Sunday, August 28, 2005

मज़हब और शोर का रिश्ता

मज़हब और शोर का बड़ा गहरा रिश्ता है
सुनाऊँ मैं आपको बयाँ यह सच्चा है।

कई साल बाद मैं अमेरिका से भारत पहुँचा
ससुराल में साली सलहजों ने बड़े प्रेम से रक्खा।

गर्मी का मौसम था छत पर बिस्तरा बिछाया
नींद गहरी आयी, शीतल मंद, सुगंध पवन आया।

इक सुनहरे सपने में हम हो रहे थे निहाल
कि एक बुलंद आवाज़ आयी सत् श्री अकाल।

पता चला पड़ोसी सरदार जी भक्तिविभोर हो रहे थे
अपनी खुली छत पर सवेरे तीन बजे अकालपुरुष से आत्मनिवेदन कर रहे थे।

अगले दिन का ऐसा कार्यक्रम था
बहन के गाँव जाने का यह दिन था।

वहाँ भी दीदी जीजा ने किया बड़ा स्वागत
आने की खुशी में दे डाली एक दावत।

मज़हब ने फिर दुःख दिया रात में
सवेरे चार बजे लाउडस्पीकर से अजान की आवाज़ आयी जोर से।

आने लगीं फिर कव्वालियाँ जोर शोर से
नींद का खात्मा और चिड़चिड़ेपन की शुरुवात हुयी वेग से।

अगले दिन कानपुर जाना था एक मित्र के पास
सोचा आज तो गुजरेगी चैन से रात।

मित्र के घर के सामने खुला मैदान था
वहीं पर चारपाई डाल के सोने का विधान था।

किन्तु फिर वही हुआ जो होना था
पड़ोस में हो रहा देवी का जगरता था।

चौथी रात मैंने अपने गाँव में बिताई
छोड़ दिया अपने को राम सहारे भाई।

सुनहरी रात में मच्छर भिनभिना रहे थे
लगा जैसे वे भी भजन कर रहे थे।

मच्छर लेकिन एक गलती कर रहे थे
प्रभु के कानों की जगह मेरे कानों मे गा रहे थे।

मच्छरी सराउनड साउन्ड से हो सराबोर
आर्त ध्वनि से चीखा, बचाओ मच्छरों से हे नन्दकिशोर।

मेरी पुकार में इतनी आर्तता न थी भाई
रेंग सके प्रभु के कान पर जूँ भी भाई।

किन्तु मेरी चीख ने कैसी दुश्मनी निभाई
पड़ोसी नन्दू पहलवान की नींद खुला आई।

लाठी लेकर वह तुरन्त आया
गुस्से से हमारा दरवाजा खटखटाया।

बड़ी भाभी ने आकर दरवाजा खोला
नन्दू उनसे कुछ नरम होकर बोला।

भाभी ने कहा, नन्दू जी बुरा नहीं मानिये
देवर जी तेज़ बुखार में कुछ बड़बड़ा रहे थे, यह सच मानिये।

सवेरे जागने पर मुझे कुछ ऐसा इलहाम हुआ
सारे धर्मों का निचोड़ मैंने जान लिया।

यह गूढ़ तत्व नहीं किसी को बताया है
किन्तु आप पाठकगण मेरे परम मित्र हैं, इससे फरमाया है।

मित्रो, मेरी बात को परम सत्य मानो
सर्व धर्म निष्कर्ष है कोलाहल, ऐसा मानो।

जितना ही भीषण तुम्हारा चीत्कार होगा
उतना ही अधिक प्रभु को तुमसे प्यार होगा।

लक्ष्मीनारायण गुप्त
अगस्त २००५

7 comments:

अनूप शुक्ला said...

भाई,इस कविता से तो लग रहा है कि सोने का
आखिरी मौका भारत में ही मिला था तुम्हें.इस
बात का खंडन करने के लिये वहां की नींद का
भी कुछ ब्योरा दो.या सन्नाटे के कारण जब से यहां
से गये नींद ही नहीं आयी?

Atul Arora said...

अति सुँदर
आपकी कविता बहुत अच्छी लगी। बधाई।

Laxmi N. Gupta said...

अनूप जी,

यह निष्कर्ष आपने कैसे निकाला? मैं समझा नहीं।

लक्ष्मीनारायण

अनूप शुक्ला said...

निष्कर्ष निकालने के लिये कोई तर्क नहीं
है.हम तो यह कह रहे हैं कि वहां की
नींद का भी कुछ कहो.सारी नींद भारत में
ही उचटी.वहां भी किसी कारण व्यवधान
पड़ता होगा.कुछ उसका भी हाल-बताया
जाये.

मिर्ची सेठ said...

शुक्ला जी
यहां नींद सामान्यतः शोर की वजय से तो नहीं उचटती बशर्ते आप डाउनटाउन या यूनिवर्सिटी क्षेत्र में न रहते हों। वहाँ भी अगर घर पर डबल पेन के शीशे हैं तो मामला खत्म। हाँ यहाँ नींद टूटती है घर की किस्त, कचरा कलचर से। पर वह तो मेरे ख्याल से हर जगह ही होगा।

पंकज

Laxmi N. Gupta said...

शुक्ला जी,
यहाँ पर भी नींद उचटती है। प्रायः उसका कारण जवान युवक युवतियों की पार्टियाँ होती हैं जो गलाफाड़ म्यूज़िक चलाते हैं। कभी लभी पड़ोस के लोग पुलिस को बुला कर ऐसी पार्टियों को भंग भी कराते हैं। पंकज जी ठीक ही कह रहे हैं कि ऐसा यूनीवर्सिटियों के आस पास अधिक होता है।

लक्ष्मीनारायण

Laxmi N. Gupta said...

अतुल जी,

मेरे ब्लाग पर टिप्पणी डालने के लिये धन्यवाद। यह जान कर खुशी हुयी कि कविता आपको अच्छी लगी। मैंने आपकी profile देखी। मैं भी कानपुर से हूँ। बी एन एस डी, एस डी, और क्राइस्ट चर्च कालेज में शिक्षा प्राप्त की। एक साल IITK में भी था। वहीं से अमेरिका आया। आपका ब्लोग समय निकाल कर देखूँगा।

लक्ष्मीनारायण