Thursday, March 27, 2008

भक्त कुत्ता

सुना है जापान के एक ज़ेन बौद्ध मंदिर में बड़ा चमत्कार हुअा है
एक कुत्ते को भगवान बुद्ध से बड़ा प्यार हुअा है
वह अपने स्वामी के साथ मंदिर जाता है
और पिछले पंजों पर खड़ा होकर अगले पंजों को हाथों की तरह जोड़ता है

सुना है उस मंदिर में श्रद्धालु भक्त भारी संख्या में आ रहे हैं
मंदिर की महिमा और चढ़ावे में वृद्धि ला रहे हैं

इस आख्यान से मेरे मन में एक महान विचार आया है
विश्व कल्याण का एक मार्ग सामने आया है

यदि सभी धर्मास्थलों में यही युक्ति अपनायें
सभी भक्त गण अपने अपने पशुओं को लायें
हाथी, घोड़े, बिल्ली कुत्तों और चूहों को लायें
उन्हें बंदगी, पूजा, सिज़दा करना सिखायें

इन पशु उपासकोँ को देख कर बेधरम मानव शरमायेंगे
और धर्मास्थलों की तरफ पग बढ़ायेंगे
तन मन धन से प्रभु और मंदिर की सेवा करेंगे

अब आप सोचिये कितना लाभ होगा
जन कल्याण होगा
पशु कल्याण होगा
मंदिर कल्याण होगा
पुजारी कल्याण होगा
कोई अतिशयोक्ति नहीं यह कहने में
कि विश्व कल्याण होगा

...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...२७ मार्च २००८

पुनश्च: यहाँ देखिये वह समाचार जिस पर यह कविता बनी है:

http://news.xinhuanet.com/english/2008-03/25/content_7854736.htm

Wednesday, March 19, 2008

होली की बेला

होली की बेला है, प्रवासी अकेला है

नहीं जलती इस देश में होली की ज्वाला है
दिखती नहीं यहाँ पर उपलों की माला है
गोझियों का भोग भी कहाँ लगने वाला है
होली की...

नहीं जानता यहाँ पर कोई प्रह्लाद की कहानी
हिरण्यकसिपु और होलिका की साजिश और बेईमानी
नहीं जानता कोई कान्हा और राधा के रास की कहानी
होली की...

नहीं उड़ाता हैं कोई यहाँ पर धुलहठी की धूल अम्बर तक
फागमण्डलियों के जोशीले सुर यहाँ नहीं जाते गगनमण्डल तक
कबीरें नहीं गाता कोई यहाँ धूल उड़ाने पर
होली की...

पिचकारियों से यहाँ कोई रंग नहीं चलाता
न ही अबीर और गुलाल कोई मुँह पर लगाता
न ही कोई हँस के गले से लगाता
होली की...

नहीं होता यहाँ होली पर हँसी और मजाक
न ही अल्हड़ जवानी का हास-परिहास
बूढ़े भी करते थे वहाँ होली पर रसिकपन की बात
होली की...


कहाँ है यहाँ युवा वृन्द का अविरल उत्साह
दिखता नहीं यहाँ बाल वृद्धों का उमड़ता हुलास
न ही भाभियों के चेहरों पर रंग और गुलाल
होली की...

...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...१९ मार्च २००८

Sunday, March 09, 2008

हिलरी वन्दना

हिलरी महरानी नमो नमो
बिल की पटरानी नमो नमो
दिलेर सिंहिनी नमो नमो
बराक-सिर-पीड़ा नमो नमो
न्यूयार्क सेनेटर नमो नमो
सर्वस्वास्थ्यक्षेम प्रस्ताविनी नमो नमो
निर्धनहितकारिणि नमो नमो
चेलसी की अम्मा नमो नमो
डी सी विहारिणी नमो नमो
तुम हमको भाई नमो नमो
बस प्राइमरी जीतो नमो नमो
मैकेन को हराओ नमो नमो
व्हाइटहाएस पहुँचो नमो नमो
बिल को वहाँ लाओ नमो नमो
ईराक बचाओ नमो नमो
हम जैसों का रिटायरमेंट बचाओ नमो नमो

---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---९ मार्च २००८

Wednesday, March 05, 2008

बराक की आशा

बराक ओबामा
लोचन अभिरामा
तनु घनश्यामा
संग मिशैल
भारी है आशा

आशा परिवर्तन
यही संदेशा
न करो अँदेशा
बस भेजो पैसा
बराक की आशा

दिल खोलो अपना
खोलो बटुआ
भेजो चन्दा
मुझे जिताओ
तव मत की आशा

न करो निराशा
मुझे जिताओ
राष्ट्रपति बनाओ
समझो बराक की भाषा
यह बराक की आशा

करो आशा की हिम्मत
तब होगी बरकत
परिवर्तन माँगो
करूँगा वादे पूरे
नहीँ छोड़ूँगा अधूरे
मैं तुम्हरी आशा
तुम मेरी आशा
न करो निराशा
बराक की आशा

---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---५ मार्च २००८

Monday, February 18, 2008

बाग़-ए-दुनिया

इस बाग़ में अब बहार नहीं आएगी
इन डालों में कोपलें नहीं फूटेंगी
ए कलियाँ अब अधखिली रह जाएंगी
घोर बरसात की बात नहीं पूछो अब
इस सावन को फुहार भी नहीं आएगी
अस्ताचल को जा रहा है सूरज
इन किरणों से अब धूप नहीं आएगी
शुष्क हो रही है जीवन की धारा
इस नदी में अब बाढ़ नहीं आएगी
ग़म नहीं यह तो नियम है जीवन का
बहार-ए-बाग़-ए-दुनिया चन्द दिन के लिए आएगी

---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---१८ फरवरी २००८

Monday, January 14, 2008

पति-पत्नी कोठे पर

यह कविता निम्न सत्य घटना पर अाधारित है:

http://www.reuters.com/article/oddlyEnoughNews/idUSN0959912720080109 


चौदह साल जब शादी के हुए
रोमांस फीका हुअा, मद्धिम हुए दिलों के दिये
पत्नी ने पति से पूछा
कि वह कहीं पार्ट-टाइम काम कर ले
पति को क्या शिकायत हो सकती थी
मान लिया
एक दिन पति को कामदेव ने सताया
नहीं रहा गया जब
तब कोठे पर अाया
जैसे ही वह कोठे पर पहुँचा
पत्नी को वहाँ पर देख कर चौंका
बोला, तुम यहाँ क्या कर रही हो
पत्नी ने उत्तर दिया,
वही जो अाप कर रहे हैं

सुना है वे अब तलाक देने वाले हैं
मैं नहीं समझा ऐसा क्यों है
अब तो दोनों को एक कामन इन्टेरेस्ट मिल गया है
वेश्यालय में दोनों का दिल लग गया है
मेरी तो दम्पति को यही सलाह है
वेश्यालय में कर डालो फिर से विवाह है
वहीं पर अपने वादे दुहराओ
और फिर जमके उत्सव मनाओ

...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...१४ जनवरी २००८

Friday, November 30, 2007

चलते चलो


दिल के दरिये में ग़म को डुबोते चलो

आँख भर आये आँसू बहाते चलो

सुर सज जाये तो गीत गाते चलो

सुर ना भी सजे गुनगुनाते चलो

पद थकें तो थकें किन्तु चलते चलो

अपने जीवन की गंगा बहाते चलो

कुछ भी चाहो नहीं, कुछ भी माँगो नहीं

जो मिले उस पर जीवन निभाते चलो

अगर हो सके मुस्कुराते चलो

किन्तु चलते चलो, किन्तु चलते चलो

हँसते हँसते चलो, रोते रोते चलो

किन्तु चलते चलो, किन्तु चलते चलो

जब तक जीवन है कर्तव्य करते चलो

मौत आयेगी तब तो ठहरना ही है

तब तक चलते चलो, तब तक चलते चलो

लक्ष्मीनारायण गुप्त

…30 नवम्बर 2007

Sunday, November 04, 2007

चूहा पुराण

जिन चूहों को तुम सदा समझ रहे थे तुच्छ।
उन चूहों की बुद्धि को पंडित समझें उच्च।।

कुछ वैज्ञानिकों ने किया एक प्रयोग प्रसिद्ध।
चूहों की श्रेष्ठता को जिसने कर दिया सिद्ध।।

आटा गेहूँ का लिया चोकर दिया निकाल।
तत्वहीन उस चूर्ण से बिस्कुट दिए बनाय।।

सूँघा इन बिस्कुटों को चूहों ने दिया त्याग।
बेवकूफ इन्सान थे खागए सह अनुराग।।

पौष्टिक आटे से किया बिस्कुट का निर्माण।
चूहों और मनुष्य को अवसर किया प्रदान।।

चूहे खाए चाव से तश्तरी कर दी साफ।
मूर्ख मनुष्यों ने मगर नहीं लगाया हाथ।।

बुद्धिमान गण ईश को तथ्य रहा यह ज्ञात।
चूहा खाता है प्रथम फिर वह खाते आप।।

तुम इन्सानों में अगर होती यदि कुछ बुद्धि।
चूहों का सम्मान कर तुम पा जाते सिद्धि।।

करते रहते हो सदा चूहों का अपमान।
दिखलाता है मूर्ख नर तेरा यह अज्ञान।।

चूहों का सम्मान कर उनको भोग लगाहु।
जाको चूहा न चखे वा तुमहूँ ना खाहु।।

...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...४ नवम्बर २००७

Sunday, October 14, 2007

पत्नी नाम

पत्नी नाम, पत्नी नाम, पत्नी नाम जपिए
जाही विधि राखे बीवी ताही विधि रहिए।

खिचड़ी खिलावे वो तो खिचड़ी से खुश रहिए
पकौड़ी खिलावे तो आप चटनी बनाइए।

पत्नी नाम....

सब्ज़ी वो बनावे तो प्याज़ आप काटिए
पति धर्म पालन में आँसू बहाइए।

पत्नी नाम....

खाना वो बनावे तो बर्तन आप धोइए
वोह थक जाए तो चरण भी दबाइए।

पत्नी नाम...

पत्नी को रिझाने हेतु काम सब करिए
तोंद बढ़ रही तो जिम नित जाइए।

पत्नी नाम...

पत्नी लात मोरे तो उसके तलवे सहलाइए
भृगु और विष्णु की कहानी याद करिए।

पत्नी नाम...

घर से निकाले तो लान में घास काटिए
दया दृष्टि होवे जब घर में फिर घुसिए।

पत्नी नाम...

छुट्टी जब होवे उसे बाहर ले जाइए
गैलरी और म्यूज़ियम भी कभी ले जाइए।

पत्नी नाम...

कभी सिनेमा, कभी थिएटर ले जाइए
सभ्यता संस्कृति में अपनी रुचि बढ़ाइए।

पत्नी नाम...

कभी भूल कर भी उसका बर्थडे न भूलिए
फूल और चाकलेट ज़रूर घर लाइए।

पत्नी नाम...

ऐनीवर्सरी भूलने की कभी ज़ुर्रत न करिए
हित की बात तुमको यह बताता हूँ भइए।

पत्नी नाम...

कभी कभी उसे आश्चर्यान्वित करिए
अवसर न हो कोई तो भी साड़ी ज़ेवर ले आइए।

पत्नी नाम...

पत्नी से बड़ा कोई देवता न मानिए
प्यार से उसकी तुम पूजा नित करिए।

पत्नी नाम...

...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...१४ अक्टूबर २००७

Tuesday, October 02, 2007

खुदा

ख़ुदी जब दूर होती है ख़ुदा तब पास आता है।
ख़ुदी जब पास होती है ख़ुदा तब दूर जाता है।
देखता है ख़ुदा को जो ख़ुद उसका गैरहाज़िर है।
जो हाज़िर है ख़ुदा उसके नहीं नज़दीक आता है।
बड़ा बेढब माज़रा यह बताते नहीं बनता है।
ख़ुदा को देखने वाला ख़ुदा वह ख़ुद ही होता है।
…लक्ष्मीनारायण गुप्त
…2 अक्टूबर 2007

Wednesday, September 26, 2007

अपनी राह

हम तो अपनी राह चलेंगे
सुबह नहीं तो शाम चलेंगे
कोई साथ नहीं भी आए
तो भी हम निर्भीक चलेंगे
हाथ काँपते, पैर फिसलते
तो भी हम अनवरत चलेंगे
हम तो...

जब तक यह जीवन है प्यारे
तब तक जग यह साथ हमारे
बुद्धदेव की बात मान कर
अपना दीपक स्वयं बनेंगे
नहीं किसी पर निर्भर होंगे
अपनी राह स्वयं खोजेंगे
हम तो...

जीवन गति का नाम
मृत्यु ही स्थिरता है
कठिनाई से रुक जाना ही
कायरता है
इसी सचाई के कायल हो
हम सदैव गतिमान रहेंगे
हम तो...

हर मुश्किल को झेलेंगे
कटिबद्ध रहेंगे
मित्र पथभ्रमित हो जाए तो
उसको लेकर साथ चलेंगे
अगर मित्र भी साथ न आए
तो हम अपने आप चलेंगे
हम तो...

...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...२६ सितम्बर २००७

Wednesday, September 05, 2007

साजन बिन

साजन बिन मोरा जिया घबरात
बिजुरी चमकै आधी रात
घनन घनन बदरा घघरात
सुनत सुनत मोरा जिया दहलात
सनन सनन सन पवन सुनात
हालैं हमरे कोमल गात
कोऊ अकेले मां पूछै न बात
बैरी बने बादर बिजुरी वात
बालम का परदेसवा सुहात
का करूँ सजनी बनै कइसे बात
साजन बिन मोरा जिया घबरात

…लक्ष्मीनारायण गुप्त
…5 सितम्बर 2007

Friday, August 17, 2007

पड़वामोक्ष आख्यान

(यूट्यूब पर प्रकाशित निम्न विडियो पर आधारित:

http://www.youtube.com/watch?v=LU8DDYz68kM )

सुमिरन करि कै निरंकार का,
करि कै वाहे गुरू का ध्यान।
दक्खिन अफरीका की यारौ,
इक अद्भुत घटना करूँ बयान।।
क्रूगर पार्क माँ जो तुम जाओ,
बहुत जानवर पड़ैं दिखाय।
बड़े बड़े भैंसा, बड़े बड़े केहरि,
सबै तरह के मृग दिखलायँ।।
छोटा झुंड रहै बैंसन का,
नदी किनारे चलै पगुराय।।
पाँच, छै सिंह जो बड़े भयंकर,
उन भैंसन का दियो दौड़ाय।
छोटी उमर का इक पड़वा था,
दौड़न माँ पीछे रहि जाय।।
उसे दबोचा फिर शेरन ने,
उसकी जान बचन की नाँय।
पड़वा निकरो यह अवतारी,
आरत बाणी से चिल्लाय।
पुरब काल माँ हे, प्रभु तुमने,
इक हाथी को लियो बचाय।
जैसे गज का ग्राह ते बचायो,
मोहिं सिंहन ते लेहु बचाय।।
आनन फानन तबहीं हरि ने,
एक ग्राह को दयो पठाय।।
एक तरफ ते शेर खींचि रहे,
दुसरी टाँग मगर मुँह माँय।।
पड़वा सोचै या कैसी भै,
दोहरी मुसीबत परै दिखाय।।
प्रभु बोले तुम फिकिर करौ ना,
तुम्हरी जान बचैगी भाय।।
प्रभु की बात मानि पड़वा ने,
बदन शिथिल करि दीन्हो भाय।।
बाजी जीति लई शेरन ने,
पड़वा पड़ा नदी तट भाय।।
लेकिन मित्रौ यही समय अब,
भारी चमत्कार होइ जाय।
जहँ तक देखौ तहँ तक मित्रौ,
भैंसे भैंसा परैं दिखाय।।
मोर्चा तानि दिया भैंसन ने,
शेरौ तुमको मज़ा चखायँ।।
एक ते एक भयानक भैसा,
पैने सींगन वाले भाय।।
लगा मोर्चा है भैंसन का,
शेरन का अब दिल दहलाय।।
इक भैंसे ने एक शेर को,
जंगल तरफ दियो दौड़ाय।
दुसरे सिंह को पकरि सींग ते,
फेंको बहुत दूर तक भाय।।
यह गति देखी जब सिंहन ने,
इक दुइ आपहिं गए पराय।
बाकी शेरन का भैंसन ने,
मारि पीटि कै दियो भगाय।।
करामात अब प्रभु की देखौ,
पड़वा तुरत खड़ो होइ जाय।
चोट जरा ना उसके लागी,
जाको प्रभु ने लियो बचाय।।
देहीं चाटैं माईबाप अब,
पड़वा अब गदगद होइ जाय।
अपने बंधु बांधवन के संग,
पड़वा चला गर्व ते जाय।।
पड़वामोक्ष की सुन्दर गाथा,
अब हम सबको दियो सुनाय।
सुनै प्रेम से जो कोइ इसको,
संकट ते मुक्ती होइ जाय।।

...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...१७ अगस्त २००७

Friday, August 03, 2007

सुख-दु:ख के साधन

जो मिला है उसकी नाक़द्री करके,
जो नहीं मिला उसकी चाह करते हैं।
अपने दिलवर से चुराके आंखें,
अन्य के दिलवर को सराहते हैं।
अपनी दौलत नहीं है काफी,
कुछ और मिलने की आस रखते हैं।
हमारी इज्जत क्यों न उनकी जैसी,
सोच सोच करके आहें भरते हैं।
क्यों न उनकी जैसी है अपनी प्रतिभा,
निराश होकर के कोसते हैं।
हमारी सन्तति निकली न क़ाबिल,
सोचके मन दुखी करते हैं।
पैदा हुए हम क्यों ऐसे घर में,
ऐसे मन में मलाल भरते हैं।
हैं दु:ख पाने के ये सारे साधन,
जानके भी अनजान बनते हैं।

कुछ अमोघ साधन हैं, प्यारे सुख के,
अब हम उनका बयान करते हैं।

पर्याप्त मित्रो है अपनी प्रतिभा,
दौलत भी अपनी प्रचुर मानते हैं।
जो मिला है हमको है बहुत काफी,
यह पूरे मन से हम मानते हैं।
परमात्मा को हम परेशान करके,
धन, मान, संतति नहीं मांगते हैं।
बस कृतज्ञ होकर सिर को झुकाके,
कोई नहीं हम मांग करते हैं।

>>>लक्ष्मीनारायण गुप्त
>>>३ अगस्त २००७

Wednesday, July 25, 2007

एक पारिवारिक आख्यान

(फिलहाल में इज़रायल में घटी एक सत्य घटना पर आधारित)

ससुर दामाद में बात हुई
कथा बड़ी यह विचित्र हुई
दामाद को हुई बड़ी कठिनाई
किसी तरह से मन की बात बताई
बोले, ससुर जी आपकी बेटी
रहती है मुझसे रूठी रूठी
खोई खोई सी वह रहती है
पूछो तो कुछ नहीं कहती है
ससुर जी, कृपया सहायता कीजिए
अपनी कन्या पर एक जासूस लगा दीजिए
हो सकता है कुछ गड़बड़ी हो
कन्या आपकी किसी और के प्यार में पड़ी हो
सुन कर यह दामाद की दरख्वास्त
ससुर जी ने किया एक जासूस तैनात
देखेगा जो बिटिया की गतिविधियों को
रिपोर्ट करेगा फिर ससुर दामाद को
सुनिए यह उत्तम कथानक प्यारो
अक्सर रहती थी बिटिया अपनी माँ के पास यारो
जासूस को हुई कुछ परेशानी
करनी पड़ती थी उसे सासू जी की भी निगरानी
पाठको, यह हुई बड़ी हैरानी की बात
जासूस ने की जब की तहकीकात
पत्नी में कोई खामी नहीं थी
किन्तु सासू जी किसी के आगोश में पड़ीं थीं
बिटिया को पता था यह प्रेम व्यापार
चिन्तायें थीं उसके मन में हजार
इसी चिन्ता में वह रहती थी खोई
पति ने सोचा वह दिल अपना खोई
ससुर जी ने बड़ी शिक्षा पाई
कर दिया सासू जी को बाई बाई

...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...२५ जुलाई २००७

Sunday, July 15, 2007

हरि किरपा, एक व्यंग्य कविता

(चेतावनीः जिन्हें "हगास" जैसे शब्द सुरुचिपूर्ण न लगते हों, कृपया आगे न पढ़ें। जो बहुत अधिक आस्तिक या बहुत पक्के नास्तिक हों उन्हें भी शायद बुरा लगे। मैंने यह कविता ज़रा शरारत के मूड में लिखी है। माफ़ कीजियेगा।)

बिना हरि किरपा के हगास भी नहीं आती है।
इसीलिये नास्तिकों को कब्जियत हो जाती है।।
पहला चूरन चार्वाक ने बनाया होगा।
कर्ज के घी से जब अजीरण हुआ होगा।।
श्राद्ध माह में प्रति दिन तीन दावतें होती हैं।
पंडितों को किन्तु कोई बीमारी नहीं लगती है।।
राम नाम जैसी कोई दवाई नहीं आती है।
बिना हरि किरपा के हगास भी नहीं आती है।।

नास्तिक करते हैं अपना जिगर खराब।
चरणामृत की जगह पीते हैं शराब।।
तभी तो उन पर महामारी आती है।
बिना हरि किरपा के हगास भी नहीं आती है।।

इसलिये सज्जनो रामनाम का चूरन खाइए।
रबड़ी मलाई भर पेट खा जाइए।।
खाना है यदि हलवा पूरी, मोहनभोग और रबड़ी।
कचौरी, मालपुए और सोहनपपड़ी।।
तो हरि किरपा बिन बात नहीं बनती है।
बिना हरि किरपा के हगास भी नहीं आती है॥

कब्ज, मधुमेह और दिल की बीमारी।
भक्तों को ये नहीं लगती हैं सारी।।
इसलिये प्यारो मन्दिरों, मस्जिदों और गिरजों में जाओ।
घंटे घड़ियाल बजाओ और रोओ गिड़गिड़ाओ।।
प्रेम से फिर मस्ती मनाओ।
और जितना चाहो उतना खाओ।।
प्रभु की किरपा से महामारी नहीं आती है।
बिना हरि किरपा के हगास भी नहीं आती है।।

...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...११ जुलाई २००७

Tuesday, July 10, 2007

जीवन के द्वन्द्व

नहीं सही है कभी विरह की व्यथा जिन्होंने,
मधुर मिलन का मान करेंगे कैसे?
कभी कलह की कटुता जिनके पास न आई,
प्रेम भाव का मोल करेंगे कैसे?
नहीं सहा है दुःख गरीबी का पल भर भी जिनने,
वे नर धन की कद्र करेंगे कैसे?
जिनसे पीड़ा का कोई सम्बन्ध नहीं है,
औरों की पीड़ा जानेंगे कैसे?
द्वेष कभी न उठा चित्त में जिनके,
कैसे राग उठेगा उनके मन में?
कभी अँधेरा जिनके पास न आया,
वे प्रकाश का मान करेंगे कैसे?

...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...१० जुलाई २००७

Monday, July 09, 2007

विश्व हिन्दी सम्मेलन

सुना है हो रहा है विश्व हिन्दी सम्मेलन।
हो रहा है एक वृहत् आयोजन।।
बड़े बड़े नेता और बड़े बड़े विद्वान।
पधारेंगे अपनी बढ़ायेंगे शान।।
भाषण होंगे, होंगे कविसम्मेलन।
होगा साहित्य और राजनीति का मिलन।।
भाषणों की किन्तु होगी बहुतायत।
जबान सस्ती है नहीं इसकी कोई कीमत।।
सरकारी लोग भी भाषण देंगे।
सम्भवतः वे अंग्रेज़ी में बोलेंगे।।
सुना है कुछ लोग यह भी कहेंगे।
हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र में मान्यता दिलायेंगे।।
सरकारी लोग भी इसका समर्थन करेंगे।
और भाषणों के बाद तालियाँ बजायेंगे।।
मैं सोचता हूँ हिन्दी संयुक्त राष्ट्र की भाषा बन सकती है।
वैसे ही जैसे यह भारत की राज्य भाषा बन पड़ी है।।
केवल एक प्रस्ताव पास करा दो।
हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र की एक भाषा बना दो।।
केवल उसमें एक शर्त लगा दो।
मित्रो, एक पन्थ दो काज बना लो।।
हिन्दी संयुक्त राष्ट्र की एक भाषा बन जायेगी।
जिस दिन हिन्दी यथार्थ में भारत की राज्यभाषा बन जायेगी।।

...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...९ जुलाई २००७

Saturday, June 16, 2007

बचपन की कुछ यादें

जब मेरी उम्र यही कुछ ८-९ साल की थी, कुछ महत्वपूर्ण घटनायें घटीं। मेरे गाँव से एक मील कम दूर पर एक गाँव में मेरे पिता जी की बुआ और उनका परिवार रहता था किन्तु हमारे परिवारों में दुश्मनी चल रही थी और आना जाना, बात-चीत कुछ भी नहीं होती थी। एक दिन एक शव-यात्रा जा रही थी। गंगा जी तक जाने का रास्ता हमारे घर के सामने से जाता था। पिता जी ने पता लगाया तो उन्हें पता चला कि यह उनकी बुआ की शव-यात्रा है। पिता जी सब काम छोड़ कर बारात के साथ हो लिए। इस घटना के दो-तीन महीने याद हमारे दरवाजे पर एक रथ रुका, जिसमें एक वृद्ध दम्पति आए थे। हम बच्चों को नहीं पता था किन्तु पिता जी की बुआ के सबसे बड़े पुत्र अपनी पत्नी के साथ आए थे। उन्होंने बताया कि वे एक असाध्य रोग से पीड़ित हैं और इस दुनिया में अधिक दिनों के लिए नहीं हैं। ऊन्होंने कहा कि उनकी बड़ी इच्छा है कि वे २० साल से चली आ रही हमारे परिवारों के बीच की अनबन को मिटा के ही इस दुनिया सेजायें। मेरे पिता जी उनसे उम्र में कम से कम २० साल छोटे थे, उन्होंने पैर छू के कहा, " भाई साहब, मैं भी यही चाहता हूँ।" तब से हमारी रिश्तेदारी फिर से स्थापित हुई और परिवारों में आना, जाना फिर शुरू हुआ। कुछ ही महीनों में ताऊ जी की मृत्यु हो गई।

यह रिश्ता फिर से चलने का शुभ परिणाम कुछ महीनों में ही हमें मिला। मेरे पिता जी किसानों को सूद पर पैसा उधार दिया करते थे। काफी सारा पैसा कई गाँवों में इस तरह फैला हुआ था। कुछ हजार रुपयों का कर्ज गाँव के रईस ठाकुरों पर भी था। मेरे बड़े भाई ने यह पूछने की धृष्टता की कि यह कर्ज वे कब चुका रहे है। वैमनस्यता इस बात से शुरू हुई और बढ़ती गई। ठाकुर लोग हमारे दुश्मन हो गए। मेरे पिता जी बैलगाड़ी पर सामान लेकर दो नौकरों के साथ पास के एक बड़े गाँव में सप्ताह में दो दिन वहाँ के बाज़ार में अपनी परचून की दूकान लगाते थे। ठाकुरों ने गुण्डे लगा कर डराना धमकाना शुरू किया। आखिरकार पिता जी ने दूकान ले जाना छोड़ दिया। ठाकुरों ने लोगों को उकसाया कि वे हमारा कर्ज न अदा करें, यह कह कर कि बनिए क्या कर लेंगे। काफी सारा पैसा डूब गया। ठाकुरों की कृपा से हमारे घर में गरीबी ने पदार्पण किया।

इतने पर भी ठाकुरों का पेट नहीं भरा और मेरे पिता पर १०० रुपए का झूठा मुकदमा दायर किया, गाँव पंचायत में जिसके सरपंच थे ठाकुर के छोटे भाई। तो यह कोई आश्चर्य की बात नहीं थी कि ठाकुर मुकदमा जीत गए किन्तु अपील में हार गए। अब वे बहुत चिढ़े। हमारे घर में सेंध लगी। काफी माल चुराया गया। जब पिता जी ने रपट की, तहकीकात हुई और पुलिस (जो अवश्य ही चोरों से मिली हुई थी। हमारे घर में सभी को विश्वास था कि चोरी ठाकुरों ने ही कराई है।) ने कहा कि यह सेंध तो इतनी सँकरी है कि इससे तो कोई इन्सान घुस ही नहीं सकता। मेरे पिता जी को घंटों थाने पर गर्मी के दिनों में भूखे प्यासे बिठाए रखा और उन पर झूठी रपट लिखाने का इलजाम पुलिस लगा रही थी। हम लोगों ने अपने नए फिर से मिले सम्बंधियों और मेरी बहन के ससुर को सूचित किया। इन लोगों ने दौड़ धूप कर एक कांग्रेसी नेता से सम्पर्क किया। बड़ी मुश्किल से पिता जी घर लौट कर आए, नेता जी के प्रयत्न से। पुलिस को और नेता जी को शायद घूस भी देनी पड़ी होगी किंतु मुझे इसका सही ज्ञान नहीं है।

बहुत सालों बाद जब मैंने श्रीलाल शुक्ल का दरबारी राग पढ़ा तो मुझे लगा कि मेरे परिवार ने कुछ हद तक वह भोग रखा है जो इस उपन्यास के पात्रों ने भोगा है। गाँव का जीवन अब तो और भी अधिक कुत्सित है।
"अहा, ग्राम्य जीवन भी क्या है,
ऐसी सुविधा और कहाँ है?
क्यों न इसे सब का मन चाहे?"

मैथिलीशरण गुप्त जी की ये पंक्तियाँ मेरे गाँव पर नहीं लागू होतीं हालाँकि मैंने सातवें दर्जे में ग्राम्य जीवन पर लिखे एक लेख की शुरुआत इसी उद्धरण से की थी और उस पर मुझे अच्छे अंक भी मिले थे।

...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...16 जून 2007

Monday, June 11, 2007

काले वर की व्यथा

(कुछ दिन पूर्व बिहार के एक गाँव में एक वधू ने वर को बहुत काला बता कर उससे शादी करने से इंकार कर दिया। किन्तु वर ने हार नहीं मानी और लड़की के दरवाजे पर दो दिनों तक धरना देता रहा। अन्ततः कन्या ने द्रवित होकर उससे शादी करना मंजूर कर लिया। यह कविता इसी सत्य घटना पर आधारित है।)

मुझको काला समझ प्रिये क्यों शादी से इंकार किया
दिल तो काला नहीं हमारा उस पर ज़रा न ध्यान दिया
नहीं हमारे दिल से पूछा बीत रही क्या उस पर है
यह कैसा है न्याय प्रिये क्यों इस पर नहीं विचार किया

इतनी आसानी से प्यारी हम तो हार नहीं मानेंगे
जब तक दिल न तुम्हारा पिघले दरवाजे पर धरना देंगे
सत्याग्रह का अस्त्र अहिंसक तुम पर यहीं चलायेंगे
जब तक हाँ तुम नहीं कहोगी आसन यहीं जमायेंगे

काले से तुम क्यों डरती हो काले ही थे कृष्ण कन्हैया
मोहित जिन पर राधा प्यारी मोहित उन पर सारी सखियाँ
मोहित जिन पर हुईं जानकी रामचन्द्र भी काले थे
सुन्दरता से ज्यादा सुन्दर तुलसी उनको माने थे

हमने निश्चय किया सुन्दरी तेरा हाथ सँभालेंगे हम
काले तन की कोमलता से तेरे मन को मोहेंगे हम
किसी बात की कमी तुम्हें महसूस न होने देंगे हम
सारे उर का प्रेम सुन्दरी तुम पर आज उँड़ेलेंगे हम

मान भी जाओ हमदम अब तुम इतना हमको नहीं सताओ
लालू के इस पुण्यदेश में मेरी पत्नी बन कर आओ
मेरा जैसा प्रेमी तुमको नहीं मिलेगा प्यारी फिर
छोड़ प्रचंड रूप यह देवी करुणामय अब हो मुझ पर

…लक्ष्मीनारायण गुप्त
…11 जून 2007

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