणियों के अन्तर में प्रभु
साक्षी इव तू करता है वास
मायावृत्त जीव का अन्तर
नहीं कर पाता तेरा साक्षात्।

कवि कालिदास ने कहे थे
जो शब्द स्वामी
दुहराता हूँ उन्हें
हे प्रभु अन्तर्यामी।

शब्द और अर्थ का है साथ जैसा
परमेश आप और माया का योग भी ऐसा
इस क्षुद्र कवि की भी यही कामना
शब्द और अर्थ का कौशल हो अपना।

---लक्ष्मीनारायण गुप्त ३ अगस्त २००५
टिप्पणी: इस कविता में मेरा अपना योगदान बहुत कम है। गीता, उपनिषदों और पुराणों में ये सारे कथन मिलेंगे जो मैंने एक सूत्र में पिरो दिये हैं।

Wednesday, August 03, 2005

कौन




कौन भरता है पुष्पों में सौरभ
कौन बिखराता है अम्बर में मोती
कौन करके इस मौन को मुखरित
भर देता है पंडितों की पोथी।

कौन उगाता है फूल ये कचरे से
सुवासित करते जो सारा संसार
कौन भरता है वाद्यों में संगीत
बहाता है जो हृदयों में रसधार।

कौन देता है वह सौन्दर्य-बुद्धि
रूप-कुरूप का जो करती विचार
किसका ऐश्वर्य है बसुधा पर बिखरित
कामना जिसकी करता संसार।

कौन करता है जनपथ पर कलरव
कौन करता है वनपथ पर नृत्य
कौन रँगता है ये सजीली तस्वीरें
सुनहरे सपनों को करता कौन सत्य।

कौन करता है उषा का आवाहन
लाने को यह नवमंगल प्रभात
कौन भरता है सागर को जल से
कौन भरता है अम्बर में प्रकाश।

कौन बुनता है ये स्नेह के ताने-बाने
स्वेच्छा से जिनमें बँधता संसार
कौन खोलेगा रहस्य इन सब का
कौन है इस नाटक का सूत्रधार।

कौन बजा रहा मेरे प्राणों की वीणा
कौन लेरहा मेरी श्वाँसों में श्वाँस
किसकी छवि यह छाई भूमंडल में
कौन कर रहा है पूर्व क्षितिज में प्रकाश।

कौन बिखराता है ये आँसुओं के मोती
जिनकी आर्द्रता से चमकीली है घास
कौन करता है मृदु कलियों को पुष्पित
कौन भरता है मेरे मन में उल्लास।
लक्ष्मीनारायण गुप्त
३ अगस्त २००५

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