Wednesday, October 12, 2005

नेता जी का चरित्र

एक दिन भरी सभा के बीच
किसी ने लगाया लांछन
कि नेता जी का चरित्र
तो बड़ा अपवित्र है।

नेता जी बोले, " नहीं जी
मेरा चरित्र तो
गंगाजल की तरह
पवित्र है।"

दूर नहीं थी
गंगा जी की धारा
तो महँगू ले आया जल
भर कर एक लोटा।

दिखा कर
नेता जी से बोला
पवित्र भले ही हो लेकिन
यह जल गंदा बहुत है।

शायद आपका
चरित्र भी ऐसा ही
पवित्र भले ही हो लेकिन
गंदा बहुत है।

लक्ष्मीनारायण गुप्त
१२ अक्टूबर २००५

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