Tuesday, April 30, 2013

मधु है, मधु मास है



मधु है, मधु मास है मधुपान की इच्छा बड़ी है
पी नहीं सकता मगर मधुमेह की शंका बड़ी है

मद है, मदिरा है, मुझे मस्ती बड़ी है
 पीने की मुमानियत कर दी है पत्नी ने
मर जाओगे जिगर की सिरोसिस से
क्यों तुम्हें मुझे विधवा बनाने की इच्छा बड़ी है

मुर्ग है, मसाले हैं, बासमती चावल भी उम्दा है
बिरियानी खाने की तबियत बड़ी है
खा नहीं सकता मगर मैं दोस्तो
क्योंकि रक्त में शर्करा बढ़ी है

अंडे हैं, हरा धनिया है, हरी मिर्च की शोभा बड़ी है
खा नहीं सकता मगर मैं आॅमलेट
कोलेस्टराॅल बढ़ जाने की शंका बड़ी है

अर्थराइटिस का दर्द भारी है
पेनकिलर लेने की ज़रूरत बड़ी है
लेने से लेकिन दिल के दौरे की सम्भावना बड़ी है

जिम जाता हूँ, कोल्हू के बैल की तरह
ट्रैक पर दौड़ता हूँ ऐरोबिक कसरत के लिए
क्या करूँ, मन मरने का अभी  करता नहीं है

---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---३० अप्रैल २०१३


Sunday, April 28, 2013

जब द्रौपदी ने कृष्ण की लाज बचाई


सभी जानते हैं कि जब युधिष्ठिर जुए में द्रौपदी को भी हार गए थे और दुष्ट दु:शासन उसको निर्वस्त्र करने का प्रयास कर रहा था द्रौपदी ने कृष्ण का स्मरण किया था तब प्रभु ने द्रौपदी की साड़ी को अन्तहीन कर दिया था और इस प्रकार उसकी लाज बचाई थी। इस चमत्कार का कवि भूषण (?) ने ऐसे वर्णन किया है:

सारी बीच नारी है कि नारी बीच सारी है
नारी ही कि सारी है कि सारी ही कि नारी है

दक्षिण भारत में एक मनोहर आख्यान प्रचलित है जिसमें द्रौपदी ने कृष्ण की लाज बचाई थी:

एक बार पाँचो पान्डव और कृष्ण एक कुंड में स्नान कर रहे हैं। सभी ने केवल लँगोटी पहन रखी है। अकस्मात कृष्ण की लँगोटी खुल जाती है और पानी में चली जाती है। काफी समय बीच चुका है किंतु कृष्ण समझ नहीं पा रहे हैं कि कैसे पानी से निकलें। बगल के कुंड में द्रौपदी सखियों के साथ नहा रही है। वह समझ जाती है कि क्या हो रहा है। वह अपनी साड़ी से एक चीर फाड़ कर कृष्ण की ओर फेंक देती है। कृष्ण बहुत कृतज्ञ होते हैं और वादा करते हैं कि अवसर आने पर वह द्रौपदी के इस ऋण को अवश्य अदा करेंगे।

Reference

Alf Heitebeitel: The Cult of Draupadi 1 (pp. 227)

लक्ष्मीनारायण गुप्त
२८ अप्रैल २०१३

Monday, March 11, 2013

अगर कभी



अगर कभी बीवी से हो जाए तकरार
भला इसी मैं है हार मान लो यार
हार मान लो यार नहीं तो पछताओगे
खेत चुग गई चिड़िया बस तुम बौराओगे

 पछताओगे, बौराओगे और यार
शरण कुत्ताघर (यानी डॅागहॅाउस ) में पाओगे
शयनकक्ष में भी यारो नहीं बुलाए जाओगे
सुबह सुबह तुम उठ के मित्रो ख़ुद ही  चाय बनाओगे
वह भी डुबकी वाली होगी टी बैग से
क्योंकि असली चाय  हिन्दुस्तानी
तुम्हें आती है नहीं  बनानी
भाती है तुमको वही किन्तु पीने में जानी
बिरियानी क़ोरमा कहाँ पाओगे
बर्गर फ्राइज़ खा खा के ज़िन्दगी बिताओगे
नित्य अकेले सोओगे
करनी पर अपनी पछताओगे

अगर कहीं वो तलाक पर तुल आई भाई
सभी जमा पूँजी की कर के सफाई
तुम्हारी ऐसी की तैसी कर सकती है भाई
ज़िन्दगी भर ऐलीमोनी भरोगे
रह रह कर तुम आहें भरोगे
बाल बच्चों की कस्टॅडी उसीको मिलेगी
उसकी मर्ज़ी पर तुम्हारी ज़िन्दगी चलेगी

हारने में ही तुम्हारी जीत है भाई
अक्लमंदी इसी में भूल जाओ लड़ाई
मेरी मानो तो हथियार डाल दो
हार मान लो, माफी माँग लो
मना लो, उसका मान रख लो
तुम्हारी छोटी सी मुस्कान
क्या नहीं कर सकती हैै
सोए हुए प्यार को
फिर से जगा सकती है

गुस्सा थूक दो
प्यार को मान दो
प्यार में तकरार भी होती है
जान लो

---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---८ मार्च २०१३



Friday, March 08, 2013

ज़रा सोचो



ज़रा सोचो
अगर सूपनखा  की
शादी हो गई होती
तो वह राम को
इश्क जताने
नहीं गई होती
नाक कान कटने की
नौबत न हुई होती
न सीता हरण होता
न रावण की मौत हुई होती
पूरी रामायण बदल गई होती
राम होते एक सीधे सादे राजा
नहीं बजता युगों तक उनकी
कीर्ति का बाजा

अगर लक्ष्मण उर्मिला को
साथ ले जाते
राम सूपनखा को
उनके पास नहीं भेजते
इस हालत में भी
रामायण बदल गई होती

अगर भीष्म पितामह ने
अपना प्रण भूल कर
शादी कर ली होती
एक सन्तान कर लेते
तो महाभारत नहीं होती

इन बातों से
क्या सबक मिलता है दोस्तो
जल्दी से जल्दी शादी
कर डालो
शादी के बाद पति या पत्नी
को कभी अपने पास
से न टालो
एेसा करने से
सम्भव है
दुनिया में युद्ध कम होंगे
यह सही है
इस वज़ह से हीरो
कम बनेंगे
वगैर युद्ध के
न राम होंगे न अर्जुन
न होंगे कृष्ण
न होगा गीता का भाषण

अब आप ही सोचो कि
दुनिया बेहतर होती
या बदतर
मैं जाता हूँ
सब्ज़ियाँ ख़रीदने
नहीं तो बीवी
दिखलाएगी तेवर

---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---८ मार्च २०१३

Thursday, March 07, 2013

दिल घबराता है



दिल घबराता है
जब तुम नहीं होते हो
तन काँपता है
जब तुम नहीं होते हो
मन नहीं लगता है
जब तुम नहीं होते हो

तुम आते हो
तब राहत मिलती है
साथ होने की
आदत लगती है
तुम होते हो
तो कोई ख़ास
बात नहीं लगती है
कोई गहरी
बात नहीं होती है
इश्क मुहब्बत की
करामात नहीं होती है

लेकिन तुम चले जाते हो
तो दिल घबराता है
नहीं लौटोगे
यह डर लगता है

दिल घबराता है
जब तुम नहीं होते हो

---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---७ मार्च २०१३

Friday, February 01, 2013

दिल वाले जो दिल नहीं लगाते हैं



दिल वाले जो दिल नहीं लगाते हैं
वो कभी दिल वाली दुल्हनिया नहीं लाते हैं

बिना माशूका के इश्क फ़रमाते हैं
बिना पानी के तैराकी करते हैं
बिना घोड़े के घुड़सवारी करते हैं
बिना मोटर की मोटर कार चलाते हैं

बिना तेल के पकौड़ी बनाते हैं
बिना ख़मीर की जलेबी बनाते हैं
बिना मसाले की चाट बनाते हैं
बिना दाल के दोसे बनाते हैं

बिना दीपकों के दिवाली मनाते हैं
बिना राम की रामायण बनाते हैं
बिना मंत्रों की माला सरकाते हैं
बिना रंग अबीर के होली मनाते हैं

ऐसे लोग ज़िन्दगी से चूक जाते हैं
खेत चुग गया तब चिड़िया भगाते हैं
समय बीत गया अब पछताते हैं
दिन रात बेसुरा राग अलापते हैं

इसलिए भाई सुन लो मेरी सलाह
दिल है तो किसी से लगा लो करता हूँ आगाह

---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---१ फरवरी २०१३

Saturday, January 12, 2013

दिल्लगी नहीं है दिल का लगाना


दिल्लगी नहीं है दिल का लगाना
जाँ हथेली पे रखे जिसे वहाँ जाना
दिल के कच्चों का यह नहीं है ठिकाना
सर की बाजी लगी है यह दिल में बिठाना
दिल्लगी नहीं है दिल का लगाना

दिल पर लग सकती है ग़र दिल को लगाना
 जान की बाज़ी है दिल का लगाना
दिलेरी का काम है दिल का लगाना
सूरमा हो तो मैदाने जंग में जाना
दिल्लगी नहीं है दिल का लगाना

हिम्मत हे तो ही दिल को लगाना
लगी जिसको बना  आशिक मस्ताना
ठोकरें मारेगा ज़ालिम ज़माना
दिल वाले सहते हैं दिल का लगाना
दिल्लगी नहीं है दिल का लगाना

दिल लगाने का नहीं करना बहाना
पैर न उखड़ें उनके सामना जब जाना
होशो हवास उड़ जायेंगे करे जो बहाना
मर्दों का काम है दिल को लगाना
दिल्लगी नहीं है दिल का लगाना

---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---१२ जनवरी २०१३


Friday, January 11, 2013

दिल लगाते रहे



दिल लगाते रहे
मन मिलाते रहे
तेरे दामन का साया
नहीं भी मिला
तब भी हँसते रहे
मुस्कराते रहे

तुम्हारी क़रीबी
नहीं मिल सकी
दूर से ही हम
नज़रें मिलाते रहे

तेरी साँस से न मेरी
कभी साँसें मिलीं
आस तब भी
तुम्हारी लगाते रहे

आख़िरी शाम जीवन की
अब आ गई
दिल लगाते रहे
मन मिलाते रहे

---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---११ जनवरी २०१३

Wednesday, December 19, 2012

प्रिया



वो देखो वो है मेरी प्रिया
लहराती लटें फहराती रेशम की चुनरिया
दिलकश अदाओं में फँसा है मेरा जिया

जाल निगाहों का तुझ पर डाल दिया
थिरकन पर तेरी ठहर गईं अँखियाँ
फँस गया मैं ही जाल में प्रिया

---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---१९ दिसम्बर २०१२

Thursday, July 19, 2012

सुर, असुर और गयासुर



यह जान कर आपको षायद आश्चर्य होगा कि असुर शब्द सुर से पुराना है। ऋग्वेद में असुर हैं और देव हैं किन्तु सुर नहीं। असुर देवों से पूर्ववर्ती हैं। वरुण आकाश के देवता हैं और नैतिकता और न्याय के अधीक्षक हैं। वरुण को ऋग्वेद में असुर कहा गया है। ऋग्वेद के एक सूक्त में कहा गया है:
"महत्तं देवानाम् असुरत्वम् एकम्।"
(महान है देवों का असुरत्व)

पौराणिक काल में जब देवों को अच्छा और असुरों को बुरा माना जा चुका था किसी ने सुर शब्द (जिसका विलोम असुर बनेगा) का अाविष्कार किया।

आपको यह भी पता होगा कि हिन्दुओं के तीर्थ देवों के नाम पर हैं और उनकी पूजा-आराधना के लिए हैं। किन्तु प्रसिद्ध तीर्थ स्थान गया जहाँ लोग पूर्वजों का श्राद्ध करने के लिए जाते है, का नाम असुर गय यानी गयासुर के नाम पर है। सम्भवत: इस तीर्थ का मूल वैदिक काल में हो जब असुर इतने बुरे नहीं थे।

गयासुर की कहानी इस प्रकार है। प्राचीन काल में गय नामक एक असुर भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए घोर तप कर रहा था। विष्णु जब प्रसन्न होकर उसे वर देने के लिए आए, उसने केवल यह माँगा कि उसका शरीर सभी तीर्थों से अधिक पवित्र हो जाए। विष्णु ने उसे यह वर दिया जिसका फल बड़ा अाप्रत्याशिक हुआ। गय को देख कर ही लोग मुक्ति पा जाते थे तो देवताओं के लिए यज्ञ होने बन्द हो गए। बिना यज्ञ के देवगण क्षीण होने लगे। वे घबरा कर ब्रह्मा जी के पास गए। ब्रह्मा जी गय के पास गए और उन्होंने कहा कि यज्ञ के लिए कुछ पवित्र स्थल चाहिए और गय के शरीर जैसा पवित्र स्थल कहीं नहीं है। गय के सिर पर एक विशालकाय शिला रखी गई और ब्रह्मा, शिव आदि देवता शिला पर बैठ कर यज्ञ करने लगे किन्तु गय का शरीर अभी भी चलायमान था। अन्त में जब विष्णु भी शिला पर बैठे, गय स्थिर हो गया और उसने कहा कि जब तक यह धरती, ये पर्वत, सूर्य, चन्द्र और तारे हैं तब तक ब्रह्मा, विष्णु और शिव इस शिला पर विराजेंगे। इस तीर्थ का नाम मेरे नाम पर गया होगा। इस तीर्थ से समस्त मानव जाति का कल्याण होगा।

कहते हैं कि गया में जिसका श्राद्ध हो गया हो, उसका पुनर्जन्म नहीं होता। इसी लिए गया में श्राद्ध और पिंडदान के बाद फिर श्राद्ध की आवश्यकता नहीं होती। 'गया' शब्द एक क्रिया बन गया है। लोग कहते हैं कि वे अमुक व्यक्ति की गया करने गए हैं।

---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---१९ जुलाई २०१२

Saturday, July 14, 2012

सब से मधुर संगीत



सुने हैं मैं ने बहुत सारे वाद्य
बहुत सारे संगीत
हिन्दुस्तानी, कर्नाटक
पाश्चात्य पक्का संगीत
अॅापेरा, राक
जैज़ और लोक संगीत
बॅालीवुड, हॅालीवुड
ग़ज़ल और गीत
मन को सब भाए हैं
बहुत सुख पाए हैं
किन्तु सब से मधुर संगीत
मैं ने जो पाया है
धेवतों की किलकारियों ने
मन भरमाया है
रेशम और एका के सुनहरे बोल
नाना के कानों को लगते अनमोल
कृतज्ञ हूँ मैं ने बहुत कुछ पाया है
सबसे मधुर संगीत नातियों ने सुनाया है

---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---१४ जुलाई २०१२

Friday, July 13, 2012

आपने कभी सोचा है



आपने कभी सोचा है
कि दुनिया में क्या हो रहा है

जैसे जैसे मशीनें पतली हो रही हैं
वैसे वैसे इन्सान मोटे हो रहे हैं

यंत्रों का साइज़ नैनो हो रहा है
आदमी का साइज़ मेगा हो रहा है

कमरे भर का कम्प्यूटर जो काम करता था
वही काम अब हथेली भर का लैपटाप करता है

पहले कम खाने और ज़्यादा काम से आदमी मर जाता था
अब कम काम और ज़्यादा खाने से आदमी मर जाता है

पहले का आदमी भूख से मर जाता था
आज का आदमी बदहज़मी से मर जाता है

पहले का परिश्रम जानलेवा हुआ करता था
आज का विश्राम जानलेवा होता है

कल का आदमी टी बी से मरता था
आज का आदमी दिल के दौरे से मरता है

कल की समस्या थी कि बहुत अधिक काम है
आज की समस्या है कि बहुत अधिक आराम है

---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---१३ जुलाई २०१२

Tuesday, June 12, 2012

अँखियों के झरोखे से

 
अँखियों के झरोखे से

देखते थे जिसे कभी अँखियों के झरोखे से,
आज वही सामने खड़ी शरमा रही है।

शरमा रही है, लरजा रही है,
छुई मुई सी बिन छुए ही सिकुड़ रही है।

देखती है मेरी तरफ यूँ दिलकश निगाहों से,
या ख़ुदा क़यामत की घड़ी आ रही है।

बदन कैसे लूँ आगोश में,
दुल्हन मेरी आँखों से ओझल होती जा रही है।

आँख खुलती है, मालूम होता है, लेटा हूँ अकेले अपने बिस्तर पर,
केवल अपने अकेलेपन की बू आ रही है।

क्या पता था कि मेरी माशूका,
केवल मेरे ख़्वाबों में आ जा रही है।

देखते थे जिसे कभी अंखियों के झरोखे से,
ख़्वाबों के झरोखे से नज़र आ रही है।

---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---१२ जून २०१२

Saturday, May 19, 2012

साजन गए परदेस

 


साजन गए परदेस सखी री,
कैसे कर लूँ मैं सोला सिंगार।

गए परदेस मोरी सुधि हू न लीन्हीं,
ऐसो निठुर मेरो यार।

कौन सी सवतिया उनको मिल गई,
भूलि गए रे मेरो प्यार।

भोरहिं कागा उड़ि उड़ि जाओ,
बोलो सैयाँ को हमरी गोहार।

मोर सँदेसवा पिय तक लइ जइओ,
ओ पुरवैया की बयार।

ओरे बदरवा उन सन कहियो,
मोरे हियरा में बिथा अपार।

मोहें तोहे बिन नींद न आवे,
डरपै दुखिया जियरवा हमार।

लौट भी आओ, ऐसे न रूठो,
पइयाँ परूँ मैं सैयाँ तोहार।

---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---१९ मई २०१२


Thursday, April 26, 2012

मोहें पिय सँग नींद न आवे



मोहें पिय संग नीँद न आवे
पिय सोवे नाक बजावे
बिच बिच ट्रेन सों शीटी बजावे
मोहें------

नींद आवत आवत खुलि जावे
मैं पिया को धक्का लगावे
पिया सोवत सों जगि जावे
मोहें---

पिया को छेड़खानी सुहावे
मोहें झुँझलाहट आवे
पिया तब रिस में भरि जावे
मोहें---

पिया बेड छोड़ि सोफे पे जावे
तब नींद मोहें लगि जावे
पिया जला भुना होइ जावे
मोहें---

---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---२६ अप्रैल २०१२

Wednesday, March 21, 2012

नारद हरि सम्वाद २०१२




नारद जी पहुँचे विष्णु जी के द्वार
हरि ने उठ के किया सत्कार
नारद जी आइए
मृत्युलोक के हालात बताइए

नारद जी बोले
प्रभु अजब है पृथ्वी का हाल
मौत को मारने पर तुले हैं, आपके लाल
कैन्सर, हृदय रोग आदि घातक बीमारियाँ
मानव करना चाहता है इनका ख़ात्मा
मरने के साधन कम हो रहे हैं
बूढ़े लोग ख़ूब डट के बढ़ रहे हैं
मरते है किन्तु घुट घुट के मरते हैं
वात रोग यानी कि अर्थराइटिस जैसे रोग लगते हैं
आल्जहाइमर जैसी बीमारियाँ बढ़ रही हैं
मरने और जीने का फर्क कम कर रही हैं
कम बूढ़े हैं जो वे बूढ़ों की सेवा करते हैं
जावानों का अनुपात घट रहा है
मानव अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहा है

प्रभु बोले, नारद सही फरमाया है
मानव ने प्रगति के नाम पर अपनी बरबादी को अपनाया है
सृष्टि को सही तरीके से चलाने के लिए
आवश्यक है सन्तुलन
मृत्यु नहीं है मानव की दुश्मन
जीवन और मृत्यु चलते हैं साथ साथ
कहते हैं इनका चोली दामन सा साथ
किन्तु आप नहीं घबराइए
एक आध शताब्दी तक प्रतीक्षा करिए
मानव तब समझेगा
और दिशा परिवर्तन करेगा
समझेगा कि बूढ़े लोगों का मरना ज़रूरी है
युवाओं की संख्या में बढ़ती ज़रूरी है
बूढ़ों में विश्व को चलाने की ऊर्जा नहीं है
परिश्रम करने की क्षमता नहीं है
इस लिए मौत को दुश्मन न मानिए
सृष्टि संचालन का यह साधन है मानिए

---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---२१ मार्च २०१२

Wednesday, February 15, 2012

सजन शौचालय बनवाय देव


(पहले यह समाचार पढ़िए:
http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2012/02/120213_toilet_vk.shtml)

सजन शौचालय बनवाय देव
नहीं तो सेजरिया न बिछाऊंगी।
सेजरिया न बिछाऊँगी
मैं तो मैके चली जाऊंगी।
सजन----
तुम सवतिया भी लै आओ
मैं तब भी नहीं आऊँगी।
खेतवा या सड़कन को
मैं शौचालय नहीं बनाऊँगी।
सजन---
हगत हगत कोई मर्दवा के आगे
मैं ठाढ़ी न होइ पाऊँगी।
बड़ी शरम की बात ये सइयाँ
कैसे तोहें समझाऊँगी।
सजन---
चाहै तुम मारौ, चहै दुत्कारौ
मैं गन्दगी न फैलाऊंगी।
शौचालय न बनवाओगे तो
मैं मैके ही रह जाऊँगी।
सजन---

---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---१५ फरवरी २०१२










Sunday, October 30, 2011

देव लोक में हाहाकार

देव लोक में मचा है हाहाकार
भारी संकट से सभी हैं लाचार

देवों की सुरक्षा के लिए आवश्यक
यज्ञ और हवन और सर्वाधिक सोम रस

सोम रस का हो गया है पृथ्वी पर लोप
हवन सामग्री पर है मिलावट का प्रकोप

यज्ञ भी लोग अब कहाँ करते हैं
वे तो मूर्तियों पर धन लुटाते हैं

परेशान हैं इन्द्र, अग्नि और वरुण
अश्विनीकुमार, चन्द्र, सूर्य और अरुण

ब्रह्मा का भी कट चुका है पत्ता
उनकी भी पूजा करता कोई अलबत्ता

शिव और विष्णु और उनके अवतार
लक्ष्मी और पार्वती का लगता दरबार

कुमार और गणपति हैं शेष के भागी
उनकी भी है काफी जनता अनुरागी

गायत्री मंत्र से बनी है सूर्य देव की हस्ती
करवा चौथ से है चन्द्र देव की पुष्टि

शेष देव हो गए हैं यदि मृत नहीं तो मृतक समान
भगवान भी नहीं रख रहे हैं उनका ध्यान

---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---३० अक्टूबर २०११

























Sunday, October 16, 2011

मटका चतुर्दसी



कल करवा चौथ थी। हिन्दू सधवा महिलाएं पति की आयु वृद्धि के लिए यह व्रत सारे दिन रखती हैं और चाँद को देखने के बाद ही जल ग्रहण करती हैं। पति केवल मौज मस्ती करते हैं। कुछ सम्वेदनशील पतियों को लगता है कि पतियों को भी अपनी पत्नियों के लिए कुछ करना चाहिए। मेरा निम्न सुझाव इस कमी को पूरा करने का एक प्रयास है।

पतियों के लिए भी एक व्रत होना चाहिए जो करवा चौथ का चीनी यिन-यांग की तरह सम्पूरक (कॅाम्प्लीमेन्टरी) हो। मेरा सुझाव है कि पतियों को मटका चतुर्दसी का व्रत रखना चाहिए। यह व्रत ज्येष्ट बदी १४ के सायंकाल से लेकर अगले सूर्योदय तक यानी सारी रात रहेगा। करवे की जगह मटका रखा जाएगा और मोहल्ले के सारे पति एकत्र होकर मटका चतुर्दसी के माहात्म्य की कथा सुन कर सूर्य देव की आरती करने के बाद ही पानी पी सकेंगे। जेठ के महीने में कड़ाके की गर्मी होती है इसलिए मटके में कोई शीतल पेय रखा जा सकता है जो व्रत तोड़ने बाद पिया जा सकता है।

अब कथा कौन सी सुनाई जाएगी। इस कथा के विकास लिए कुछ समय चाहिए। प्रारंभ कुछ इस तरह हो सकता है। एक बार पवित्र नैमिषारण्य क्षेत्र में ऋषि मुनि एकत्र हुए और उन्होंने वैसम्पायन जी से निवेदन किया कि हे मुनिवर कलिकाल में पतियों का घोर पतन होगा और पत्नियों के प्रति उनकी सम्वेदनशीलता बहुत कम हो जाएगी। कृपया इसके निवारण का कोई उपाय बताइए। वैसम्पायन जी ने कहा, हे मुनियो एक व्रत है जो श्री रामचन्द्र जी ने त्रेता युग में अश्वमेध यज्ञ में सीता जी के पृथ्वी में समा जाने के बाद रखा था। सीता जी के पृथ्वी में समा जाने के बाद श्री राम को घोर पश्चाताप हुआ और वे बड़ी दीनता से विलाप करने लगे तब वशिष्ठ जी ने कृपा करके श्री राम को मटका चतुर्दसी का व्रत रखने को कहा। इस व्रत से श्री राम जी को बड़ी शान्ति प्राप्त हुई। यह व्रत काल गति से लुप्त हो चुका है किन्तु अब इस को पुन: प्रकट करने का समय आ गया है।

अब कोई ऐसी कहानी होनी चाहिए जिसमें पति के व्रत न रखने से पत्नी कि मृत्यु हो जाती है और फिर पति के पश्चाताप और वादा करने के बाद अगले साल वह अवश्य व्रत रखेगा, पत्नी फिर जीवित हो जाती है। पत्नी ने कहा बड़ी गहरी नींद आई। पति ने कहा, हाँ यदि मैं नहीं होता तो कभी नहीं टूटती।

पतियो, इस व्रत से तुम्हारा ही लाभ होगा। पत्नियाँ बड़ी दयालु होती हैं। सवेरा होते ही, भूख प्यास से अधमरे विचारे पति के लिए चाय, पूरी कचौरी, हलवा, इत्यादि बनाने लगेंगी। फिर एक मधुर चुम्बन देंगी और इसके बाद की चीज़ों की सम्भावना भी बढ़ सकती है।

हिन्दू धर्म में हमेशा नए व्रत ईज़ाद होते रहते हैं। मुझे याद है कि बचपन में सन्तोषी माँ का कोई व्रत नहीं था। जब मैं दस ग्यारह  साल का था, गाँव में कुछ पन्डों पुजारियों का आना शुरू हुआ और उन्होंने सन्तोषी माता और उनके व्रत की चर्चा शुरू की। इसके बाद सन्तोषी माता वाली पिक्चर आई। बाकी सब इतिहास है।

---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---१६ अक्टूबर २०११



Friday, October 14, 2011

भ्रष्टाचार पर कुछ विचार


आज कल भारत में अन्ना हज़ारे का भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ अभियान चल रहा है। लोकपाल विधेयक की बात ज़ोर शोर से चल रही है। हर कोई भ्रष्टाचार विरोधी हो गया है। लेकिन ऐसा कैसे हो सकता है। लगता है कि भ्रष्टाचार लेने वाले भी भ्रष्टाचार विरोधी हो गए हैं। भ्रष्टाचारी लोग क्यों नहीं बोल रहे हैं कि भ्रष्टाचार उनका जन्मसिद्ध अधिकार है? यह अधिकार हमें अपनी परम्परा से मिला है। अरे! हम तो भगवान को भी घूस देते हैं। जब हम मनौती करते हैं कि भगवान मेरे बेटे को नौकरी दिला दो तो इतना चढ़ावा मन्दिर में चढ़ाऊँगा। यह घूस नहीं तो क्या है? अन्तर इतना है कि अॅाफीसर या पुलिस वाले को काम के पहले घूस देनी पड़ती है किन्तु भगवान को बाद में और भगवान हमसे घूस नहीं माँगते हैं , हम स्वत: देते हैं।

कई साल पहले किसी पत्रिका में एक लेख पढ़ा था जिसमें चीन और भारत में भ्रष्टाचार की तुलना की गई थी। फर्ज़ करिए कि आप एक फैक्टरी खोलना चाहते हैं। घुस आप को दोनों ही जगह देनी पड़ेगी।  चीन में एक बार घूस दे कर काम हो जाएगा; दो महीनों में आपकी फैक्टरी एप्रूव हो जाएगी। भारत में एक बार घूस देने के दो महीनों बाद  वह बन्दा आएगा और कहेगा कि साहब और पैसा लगेगा। जो काम चीन में दो महीने में हो जाता है उसके लिए भारत में एक साल लगेगा।

इस लिए मैं कहता हूँ कि भ्रष्टाचार उन्मूलन के पहले भ्रष्टाचार को एफीशिएन्ट बनाने की ज़रूरत है। अब यह कैसे किया जाए यह समझाने के लिए आपको एक उदाहरण देता हूँ। सन्१९२० के आस पास अमेरिका में शराब गैर कानूनी करार कर दी गई थी लेक लोग शराब तो पिएंगे ही तो सारे मुल्क में गैर कानूनी शराब धड़ल्ले से बिक रही थी। लोग कुछ दिन जेल काट आते थे और फिर धन्धा शुरू कर देते थे।   आखिरकार सरकार को शराब बेचना और खरीदना फिर से कानूनी करना पड़ा।

अमेरिका में शराब की लत की तरह भारतवासियों को भ्रष्टाचार की लत लग गई है। इस लिए इसको हटाना मुश्किल है किन्तु इसकी कुशलता बढ़ाई जा सकती है। हम कई कदम इस रास्ते पर ले सकते हैं। पहले तो भ्रष्टाचार पर लगे स्टिग्मा को ख़त्म किया जाय। घूस न कह कर उसे सुविधा शुल्क कहा जाय और उसकी दरें नियत कर दी जाएं। जैसे कि पुलिस में एफ़ आई आर दर्ज कराने के १००० रुपए लगेंगे आदि आदि। इससे हमारे जैसे लोग भी भ्रष्टाचार का फायदा उठा सकेंगे। हमें तो पता ही नहीं है कि घूस कैसे दी जाती है। डरते रहते हैं कि अगर अधिकारी किसी तरह ईमान दार है तो वह हमें घूस देने के ज़ुर्म में अन्दर करा देगा। मैंने ज़िन्दगी में केवल एक बार घूस दी है। मैं क़रीब ३० साल पहले की बात कर हूँ। भारत गया था; सामान मेरे साथ नहीं पहुँचा। कई दिन बाद जब सामान आया और मैं लेने गया तो कस्टम वाले ने कहा, "अरे, गुप्ता जी आप तो कुछ भी नहीं लाए। गेट पर खड़े आदमी को ४०० रुपए दे दीजिएगा।" मैंने सोचा कि यदि मैंने इन्कार किया तो यह सारा सामान सूटकेस से निकाल कर काउन्टर पर पटक देगा और मुझे घंटों तक तंग करेगा। तो मैं ४०० रुपए सुविधा शूल्क देकर चुपचाप निकल आया।

कुछ दिन पहले विक्रमचन्द्र का उपन्यास सैक्रेड गेम्स पढ़ा था। उसमैं मुम्बई पुलिस के बारे में बताया था। जब कोई अॅाफीसर घूस लेता है तो उसका कुछ हिस्सा सीनियर अधिकारियों को मिलता है, कुछ हिस्सा अॅाफिस के खर्चों के फन्ड में जाता है और बाकी घसख़ोर पुलिसवाले को मिलता है। अब यदि भ्रष्टाचार को कानूनी बना दिया जाय तो ५% सरकारी ख़ज़ाने में जा सकता है। लोग खुले आम घूस देकर काम करा सकते हैं। अधिकारी काम न करे तो आ उससे आप खुले आम कह सकते है कि आप घूस लेकर भी काम नहीं कर रहे हैं।

निवेदन है कि आप इस विचार का परिमार्जन और संशोधन करें। यह देशभक्ति का काम होगा।

---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---१४ अक्टूबर २०११