एक दिन भरी सभा के बीच
किसी ने लगाया लांछन
कि नेता जी का चरित्र
तो बड़ा अपवित्र है।
नेता जी बोले, " नहीं जी
मेरा चरित्र तो
गंगाजल की तरह
पवित्र है।"
दूर नहीं थी
गंगा जी की धारा
तो महँगू ले आया जल
भर कर एक लोटा।
दिखा कर
नेता जी से बोला
पवित्र भले ही हो लेकिन
यह जल गंदा बहुत है।
शायद आपका
चरित्र भी ऐसा ही
पवित्र भले ही हो लेकिन
गंदा बहुत है।
लक्ष्मीनारायण गुप्त
१२ अक्टूबर २००५
No comments:
Post a Comment