Wednesday, September 07, 2005

लाला दीनदयाल का अमेरिका निवास

कुछ दिन अमरीका रहे लाला दीनदयाल
पुत्र मनोहरदास से बोले कर कुछ ख्याल

बुरा न मानो पुत्र अगर मैं कुछ कह जाऊँ
अमरीका के रहन सहन की बात चलाऊँ

गाड़ी अपनी है सही पुत्र बड़ी यह बात
शोफ़र नहीं लगा सके तुम कैसे, हे तात

बर्तन धोने के यहाँ साधन विविध प्रकार
महरी नहीं लगा सके क्यों तुम बरखुरदार

वैकुअम क्लीनर की शोभा बड़ी न्यारी
नौकरों की कमी लेकिन खटकती है भारी

माली नहीं लगा सके पुत्र मनोहरदास
पी एच डी के बाद भी स्वयं काटते घास

स्वयं काटते घास पुत्र तुम आफिस जाते
चपरासी भी नहीं वहाँ पर जिससे चाय मँगाते

नहीं मिलती हैं यहाँ पर खस्ता कचौरी
नहीं मिल पाती हैं पान की भी गिलौरी

चलते नहीं यहाँ पर पुत्तर रिक्शे ताँगे
जा सकते हैं नहीं कहीं बिन राइड माँगे

बोले दीनदयाल सबर्ब में बसें न चलतीं
डाउन टाउन में जीवन की सामत आती

रास तुम्हें ही आये, पुत्र यह जीवन विकट
मेरे लिये तो मँगवादो एअरइन्डिया से टिकट

-----लक्ष्मीनारायण गुप्त
७ सितम्बर २००५

8 comments:

अनूप शुक्ला said...

बढि़या लिखा है.लाला दीनदयाल के जाने के पहले यह बता दो कि पुत्र क्या बोला उनसे?

Raman Kaul said...

पुत्र मनोहरदास यूँ बोले

ना चलते हों भले यहाँ रिक्शे और ताँगे
देख देख कर खुश होते हम नंगी टाँगें।

घास काटते हैं तो क्या, यही करते सारे
देस में करते काम तो कहलाते घसियारे।

अपना ही तो काम है, इस में क्या शरमाना,
गीता, गान्धी, सब का तो है यही फरमाना।

बिना घूस के हो जाते सभी काम घर के
बेईमान तो नहीं यहाँ बाबू दफ़तर के।

फिर भी देश की अपने याद बहुत है आती
उस के विरह में हमारी फटती छाती।

रास हमें आया है, भले हो जीवन विकट
हम तो सालाना जाएँगे, पर विद ऍ रिटर्न टिकट।

Laxmi N. Gupta said...

लाला दीनदयाल का जवाब

अरे पुत्र कुछ तो बाप का लिहाज करो
नंगी टाँगों का ज़िक्र हम से न करो

मैंने भी कभी पढ़ाथा कोकशास्त्र
बाप से बताने की कहाँ मुझमें थी ज़ुर्रत

पुत्र यदि तुम्हें घास ही काटनी थी
पी एच डी करने की क्या ज़रूरत थी

गांधी और गीता का आदर्श अब कहाँ है
मुलायम और लालू का युग चल रहा है

अरे पुत्र बाबू लोग घूस थोड़े ही लेते हैं
बस चाय पानी भर की व्यवस्था कराते हैं

और अगर भारत में घूस नहीं होती
दूसरे नम्बर की एकानमी कैसे चलती

जल्दी ही आना देश, पुत्र करना नहीं देरी
चाँदनीचौक में फिर खायेंगे कचौरी

Raviratlami said...

वाह भई, यह तो बढ़िया कवि सम्मेलन हो गया. मज़ा आ गया. वाह! वाह!

**
पुनश्चः गुप्त जी, आपकी गणेश जी पर कविता रचनाकार में दी है. कृपया देखेंगे.

आशीष श्रीवास्तव said...

रमण भाई

हम आपके जवाब का इंतजार अक रहे है.

मजा आ गया !

आशीष

Raman Kaul said...

चलिए कोशिश करते हैं....

ठीक है तात नहीं करते बातें टागों की
पर रात ही तुम देख रहे थे लेट नाइट टीवी।

माना सारे शास्त्र पढ़े हो आप बचपन में
पर सठिया गए हैं आप केवल पचपन में।

कोकशास्त्र यदि वास्तव में आप काम न लाते,
तो मेरा भी इस दुनिया में नाम न लाते।

आप में जुर्रत ना हो बाप से बतियाने की
अब तो बात बदल गई है नए ज़माने की।

मेरा बेटा अभी दिखाता है मुझ को सींग
प्रणाम नहीं करता, बस करता हाउ आर यू डूइंग।

भुगतें आप ही घूसखोरी, लालू और मुलायम
अपने यहाँ तो बुश की सीनाजोरी है कायम।

यह तय है कि जब हम भी बूढे हो जाएँगे
तब तो दौड़े दौड़े देश को अपने ही जाएँगे।

तब तक तात हमारी ओर से सुन लें सौरी
बहुत साल के बाद मिल कर खाएँगे कचौरी।

Tarun said...

kavi samalena ka to maja hi aa gaya.....raman aur laxmi ji ek se bar ek......bahut khoob

Laxmi N. Gupta said...

चलिये अब इस सम्वाद को एक पीढ़ी आगे बढ़ाते हैं। अगली पोस्ट में पढ़िये मनोहरदास और उनके टीनएज पुत्र का सम्वाद। घास काटने की जिम्मेदारी अब इस "हाऊ आर यू डोइंग" कहने वाले पुत्र पर है। थोड़ी प्रतीक्षा करिये।

लक्ष्मीनारायण