उम्र अब साठ की हो रही है
तबीयत किन्तु रसिकों सी मचल रही है
मैंने कहा प्रिये हो जाओ बाहुपाश में बद्ध
उसने कहा आपकी तोंद कर रही है मेरी गति अवरुद्ध
मैंने कहा सुन्दरी क्यों न हम काम-केलि करें
उसने कहा आप अपनी उम्र का लिहाज़ करें
मैंने कहा तुम्हारी हँसी में दामिनी दमकती है
उसने कहा आपकी चाँद भी चमकती है
मैंने कहा प्रिये तुम्हारी चाल हिरनी सी है
उसने कहा आपकी टाँगें बगले सी हैं
मैंने कहा प्यारी सुनाओ एक गाना
उसने कहा बाज़ार से सब्ज़ी लेते आना
मेंने कहा तुम्हारे तन से आती है सुगन्ध
उसने कहा बुढ़ापे से आपकी बुद्धि है मन्द
मैंने कहा मेरे मन में उमंगें फड़कती हैं
उसने कहा मेरी तो हड्डियाँ कड़कती हैं
मैंने कहा मेरे मन में अनंग मचल रहा है
उसने कहा मेरा तो मुआ सर दुख रहा है
लक्ष्मीनारायण गुप्त
अगस्त २००५
5 comments:
मज़ेदार रचना के लिए बधाई स्वीकारें...
मेरे जैसे चांद वालों के लिए सटीक!
रवि जी,
धन्यवाद। खुशी है कि कविता आपको अच्छी लगी।
लक्ष्मीनारायण
उमर तीस की, अनुभव साठ के ,पसन्द आये पैंतालीस वाले को.यह परकाया प्रवेश है या पसंदीदा फॆन्टेसी?बढ़िया.
bhadiya likhe rahe guru.
अनूप जी, कालीचरन जी,
धन्यवाद। ऐसे ही प्रोत्साहन देते रहिये। जब मैंने यह कविता लिखी थी, मेरी उमर ६० से बहुत कम थी। लेकिन एक अर्शा गुज़र गया, लिखे हुये।
लक्ष्मीनारायण
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