महाभारत के एक लाख श्लोकों की मानस-रचना हो चुकी थी
किन्तु वेद-व्यास जी को बड़ी चिन्ता हो रही थी।
कौन लेखन करेगा इस विशाल साहित्य का
साधारण लिपिक के लिये ये मामला नहीं बस का।
इसी उधेड़बुन में व्यास जी पड़े थे
तभी घूमते फिरते नारद जी आन पड़े थे।
सुन कर व्यास जी की कहानी
नारद जी ने कहा सुनिये मेरी ज़बानी।
अभी मैं कैलाश से लौट रहा हूँ
पार्वतीनन्दन गणेश से मिल कर आ रहा हूँ।
यदि मिल जाये आपको लिपिक गजानन जैसा
सरल हो जायेगा काम महाभारत लेखन का।
व्यास जी ने किया जैसे ही गजानन का ध्यान
क्षण मात्र में ही प्रकट हो गये गणेश भगवान।
गणेश जी ने कहा, सुना है आपको एक लिपिक की तलाश
बन्दा हाज़िर है आपकी सेवा में मुनिराज।
लेकिन एक शर्त आप मेरी सुन लीजिये
मुझे इन्तज़ार करने का मौका न दीजिये।
यदि मेरी लेखनी को कभी रुकना पड़ेगा
तो महाभारत लेखन का काम अधूरा रहेगा।
व्यास जी ने कहा एक शर्त मेरी भी सुनिये
बिना अर्थ समझे आप कुछ भी न लिखिये।
जितनी जल्दी व्यास जी श्लोक बोलते थे
उतनी ही जल्दी गणेश जी उसे लिख डालते थे।
बीच बीच में व्यास जी एक कठिन श्लोक बोल देते थे
जब तक गणेश जी उसे समझते थे
व्यास जी दो चार नये श्लोक बना लेते थे।
श्रोताओ इस तरह हुआ महाभारत का लेखन
सुना है आपने यह चरित्र अति पावन।
लक्ष्मीनारायण गुप्त
१२ सितम्बर २००५
2 comments:
गुप्तजी
कमाल का धमाल साधा है, प्रोफेसरी मेथेमेटिक्स की और ट्रिक्स कविताई की। वैसे मैं भी आपके धंधे का बंदा हूं, दिल्ली विश्वविद्यालय में कामर्स और पत्रकारिता पढ़ाता हूं और प्रपंचतंत्री गुर सिखाता हूं। आप जैसी रेंज मेरी रचनाओं में नहीं है। अपना रंग तो सिर्फ और सिर्फ व्यंग्य का है। आपके यहां अध्यात्म, प्रेम के जैसे रंग हैं, वे कहीं-कहीं हरिवंश राय बच्चन की मधुशाला की याद कराते हैं। शायरी पर हाथ आजमाया है या नहीं। मेरी सलाह है आजमाइए, आपकी भावभूमि से बहुत शानदार शेर निकलेंगे।
आपका आलोक पुराणिक
आलोक जी,
मुझे खुशी है कि आपको मेरा कृतित्व अच्छा लगा। आपका satire मुझे बहुत अच्छा लगता है। आप जैसा कोई प्रपंचतंत्र पढ़ाने वाला मिल गया होता तो मुल्क क्यों छोड़ना पड़ता। कुछ शायरी लिखी है किन्तु उर्दू का ज्ञान कम है। आप कह रहे हैं तो कुछ शीघ्र ही पोस्ट करूँगा। देखते रहियेगा। धन्यवाद।
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