Tuesday, August 30, 2005

प्रौढ़ प्रणय निवेदन

उम्र अब साठ की हो रही है
तबीयत किन्तु रसिकों सी मचल रही है

मैंने कहा प्रिये हो जाओ बाहुपाश में बद्ध
उसने कहा आपकी तोंद कर रही है मेरी गति अवरुद्ध

मैंने कहा सुन्दरी क्यों न हम काम-केलि करें
उसने कहा आप अपनी उम्र का लिहाज़ करें

मैंने कहा तुम्हारी हँसी में दामिनी दमकती है
उसने कहा आपकी चाँद भी चमकती है

मैंने कहा प्रिये तुम्हारी चाल हिरनी सी है
उसने कहा आपकी टाँगें बगले सी हैं

मैंने कहा प्यारी सुनाओ एक गाना
उसने कहा बाज़ार से सब्ज़ी लेते आना

मेंने कहा तुम्हारे तन से आती है सुगन्ध
उसने कहा बुढ़ापे से आपकी बुद्धि है मन्द

मैंने कहा मेरे मन में उमंगें फड़कती हैं
उसने कहा मेरी तो हड्डियाँ कड़कती हैं

मैंने कहा मेरे मन में अनंग मचल रहा है
उसने कहा मेरा तो मुआ सर दुख रहा है

लक्ष्मीनारायण गुप्त
अगस्त २००५

5 comments:

Raviratlami said...

मज़ेदार रचना के लिए बधाई स्वीकारें...

मेरे जैसे चांद वालों के लिए सटीक!

Laxmi N. Gupta said...

रवि जी,
धन्यवाद। खुशी है कि कविता आपको अच्छी लगी।

लक्ष्मीनारायण

अनूप शुक्ला said...

उमर तीस की, अनुभव साठ के ,पसन्द आये पैंतालीस वाले को.यह परकाया प्रवेश है या पसंदीदा फॆन्टेसी?बढ़िया.

Kalicharan said...

bhadiya likhe rahe guru.

Laxmi N. Gupta said...

अनूप जी, कालीचरन जी,

धन्यवाद। ऐसे ही प्रोत्साहन देते रहिये। जब मैंने यह कविता लिखी थी, मेरी उमर ६० से बहुत कम थी। लेकिन एक अर्शा गुज़र गया, लिखे हुये।

लक्ष्मीनारायण