Tuesday, September 27, 2005

सम्राट और भिखारी

प्राचीन भारत की एक यह कहानी
एक सम्राट के पास आया एक भिखारी
हाथ में लिये था भिक्षा का कलश
नेत्रों में थी इक विलक्षण झलक

भिक्षुक बोला हे प्रतापी सम्राट
पूरी कर दो इस भिखारी की आस
भर दो यह मेरा भिक्षा पात्र
इसकी रिक्तता से मुझे अति सन्ताप

सम्राट बोला भिक्षु बस इतनी सी बात
भरवाता हूं तुम्हारा भिक्षा पात्र
क्या भरना चाहोगे इस पात्र में श्रमण
हीरे, जवाहरात, मणि, माणिक या कंचन

भिक्षु बोला राजन् कुछ भी भर दीजिये
कूड़े या कंचन की परवाह न कीजिये
खाली बस न रहे पात्र तनिक भी
अभिलाषा पूरी करिये यह मन की

सम्राट ने अपने अनुचरों को बुलाया
पात्र को मोतियों से भरने का आदेश सुनाया
पाठको हुआ तब यह अद्भुत चमत्कार
पात्र भरने के सब प्रयत्न हुये बेकार

भरते भरते रिक्त पात्र में मणि मोती
समा गयी राजा की सारी सम्पत्ती
सम्राट ने फिर की भिक्षु से विनय
श्रमण बताइये इस पात्र का रहस्य

लाये हो कहाँ से यह मायावी बर्तन
किसने बनाया है यह अन्तहीन भाजन
भिक्षु बोला राजन् नहीं इसमें कुछ रंजिश
मानव मन में जो और और की हविश
चिर लालायित जिससे मानव का मन
बनाया उसीसे यह अन्तहीन भाजन

लक्ष्मीनारायण गुप्त
२७ सितम्बर २००५

7 comments:

eddyflynn32154937 said...
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Kalicharan said...

bahut bhadiya kavita likhi hai Laxminarayan Ji.

Laxmi N. Gupta said...

कालीचरण जी,

धन्यवाद। आपको कविता अच्छी लगी, यह सुन कर खुशी हुई।

लक्ष्मीनारायण

sumir said...

गुप्ता जी,

इस में किई शक नहीं कि कविता बहुत ही रोचक है | मैने इसे सुन्दर नहीं कहा |

यह बात अब ब्लॉग जगत के दिग्गज भी मन ही मन मान रहे होंगे की विचारों को कविता में आप सहज ही पिरो लेते है | आप यह काम बङी दक्षता से करते हैं | अगर अरस्तु के विचारों का सहारा लुँ तो कविता ही चेतन मन एंव इतिहास बोद्ध का उच्चत्म रुप है | तुलसीदास ने भी रमायण के अयोध्या काण्ड के मंगलाचार में कविता को बोद्धिक क्षमता पर दैवी प्रभाव एंव प्रताप बताया है |

परन्तु मैं आप की कविता में दर्शाए दर्शन से सहमत नहीं हुँ |

देखिए
अगर चाहत न होती तो द्वन्द न होता
द्वन्द न होता तो संघर्ष होता
संघर्ष न होता तो प्रयत्न न होता
प्रयत्न न होता तो उसार न होता

अगर उसार नहीं है, प्रगती नहीं है तो जीवन अर्थहीन हो जाएगा |
भविष्य में मोक्ष की सम्भावना नहीं रहेगी | शायद Weber भी इसी बात से अचम्भित था कि भारतिय कर्म सिद्धान्त Protestant ethics के समान होते हुए भी वह socio-economic result नहीं दिखा पाया जो Protestant ethics ने western Europe में दिखाएं हैं |

ज़रुरत है तो चाहत में शुद्धता लाने की | प्राप्ति के माध्यम को चुनने की |

Tarun said...

Gupta ji, achhi kavita hai...manav ka man waqai me aisa hi hai 'Ashantusht'.......Aur chahat ka kya...kisi ko paise ki hai.....ki ko sharir ki....to phir kisi ko moksha ki.....

@sumir ji, bhav manav ki "ashantushti" ka lagta hai...chahat ka nahi...

Laxmi N. Gupta said...

सुमीर जी,

आपकी विचारोत्तेजक टिप्पणी के लिये धन्यवाद। आपने जो मेरी दार्शनिक कविताओं मे मेरी दक्षता की बात की, यह तो आपकी उदारता है। मुझे यह भी लगा कि मेरे और आपके विचारों में इतना भेद नहीं है। मैं चाहत की नहीं हविश ( greed, obsession or compulsion ) कर रहा हूँ। हर कार्य के सम्पादन के लिये चाहत (will or intent) तो आवश्यक है ही, इससे मैं इन्कार नहीं करता। वेबर, अफलातून या अरस्तू का अध्ययन मैंने भारत में विज्ञान के छात्र होने के नाते नहीं किया। नाम सुने हैं, लेकिन ज्ञान नहीं है।

लक्ष्मीनारायण

Laxmi N. Gupta said...

तरुण जी,

धन्यवाद। आपने कविता के भाव को सही समझा है।

लक्ष्मीनारायण